दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘मोदी चालीसा’ के पाठ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। कार्यक्रम में PM मोदी के कटआउट को भगवान राम के रूप में दिखाए जाने की बात भी सामने आई। जानिए क्या है पूरा मामला और प्रेस क्लब ने क्या सफाई दी।
प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ से मचा बवाल, उठे कई सवाल
क्या हनुमान चालीसा से बढ़कर है मोदी चालीसा? क्या अब देश के लोगों को हनुमान चालीसा के बजाय मोदी चालीसा पढ़नी चाहिए? देश में ऐसे कई मामले सामने आते रहे हैं, जहां राजनेताओं और अभिनेताओं के प्रति समर्थकों की आस्था इस हद तक पहुंच जाती है कि उनके मंदिर बनाए जाते हैं और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। सचिन तेंदुलकर, रजनीकांत, अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी जैसे चर्चित चेहरों के मंदिर बनाए जाने की खबरें भी पहले सामने आ चुकी हैं। इसी बहस के बीच अब ‘मोदी चालीसा’ का मामला चर्चा में है। दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किए जाने की बात सामने आई। वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठने लगे कि कार्यक्रम किस मकसद से आयोजित किया गया था और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी धार्मिक प्रस्तुति क्यों की गई।
दिल्ली के प्रेस क्लब में 20 अगस्त को हुआ ‘मोदी चालीसा’ का कार्यक्रम
दरअसल, दिल्ली के प्रेस क्लब में 20 अगस्त को राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड से जुड़े लोगों की ओर से ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किए जाने की जानकारी सामने आई। इस दौरान भगवान राम के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कटआउट लगाए जाने की बात भी सामने आई है। बताया गया कि इस आयोजन को बिहार राज्य किन्नर बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. राजन सिंह की ओर से आयोजित किया गया था। राजन सिंह पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनाने की इच्छा जता चुके हैं। इसी सिलसिले में बोर्ड के सदस्यों ने प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ का पाठ किया और मंदिर निर्माण से जुड़ी जानकारी साझा की।
क्या ‘मोदी चालीसा’ और ‘हनुमान चालीसा’ की तुलना हो सकती है?
वीडियो सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या किसी राजनीतिक नेता की लोकप्रियता को भक्ति का रूप देना उचित है? साथ ही सोशल मीडिया पर यह सवाल भी पूछा जाने लगा कि क्या ‘मोदी चालीसा’ को हनुमान चालीसा के बराबर माना जा सकता है। दोनों की प्रकृति और संदर्भ अलग हैं। हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ी प्रसिद्ध भक्तिपरक रचना है, जिसमें भगवान हनुमान के गुण, पराक्रम और भक्ति का वर्णन किया गया है। वहीं ‘मोदी चालीसा’ समकालीन राजनीतिक व्यक्तित्व नरेंद्र मोदी की प्रशंसा से जुड़ी रचना के तौर पर सामने आई है। इसलिए दोनों के उद्देश्य और धार्मिक-सामाजिक संदर्भ को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
प्रेस क्लब में PM मोदी को भगवान राम के रूप में दिखाने पर भी विवाद
दरअसल, कार्यक्रम दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के भवन में बने एक हॉल में आयोजित किया गया था। आयोजकों की ओर से ‘भगवान नरेंद्र मोदी चालीसा’ प्रस्तुत किए जाने और उसके पाठ की बात सामने आई। इस दौरान मंच पर भगवान श्रीराम की तस्वीर के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा लगाकर बनाई गई तस्वीर भी रखे जाने का दावा किया गया। वहीं बिहार किन्नर बोर्ड के उपाध्यक्ष राजन सिंह इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी को भगवान श्रीराम का अवतार तक बता चुके हैं। उन्होंने दोनों को एक समान बताया था। कार्यक्रम का आयोजन ‘नमह भारत’ नाम की संस्था की ओर से किए जाने की जानकारी सामने आई है।
राजन सिंह ने पटना में मोदी मंदिर बनाने की कही थी बात
बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड के उपाध्यक्ष राजन सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंदिर निर्माण की बात पहले भी कह चुके हैं। उनके मुताबिक, पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित एक भव्य मंदिर बनाने की योजना है। राजन सिंह ने इसके पीछे केंद्र सरकार की ओर से ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े कानून और अधिकारों का हवाला दिया था। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वजह से किन्नर समुदाय को कई अधिकार मिले हैं और इसी सम्मान के तौर पर मंदिर बनाने की इच्छा है। उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक मंदिर निर्माण का काम शुरू नहीं होता, तब तक किन्नर समुदाय के लोग हर गुरुवार नरेंद्र मोदी की चालीसा का पाठ करेंगे। इसी बयान के बाद ‘मोदी चालीसा’ का मुद्दा पहले भी चर्चा में आया था।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कार्यक्रम से किया किनारा
‘मोदी चालीसा’ का वीडियो वायरल होने के बाद प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की ओर से इस कार्यक्रम को लेकर सफाई सामने आई। क्लब ने कहा कि यह आयोजन प्रेस क्लब की तरफ से नहीं किया गया था। प्रेस क्लब के मुताबिक, एक संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हॉल किराए पर लिया था। लेकिन जब उस संगठन ने जगह किराए पर लेने की शर्तों का उल्लंघन किया, तो क्लब के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और कार्यक्रम को रोक दिया। इस तरह प्रेस क्लब ने इस आयोजन से अपना सीधा संबंध होने से इनकार किया।
‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ के नाम पर हॉल लेने का दावा
प्रेस क्लब की सफाई के मुताबिक, आयोजकों ने हॉल को प्रेस कॉन्फ्रेंस के उद्देश्य से किराए पर लिया था। क्लब को बाद में वहां चल रही गतिविधि की जानकारी मिली, जिसके बाद अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया। इस सफाई के बाद विवाद का एक अहम हिस्सा यह बन गया कि आखिर हॉल किस उद्देश्य से बुक किया गया था और वहां किस तरह का कार्यक्रम आयोजित किया गया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो ने इस पूरे मामले को और ज्यादा चर्चा में ला दिया।
PM मोदी को लेकर पहले भी सामने आते रहे हैं धार्मिक विवाद
नरेंद्र मोदी से जुड़े धार्मिक प्रतीकों और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर इससे पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। जनवरी 2026 में हनुमान जी से जुड़े एक पतंग प्रसंग को लेकर भी राजनीतिक विरोध हुआ था और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए प्रदर्शन किया था। ऐसे मामलों के बाद धर्म, आस्था और राजनीति के बीच संबंध को लेकर बहस लगातार तेज होती रही है। ‘मोदी चालीसा’ का विवाद भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा बन गया है, जहां राजनीतिक समर्थन और धार्मिक आस्था के बीच की सीमा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
क्या नेता की लोकप्रियता भक्ति का रूप ले सकती है?
‘मोदी चालीसा’ के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लोकतंत्र में किसी नेता की लोकप्रियता इतनी बढ़ सकती है कि वह धार्मिक आस्था का रूप लेने लगे? राजनीतिक समर्थन और धार्मिक भक्ति के बीच आखिर सीमा कहां तय होनी चाहिए? यह भी बहस का विषय है कि भगवान की भक्ति से जुड़े प्रतीकों और धार्मिक स्वरूपों का इस्तेमाल किसी जीवित राजनीतिक नेता की प्रशंसा के लिए किया जाना उचित है या नहीं। फिलहाल ‘मोदी चालीसा’ का वीडियो इसी बहस को और ज्यादा हवा दे रहा है।
मोदी चालीसा विवाद ने फिर छेड़ी धर्म और राजनीति की बहस
दिल्ली के प्रेस क्लब में सामने आए इस कार्यक्रम के बाद ‘मोदी चालीसा’ सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बन गई है। एक तरफ आयोजकों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सम्मान और आस्था की बात कही जा रही है, तो दूसरी तरफ इसे लेकर धार्मिक प्रतीकों और राजनीतिक व्यक्तित्व के मेल पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कार्यक्रम से अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि हॉल का इस्तेमाल तय शर्तों के मुताबिक नहीं किया गया था और जानकारी मिलते ही कार्यक्रम को रोक दिया गया। अब इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।


