गोवा वोटर लिस्ट विवाद: हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को दिया 5 नाम जोड़ने का सख्त आदेश

  • November 6, 2026
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गोवा मतदाता सूची विवाद के तहत अदालत परिसर के बाहर खड़े याचिकाकर्ता के वकील

सालगांवकर परिवार के पक्ष में हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

बॉम्बे उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने देश भर में चल रहे मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद के बीच चुनाव आयोग (ECI) को एक बेहद कड़ा और स्पष्ट न्यायिक निर्देश जारी किया है। अदालत ने निर्वाचन आयोग को आदेश दिया है कि वह गोवा के प्रतिष्ठित सालगांवकर परिवार के उन पांच सदस्यों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में तत्काल प्रभाव से दोबारा जोड़े, जिन्हें पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान गलत तरीके से सूची से बाहर कर दिया गया था।

जस्टिस की पीठ ने चुनाव आयोग को पते और आवश्यक दस्तावेजों की पुष्टि करने के बाद यह पूरी प्रक्रिया संपन्न करने के लिए 10 दिनों की सख्त समय-सीमा तय की है। इसके साथ ही अदालत ने अपने इस फैसले के अमल पर रोक लगाने की चुनाव आयोग की विशेष मांग को भी सिरे से ठुकरा दिया। इस कड़े रुख के बाद गोवा मतदाता सूची विवाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला बड़ा मामला बन गया है।

फॉर्म 8 भरने के बावजूद नाम काटने पर अदालत की फटकार

मामले के तथ्यों के अनुसार, सालगांवकर परिवार के सदस्यों ने अपना निवास स्थान बदलने के बाद विधिक रूप से ‘फॉर्म-8’ भरकर अपना नया पता दर्ज कराने का आवेदन किया था। लेकिन चुनाव अधिकारियों ने उनके आवेदन को खारिज करते हुए एसआईआर के दौरान उनके नाम ही मतदाता सूची से गायब कर दिए। चुनाव आयोग ने अदालत में यह दलील दी कि एसआईआर नियमों के तहत मतदाताओं को फॉर्म-8 के साथ अलग से एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करना अनिवार्य था और चूंकि परिवार ने वह फॉर्म जमा नहीं किया था, इसलिए उन्हें एक नए मतदाता की तरह ‘फॉर्म-6’ भरने को कहा गया था।

अदालत ने निर्वाचन आयोग के इस तर्क को पूरी तरह अतार्किक करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 केवल उन लोगों के लिए होता है जो जीवन में पहली बार मतदाता बन रहे हैं, जबकि पहले से पंजीकृत मतदाताओं के पते में बदलाव या त्रुटि सुधार के लिए फॉर्म-8 का ही वैधानिक उपयोग किया जाता है। इस प्रकार मनमाने ढंग से नाम काटना पूरी तरह गलत पाया गया और गोवा मतदाता सूची विवाद में आयोग बैकफुट पर आ गया।

‘योग्य नागरिकों को सूची से बाहर होने से बचाना आयोग का संवैधानिक धर्म’

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर से जुड़ी अन्य याचिकाओं के लंबित होने का हवाला देकर इस मामले की सुनवाई टालने का अनुरोध किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने आयोग की इस अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि गोवा का मामला अन्य राज्यों से भिन्न है, क्योंकि यहां मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पहले ही संपन्न हो चुकी है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी वास्तविक और योग्य भारतीय नागरिक को मतदाता सूची से बाहर होने से बचाना चुनाव आयोग का प्राथमिक और सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व है, न कि तकनीकी पेच फंसाकर उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित करना। इस प्रकार सामने आए गोवा मतदाता सूची विवाद ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासनिक नियमों की आड़ में नागरिकों के मताधिकार को छीना नहीं जा सकता।