Bihar: 11 साल बाद RJD का लोक भवन मार्च, तेजस्वी का क्या मकसद?

  • August 20, 2026
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लोक भवन मार्च के दौरान RJD नेता तेजस्वी यादव प्रदर्शनकारियों के साथ

जस्वी यादव की अगुवाई में RJD ने पेपर लीक, छात्रों पर कार्रवाई, रोजगार और सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से फायरिंग के आरोपों को लेकर लोक भवन मार्च किया। लेकिन इस प्रदर्शन के पीछे RJD की राजनीति और प्रशांत किशोर की बढ़ती चुनौती भी बड़ी वजह मानी जा रही है।

तेजस्वी यादव क्यों उतरे सड़क पर? RJD का लोक भवन मार्च बना बड़ा राजनीतिक संदेश

बिहार की राजनीति में बुधवार को तेजस्वी यादव एक बार फिर सड़क पर नजर आए। हाथ में छात्रों के मुद्दे, निशाने पर सरकार और मंजिल लोक भवन थी। RJD ने पेपर लीक, छात्रों पर कार्रवाई, रोजगार और सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से फायरिंग के आरोपों को लेकर बड़ा विरोध मार्च निकाला।

गांधी मैदान के जेपी गोलंबर से शुरू हुआ यह मार्च लोक भवन की ओर बढ़ा, लेकिन पुलिस ने इनकम टैक्स गोलंबर के पास प्रदर्शनकारियों को रोक दिया। इस दौरान वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया और तेजस्वी यादव समेत RJD के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को छोड़ दिया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक छात्र आंदोलन या पेपर लीक के विरोध तक सीमित करके देखना सही तस्वीर नहीं देता। इस मार्च के पीछे RJD की संगठनात्मक राजनीति, तेजस्वी यादव की राजनीतिक छवि और बिहार में प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव जैसी कई बड़ी बातें जुड़ी हुई हैं।

पेपर लीक और छात्रों के मुद्दे पर RJD का प्रदर्शन

RJD ने बुधवार को बिहार सरकार के खिलाफ जिन मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने का फैसला किया, उनमें पेपर लीक, छात्रों पर कार्रवाई, रोजगार और सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से फायरिंग के आरोप प्रमुख रहे। तेजस्वी यादव ने मार्च की अगुवाई करते हुए छात्रों के अधिकार और परीक्षाओं में पारदर्शिता का मुद्दा उठाया। मार्च के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद तेजस्वी यादव समेत कई RJD नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। रिहाई के बाद तेजस्वी ने कहा कि उनकी लड़ाई जारी रहेगी और वे छात्रों के अधिकार, बेरोजगारी कम करने, पेपर लीक रोकने और परीक्षाओं में पारदर्शिता के लिए आवाज उठाते रहेंगे। उनके बयान से साफ था कि RJD इस मुद्दे को सिर्फ एक दिन के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहती।

करीब 11 साल बाद RJD का लोक भवन मार्च

इस मार्च की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि लेख के अनुसार RJD ने करीब 11 साल बाद इस तरह का राजभवन/लोक भवन मार्च किया। इससे पहले 2015 में पार्टी ने राजभवन मार्च किया था। उस समय जातीय गणना से जुड़ी मांग को लेकर RJD ने प्रदर्शन किया था। इसके बाद पार्टी अलग-अलग राजनीतिक अभियानों और यात्राओं के जरिए जनता के बीच सक्रिय रही, लेकिन लंबे समय तक कार्यकर्ताओं को बड़े सड़क आंदोलन के जरिए लामबंद करने वाला प्रदर्शन कम देखने को मिला। ऐसे में बुधवार का मार्च RJD के लिए केवल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन नहीं था। इसे पार्टी के कार्यकर्ताओं में फिर से संघर्ष की भावना पैदा करने और संगठन को सड़क पर सक्रिय दिखाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।

क्या तेजस्वी यादव के लिए यह ‘कमबैक’ मार्च है?

तेजस्वी यादव के इस मार्च को लेकर सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह उनके लिए एक तरह का राजनीतिक कमबैक है। लेख में दावा किया गया है कि सीवान की घटना के करीब 24 दिन बाद यह विरोध मार्च आयोजित किया गया। इसी वजह से राजनीतिक विश्लेषण में यह सवाल उठ रहा है कि क्या तेजस्वी यादव उन आरोपों का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें उन्हें कुछ बड़े जन आंदोलनों के दौरान अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहने वाला नेता बताया गया। नीट आंदोलन के दौरान मौके से चूकने के आरोपों के बीच लोक भवन मार्च को तेजस्वी की ओर से खुद को फिर से संघर्षशील और सक्रिय विपक्षी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

RJD के सामने सिर्फ सरकार नहीं, प्रशांत किशोर की चुनौती भी

बिहार की राजनीति में अब RJD के सामने चुनौती सिर्फ NDA सरकार को घेरने की नहीं है। प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के उभरने के बाद राज्य की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में एक नया कोण जुड़ गया है। लेख के मुताबिक बिहार में लंबे समय से NDA और RJD के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला रहा है, लेकिन जन सुराज के उभार ने तीसरे विकल्प की चर्चा तेज कर दी है। ऐसे माहौल में तेजस्वी यादव के लिए अपनी पार्टी के पारंपरिक आधार और युवा मतदाताओं के बीच पकड़ बनाए रखना महत्वपूर्ण हो गया है। अगर RJD खुद को लगातार सड़क पर संघर्ष करने वाली पार्टी के रूप में पेश नहीं कर पाती, तो प्रशांत किशोर जैसे नए राजनीतिक खिलाड़ी के लिए जगह बन सकती है।

तेजस्वी यादव ने पहले भी की है सड़क की राजनीति

यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि तेजस्वी यादव हमेशा आंदोलन से दूर रहे हैं। लेख में उनके कई पुराने अभियानों और आंदोलनों का उल्लेख है। 2018 में मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्षी नेताओं को एकजुट करने की पहल की गई थी। इसके अलावा जनादेश अपमान यात्रा, आरक्षण बढ़ाओ यात्रा, बेरोजगारी हटाओ यात्रा, जन विश्वास यात्रा और वोटर अधिकार यात्रा के जरिए भी तेजस्वी यादव जनता के बीच गए। पिछले साल बिहार बंद और SIR के मुद्दे पर हुए आंदोलनों में भी RJD की सक्रियता का उल्लेख किया गया है। इसलिए बुधवार के मार्च को तेजस्वी की पहली सड़क आधारित राजनीतिक गतिविधि कहना गलत होगा। असली सवाल यह है कि क्या RJD इस तरह के आंदोलनों को लगातार जारी रखकर संगठन और कार्यकर्ताओं में लंबे समय तक राजनीतिक ऊर्जा पैदा कर पाएगी।

RJD के कार्यकर्ताओं को फिर सक्रिय करने की कोशिश

किसी भी राजनीतिक दल के लिए केवल चुनाव के समय सक्रिय होना पर्याप्त नहीं होता। संगठन को जमीन पर लगातार सक्रिय रखना पड़ता है। RJD के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी को अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश देना है कि वह विपक्ष में रहते हुए सरकार के खिलाफ लगातार संघर्ष कर सकती है। लोक भवन मार्च इसी लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है। पुलिस कार्रवाई, वाटर कैनन और नेताओं की हिरासत जैसे घटनाक्रमों ने प्रदर्शन को राजनीतिक रूप से ज्यादा दिखाई देने वाला बना दिया। अगर RJD इस मुद्दे को आगे भी उठाती है, तो यह आंदोलन पार्टी के लिए सिर्फ एक दिन का प्रदर्शन न रहकर बड़े राजनीतिक अभियान में बदल सकता है।

बिहार में तीसरे विकल्प की चर्चा और जन सुराज

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी बिहार की राजनीति में RJD के लिए एक नई चुनौती पेश कर रही है। लेख में बांकीपुर की जीत और 2030 के चुनाव को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ने की बात का उल्लेख किया गया है। इस राजनीतिक विस्तार का सीधा असर RJD पर पड़ सकता है, खासकर अगर जन सुराज युवा और नए मतदाताओं के बीच अपनी जगह मजबूत करती है। ऐसे में तेजस्वी यादव को दो मोर्चों पर काम करना होगा। पहला, सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्षी नेता की भूमिका निभाना और दूसरा, अपने संगठन तथा पारंपरिक राजनीतिक आधार को कमजोर होने से बचाना। लोक भवन मार्च इसी दोहरी चुनौती के बीच हुआ है।

AK-47 फायरिंग के आरोप ने मुद्दे को बनाया संवेदनशील

सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से फायरिंग के आरोप को भी RJD ने अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया। यह आरोप राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है क्योंकि इसमें कानून-व्यवस्था और छात्र आंदोलन दोनों मुद्दे जुड़े हुए हैं। हालांकि ऐसे आरोपों को रिपोर्ट करते समय आधिकारिक जांच या उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों से पुष्टि करना जरूरी है। केवल आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी बताना उचित नहीं होगा। RJD ने इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ अपने व्यापक अभियान का हिस्सा बनाया है और इसी के जरिए कानून-व्यवस्था तथा छात्रों की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।

पांच साल बाद सड़क पर तेजस्वी, क्यों महत्वपूर्ण है यह तस्वीर?

लेख के अनुसार तेजस्वी यादव करीब पांच साल बाद किसी बड़े पैदल विरोध प्रदर्शन में खुद सड़क पर उतरे। राजनीतिक संचार के लिहाज से यह तस्वीर महत्वपूर्ण है। नेता का सड़क पर उतरना सिर्फ प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि समर्थकों और विरोधियों दोनों को राजनीतिक संदेश देने का माध्यम होता है। तेजस्वी के लिए यह संदेश था कि RJD सिर्फ विधानसभा या प्रेस कॉन्फ्रेंस की राजनीति तक सीमित नहीं है। वह जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरकर सरकार का विरोध भी कर सकती है। लेकिन एक मार्च से यह साबित नहीं होगा कि RJD की संघर्षशील छवि पूरी तरह वापस आ गई है। इसके लिए लगातार जमीन पर मौजूदगी और मुद्दों पर sustained campaign जरूरी होगा।

तेजस्वी यादव के सामने अब असली चुनौती क्या है?

तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सरकार को घेरना नहीं है। उन्हें अपनी पार्टी के संगठन को सक्रिय रखना होगा, युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी और छात्रों तथा रोजगार जैसे मुद्दों को लगातार राजनीतिक एजेंडे पर बनाए रखना होगा। इसके साथ ही प्रशांत किशोर के उभार का जवाब भी देना होगा। अगर RJD केवल विरोध प्रदर्शन करती है लेकिन उसके बाद मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाती, तो उसका राजनीतिक असर सीमित रह सकता है। लेकिन अगर पार्टी छात्र, रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर लगातार अभियान चलाती है, तो यह आंदोलन उसके लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।

क्या यह RJD के लिए सिर्फ विरोध मार्च है या बड़ी रणनीति?

कुल मिलाकर तेजस्वी यादव का लोक भवन मार्च केवल पेपर लीक या छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं दिखाई देता। इसके पीछे सरकार को घेरने के साथ-साथ RJD के संगठन को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं में संघर्ष का भरोसा पैदा करने और तेजस्वी की राजनीतिक छवि को मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई देती है। दूसरी तरफ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के बढ़ते प्रभाव ने RJD के सामने एक नई प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है। ऐसे में तेजस्वी के लिए सड़क पर उतरना जरूरी हो सकता है, लेकिन सिर्फ एक मार्च से राजनीतिक धारणा नहीं बदलती। असली परीक्षा इस बात की होगी कि RJD आने वाले महीनों में इन मुद्दों को कितनी मजबूती और निरंतरता के साथ उठाती है।

बिहार की राजनीति में आगे क्या?

अब देखने वाली बात यह होगी कि लोक भवन मार्च के बाद RJD अपनी रणनीति को किस दिशा में ले जाती है। क्या पेपर लीक और छात्र आंदोलन को लेकर लगातार अभियान चलाया जाएगा? क्या तेजस्वी यादव नियमित रूप से सड़क पर दिखाई देंगे? क्या RJD युवा और रोजगार के मुद्दे को अपना प्रमुख राजनीतिक हथियार बनाएगी? और क्या प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने के लिए RJD अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव करेगी? इन सवालों के जवाब यह तय करने में अहम होंगे कि बुधवार का मार्च सिर्फ एक दिन का राजनीतिक प्रदर्शन था या RJD के लिए नए संघर्ष की शुरुआत।