उच्चाधिकार प्राप्त न्यायिक कमेटी के निष्कर्ष में साक्ष्यों की कमी
सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीते 20 जुलाई को आयोजित छात्र विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा और कथित पुलिस बर्बरता की जांच के लिए गठित उच्च स्तरीय कमेटी को अब तक बहुत ही सीमित शिकायतें प्राप्त हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली ‘हाई पावर्ड इन्क्वायरी कमेटी’ (HPEC) ने शीर्ष अदालत के समक्ष अपनी स्थिति रिपोर्ट पेश करते हुए यह जानकारी दी।
कमेटी ने पीठ को अवगत कराया कि शिकायतकर्ताओं की सुविधा और गोपनीयता के लिए अत्याधुनिक ऑनलाइन पोर्टल, सुरक्षित ईमेल और व्यक्तिगत डाक की त्रिस्तरीय व्यवस्था किए जाने के बावजूद लोगों ने आगे आकर शिकायतें दर्ज कराने में बेहद सुस्ती दिखाई है। पर्याप्त प्रत्यक्ष सामग्री और औपचारिक बयानों के अभाव में कमेटी फिलहाल किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुंचने में असमर्थ है। इस तथ्य के सामने आने से जंतर-मंतर हिंसा जांच एक नए कानूनी मोड़ पर पहुंच गई है।
140 अखबारों में नोटिस और पोर्टल के बावजूद महज 1 हलफनामा
कमेटी द्वारा प्रस्तुत लिखित ब्योरे के अनुसार, शिकायत दर्ज कराने के लिए 13 अक्टूबर को एक स्वतंत्र और सुरक्षित ऑनलाइन वेब पोर्टल शुरू किया गया था। शिकायतकर्ताओं के भय को दूर करने के लिए पोर्टल पर अपना नाम, आधार नंबर या कोई भी व्यक्तिगत पहचान उजागर करना अनिवार्य नहीं रखा गया था। इस पोर्टल का एक्सेस केवल कमेटी के अध्यक्ष और अधिकृत जांच अधिकारियों के पास ही सुरक्षित है।
इसके अतिरिक्त कमेटी ने देशभर के 140 प्रमुख राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित कर पीड़ितों से हलफनामे मांगे थे। 17 और 21 अक्टूबर को प्रेस रिलीज जारी कर दोबारा अपील की गई। इसके बावजूद पोर्टल पर उंगलियों पर गिनने लायक शिकायतें आईं और ईमेल या डाक के जरिए सीधे कार्यालय में कोई औपचारिक साक्ष्य नहीं पहुंचा। हैरत की बात यह रही कि 29 अक्टूबर को आयोजित कमेटी की आधिकारिक सुनवाई में केवल एक अकेला शिकायतकर्ता ही कानूनी हलफनामे के साथ उपस्थित हुआ। इस विसंगति ने जंतर-मंतर हिंसा जांच की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कोर्ट ने याचिकाओं के वीडियो और साक्ष्य कमेटी को सौंपने की अनुमति दी
इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ताओं, छात्र संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यह विशेष अनुमति प्रदान की है कि वे पीड़ितों की ओर से पूर्व में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए वीडियो फुटेज, फोटोग्राफ्स, संबंधित याचिकाएं और शपथ-पत्र सीधे जांच कमेटी को सौंप सकते हैं।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि कमेटी इन सभी डिजिटल साक्ष्यों का परीक्षण करे, दिल्ली पुलिस और संबंधित प्रशासनिक विभागों से जवाब तलब करे और एक नियमित अंतराल पर अपनी अंतरिम जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक शांति भंग करने और बल प्रयोग के दोनों पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इस प्रकार जंतर-मंतर हिंसा जांच अब अदालत द्वारा उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड्स के आधार पर आगे बढ़ेगी।


