जमुई कांड: नाबालिगों से बदसलूकी और तमाशबीन भीड़, सामने आई पूरी कहानी

  • September 23, 2026
  • 0
  • 0 Views
जमुई कांड में नाबालिगों से बदसलूकी और तमाशबीन भीड़ का मामला

जमुई कांड के वायरल वीडियो ने खड़े किए कई सवाल

बिहार के जमुई की एक घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ…लेकिन इस वीडियो में सिर्फ मारपीट और बदसलूकी नहीं है। इसमें एक और तस्वीर दिखाई देती है वो है हमारे हमारे समाज की। एक ऐसी भीड़ की तस्वीर, जो सबकुछ देखती है…लेकिन सवाल पूछने के बजाय तमाशा देखती है। सवाल सिर्फ उन लड़कों से नहीं है, जिन्होंने कानून को हाथ में लिया।

सवाल उन लोगों से भी है, जो वहां मौजूद थे…जिन्होंने हैवानियत की सारे हदे पार होते हुए देखा… लेकिन मदद के लिए कोई आगे नहीं आए। ये कहानी उस सोच की भी है, जिसमें किसी लड़के और लड़की को साथ देखते ही सबसे पहले उनके रिश्ते पर सवाल खड़ा कर दिया जाता है। क्या किसी लड़की को सड़क पर रोककर, घेरकर, अपमानित करने या मारपीट करने का अधिकार किसी सभ्य समाज को है? किसी की निजी जिंदगी को लेकर असहमति हो सकती है। किसी रिश्ते को लेकर सामाजिक या पारिवारिक सवाल हो सकते हैं। लेकिन कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी भी भीड़ को नहीं मिलता।

19 सितंबर की घटना और वायरल हुआ वीडियो

दरसल बिहार के जमुई से सामने आया वो वीडियो कुछ सेकंड का था, लेकिन उसे देखने के बाद देर तक मन बेचैनियों के भंवर में फंसा रहा. वीडियो जितना डिस्टर्निंग था, उससे कहीं ज्यादा शरीर के रेशे-रेशे तक निचोड़ देने वाला था. दो नाबालिगों के साथ बदसलूकी करते कुछ मुट्ठीभर गुंडों पर जितना गुस्सा था, उतना ही गुस्सा उस तमाशबीन भीड़ पर भी था, जो मुंह पर ताला लगाकर खड़ी रही. इन सबके बीच नजरें रह-रहकर उस सहमी हुई सी लड़की के चेहरे पर जाती रही, जो ऐसे खड़ी थी मानो भेड़ियों से घिरा कोई घायल पशु. बेहद असहाय, निरीह और लाचार।

19 सितंबर का वह वीडियो जिसने भी देखा, उसके भीतर गुस्सा और बेचैनी दोनों पैदा हुए. वीडियो वायरल हुआ तो प्रशासन एक्टिव हुआ. गिरफ्तारियां भी हुई. लेकिन इन सबसे इतर सवाल उस सोच से जुड़ा हुआ है, जिसमें दो विपरीत जेंडर के लोगों को साथ देखने पर उनके रिश्ते और चरित्र की पड़ताल शुरू हो जाती है इसलिए जमुई की यह घटना सिर्फ एक अपराध की कहानी नहीं है. यह उन कई सवालों को उठाती हुई घटना है, जिनसे समाज अक्सर बचकर निकल जाना चाहता है.

अपराध देखकर चुप रहने की मानसिकता पर सवाल

अपराध को देखकर अक्सर चुप रहने की हमारी आदत, भीड़ में होकर भी जिम्मेदारी से भागने की मानसिकता और उस सिस्टम की भूमिका, जो कई बार घटना के बाद एक्टिव नजर आती है। इस घटना को केवल कुछ लड़कों की हरकत कहकर खत्म कर देना आसान है. मुश्किल यह स्वीकार करना है कि अपराधी अचानक पैदा नहीं होते. वे इसी समाज में बड़े होते हैं, इसी समाज की भाषा सुनते हैं, इसी समाज में महिलाओं को लेकर मजाक देखते हैं, इसी समाज में हिंसा को मर्दानगी की तरह पेश होते देखते हैं और कई बार यह सीखते हैं कि किसी कमजोर व्यक्ति को घेर कर उसे अपमानित करना या उसकी निजता में दखल देना कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं है।

जब किसी लड़की की इच्छा से ज्यादा समाज की तथाकथित इज्जत जरूरी हो जाए, जब लड़के को यह सिखाने के बजाय कि सामने वाली की सहमति क्या होती है, उसे यह सिखाया जाए कि वह कितना बड़ा मर्द है, तब अपराध सिर्फ सड़क पर नहीं होता. उसकी नींव घर, स्कूल, दोस्ती और सामाजिक व्यवहार में कहीं पहले पड़ चुकी होती है।

नाबालिग आरोपियों ने किशोर मानसिकता पर उठाए सवाल

दरसल जमुई की घटना का एक और भयावह पहलू है, इसमें शामिल नाबालिग आरोपियों का होना. इससे हमें ये सोचने पर मजबूर होना चाहिए कि किशोर मन किस तरह तैयार हो रहा है? मोबाइल फोन और इंटरनेट ने बच्चों को दुनिया से जोड़ दिया है, लेकिन क्या हमने उन्हें उस दुनिया को समझने की नैतिक और भावनात्मक शिक्षा दी है? उनके विवेक का क्या? अधिकारों की जानकारी तो है लेकिन क्या दूसरे व्यक्ति की गरिमा की समझ है?

हमने बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन तो दे दिए लेकिन उन्हें यह समझाने में हम कहीं न कहीं पीछे रह गए कि किसी की तस्वीर, उनका शरीर, निजी जीवन या असहमति उतनी ही जरूरी है जितना उनका अपना अधिकार। और फिर आता है वह समाज, जो घटनाओं का सबसे बड़ा गवाह तो होता है, लेकिन अक्सर सबसे कमजोर पक्ष साबित होता है।

भीड़ बनी गवाह, लेकिन मदद के लिए आगे नहीं आई

भीड़ बराबर रहती है, लोग जुटते हैं, घटना को रिकॉर्ड भी करते हैं और सर्कुलेट भी लेकिन आंखों के सामने होते उस अपराध को रोकने की हिम्मत उस भीड़ में नहीं होती. इस तरह देखते-देखते एक इंसान की त्रासदी डिजिटल तमाशे में तब्दील हो जाती है। सवाल ये भी नहीं है कि किसी घटना का वीडियो क्यों बनाया गया? कई बार वीडियो अपराध का सबसे अहम सबूत बनकर सामने आता है. लेकिन एक सवाल ये भी हमें खुद से पूछना चाहिए कि मदद की गुहार लगा रहे शख्स की मदद करने के बजाए उसे रिकॉर्ड करना क्या कहीं ज्यादा जरूरी है?

जमुई मामले में पुलिस ने उन सोशल मीडिया प्रोफाइल्स पर भी कार्रवाई शुरू की है, जिन्होंने नाबालिग पीड़िता की पहचान उजागर करने वाला वीडियो सर्कुलेट किया. इससे ये भी पता चलता है कि अपराध सड़क पर खत्म नहीं होता. वह इंटरनेट पर भी पीड़ित का लगातार पीछा करता है।

पुलिस कार्रवाई और व्यवस्था की जवाबदेही

इस पूरे मामले में व्यवस्था पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है. कानून होना और कानून का समय पर काम करना दो अलग बातें हैं. हमारे पास पॉक्सो जैसा कानून है, जुवेनाइल जस्टिस की व्यवस्था है, साइबर सेल है, अदालतें हैं लेकिन कानून की असली ताकत उसके लागू होने की गति और निश्चितता में दिखाई देती है.

अगर किसी पीड़ित को पहले यह भरोसा हो कि उसे न्याय मिलेगा, तभी वह व्यवस्था पर भरोसा करेगा. अगर पुलिस को घटना की जानकारी सोशल मीडिया के वायरल वीडियो से मिले, तब सवाल सिर्फ अपराधियों से नहीं, उस निगरानी और सिस्टम से भी पूछा जाएगा जिसे ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बनाया गया है. जमुई मामले में पुलिस ने एसआईटी बनाई और आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की लेकिन घटना के बाद उठे ये सवाल व्यवस्था की जवाबदेही से अलग नहीं किए जा सकते।

एक घटना को ‘छिटपुट’ कहकर खत्म नहीं किया जा सकता

वही किसी गंभीर अपराध को छिटपुट घटना कह देना आंकड़ों की बहस में भले सुविधाजनक हो, लेकिन पीड़िता के अनुभव को छोटा नहीं कर सकता. एक लड़की के लिए वह घटना छिटपुट नहीं होती. उसके परिवार के लिए वह छिटपुट नहीं होती. जिस लड़के ने अपनी आंखों के सामने अपने दोस्त को अपमानित होते देखा, उसके लिए वह घटना छिटपुट नहीं होती. अपराध की गंभीरता इस बात से तय नहीं होती कि वह कितनी बार हुआ. यह इससे तय होती है कि उस एक घटना में किसी इंसान की गरिमा कितनी कुचली गई।

जमुई कांड से समाज के लिए क्या सबक निकलता है?

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसके कानून कितने कठोर हैं. उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि सड़क पर किसी कमजोर व्यक्ति के साथ कुछ गलत हो तो आसपास खड़े लोग क्या करते हैं. जमुई की घटना में शायद सबसे बड़ा सबक यही है कि अपराध सिर्फ अपराधी नहीं करता.

उसके आसपास की चुप्पियां, हंसी, वीडियो बनाते कैमरे, कमजोर सामाजिक प्रतिरोध और देर से जागती संस्थाएं मिलकर भी उसके लिए जगह बनाती हैं. इसका मतलब यह नहीं कि अपराध की जिम्मेदारी समाज के हर व्यक्ति पर डाल दी जाए. अंतिम जिम्मेदारी अपराध करने वाले की ही है लेकिन एक समाज के रूप में हमारी जिम्मेदारी यह जरूर है कि हम ऐसी मानसिकता को सामान्य नहीं होने दें।

किसी लड़की का सड़क पर होना अपराध नहीं है. किसी दोस्त के साथ घूमना अपराध नहीं है. किसी इंसान की निजी जिंदगी पर नैतिक अदालत लगाने का अधिकार किसी को नहीं है. किसी की असहमति के बावजूद उसे छूना, घेरना, डराना या अपमानित करना न मस्ती है, न मजाक, न मर्दानगी और न ही मोरल पुलिसिंग है। यह सीधे तौर पर उसकी गरिमा और अधिकारों का उल्लंघन है।