बच्चों के भोजन-पोषण के अधिकार पर भोपाल में मंथन, 17 राज्यों के 400 प्रतिनिधि जुटे

  • October 5, 2026
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भोपाल में बच्चों के भोजन और पोषण अधिकार पर आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रतिनिधि

भोपाल में बच्चों के भोजन-पोषण के अधिकार पर राष्ट्रीय मंथन

भोपाल के शाहपुरा स्थित आइकफ आश्रम में बच्चों के भोजन और पोषण के अधिकार को लेकर राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है। इसमें 17 राज्यों के करीब 400 प्रतिनिधि शामिल हुए। रविवार को अधिवेशन का आखिरी दिन रहा। इस दौरान बच्चों के भोजन, पोषण और वंचित समुदायों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से मंथन किया गया। अधिवेशन में अलग-अलग राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने बच्चों के भोजन और पोषण से जुड़े मुद्दों पर अपने अनुभव साझा किए। चर्चा में यह बात सामने रखी गई कि भोजन और पोषण जैसे बुनियादी मुद्दे मुख्यधारा के विमर्श से लगातार गायब होते जा रहे हैं।

इस राष्ट्रीय अधिवेशन में देश के 17 राज्यों के करीब 400 प्रतिनिधि शामिल हुए। आयोजन में भोजन, पोषण और वंचित समुदायों के अधिकारों को केंद्र में रखकर चर्चा की गई। प्रतिनिधियों ने कहा कि भोजन और पोषण केवल खाद्य उपलब्धता का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध बच्चों के अधिकार, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिति से है। खास तौर पर वंचित और आदिवासी समुदायों के बच्चों की स्थिति को लेकर चर्चा की गई। अधिवेशन में विभिन्न क्षेत्रों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। इस दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि जिन समुदायों के सामने लंबे समय से पोषण की समस्या है, उनके मुद्दे मुख्यधारा की चर्चा में पर्याप्त जगह क्यों नहीं बना पाते।

पोषण संकट और संवेदनशील रिपोर्टिंग पर चर्चा

अधिवेशन में भोजन और पोषण से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग को लेकर भी चर्चा हुई। प्रतिनिधियों का कहना था कि भोजन, पोषण और वंचित समुदायों के मुद्दों पर संवेदनशील रिपोर्टिंग लोगों के बीच समझ और संवेदना पैदा करती है। हालांकि, इस तरह की रिपोर्टिंग चुनौतीपूर्ण भी है। इसी वजह से इन विषयों पर पर्याप्त खबरें और रिपोर्ट सामने नहीं आ पाती हैं। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि बच्चों और वंचित समुदायों से जुड़े भोजन एवं पोषण के मुद्दों को केवल घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इनके पीछे मौजूद सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है।

पवन खेड़ा बोले- बुनियादी मुद्दे विमर्श से गायब

अधिवेशन के दौरान राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने कहा कि बुनियादी मुद्दे मुख्यधारा के विमर्श से गायब हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 14-15 वर्षों में टेलीविजन बहसों में भी इन विषयों पर चर्चा कम हुई है। खेड़ा ने कहा कि देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है, लेकिन पोषण के मुद्दे पर स्थिति चिंताजनक है। उनके अनुसार भोजन उपलब्ध होने और लोगों को पर्याप्त पोषण मिलने के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। उन्होंने SIR में नाम हटाए जाने और उससे अधिकारों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई।

अधिवेशन में बालाघाट में बच्चों की मौत की घटना को भी पोषण संकट से जोड़कर चर्चा की गई। इस घटना की रिपोर्टिंग करने वाली पत्रकार बिंदू ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि यह केवल एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे पोषण संकट की ओर इशारा करती है। उन्होंने आदिवासी समुदायों के जंगल से कमजोर होते रिश्ते को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार जंगल पर निर्भर समुदाय अब सरकारी योजनाओं पर अधिक निर्भर हो गए हैं और इसका असर उनके पोषण पर भी दिखाई देता है।

आदिवासी समुदायों और जंगल से जुड़े मुद्दे

अधिवेशन में आदिवासी समुदायों के भोजन और पोषण की स्थिति पर भी चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने कहा कि जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के साथ समुदायों का रिश्ता कमजोर होने का प्रभाव उनकी जीवनशैली पर पड़ा है। जंगल पर निर्भर समुदायों के लिए भोजन और पोषण की पारंपरिक व्यवस्था में बदलाव आया है। ऐसे में सरकारी योजनाओं पर निर्भरता बढ़ी है। इस बदलाव को बच्चों की पोषण स्थिति के साथ जोड़कर देखने की जरूरत पर जोर दिया गया। प्रतिनिधियों ने कहा कि बच्चों के पोषण के सवाल को केवल स्वास्थ्य विभाग या खाद्य व्यवस्था तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं को भी समझना जरूरी है।

अधिवेशन के ‘जमीन की आवाजें’ सत्र में विभिन्न राज्यों के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव साझा किए। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के मलकपुरा गांव के सरपंच ने पंचायतों के पास पर्याप्त अधिकार नहीं होने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पर्याप्त अधिकार नहीं होने के कारण शिक्षकों की जवाबदेही तय करना मुश्किल होता है। उन्होंने क्राउड फंडिंग के जरिए स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता सुधारने के प्रयास का भी उल्लेख किया। इस चर्चा में यह सवाल भी सामने आया कि बच्चों के भोजन और पोषण से जुड़े कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर पंचायतों और समुदायों को कितनी भूमिका मिलनी चाहिए।

बच्चों के पोषण को लेकर व्यापक चर्चा की जरूरत

भोपाल में आयोजित इस राष्ट्रीय अधिवेशन में अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधियों ने बच्चों के भोजन, पोषण, अधिकारों और वंचित समुदायों से जुड़े मुद्दों पर अपने अनुभव साझा किए। अधिवेशन में हुई चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि बच्चों के भोजन और पोषण को बुनियादी अधिकार के रूप में देखा जाए और इनसे जुड़े मुद्दों को मुख्यधारा के विमर्श में पर्याप्त जगह मिले। प्रतिनिधियों ने संवेदनशील रिपोर्टिंग, पोषण संकट, आदिवासी समुदायों, पंचायतों की भूमिका और बच्चों के अधिकारों जैसे विषयों को आपस में जोड़कर देखने की जरूरत पर जोर दिया।