एक तरफ अरब देशों से रक्षा समझौता, दूसरी तरफ ईरान से दोस्ती
पाकिस्तान एक तरफ सऊदी अरब और तुर्किये के साथ ऐसा रक्षा ढांचा खड़ा कर रहा है, जिसे कई विश्लेषक ‘सुन्नी NATO’ तक कह रहे हैं…तो दूसरी तरफ वही पाकिस्तान शिया बहुल ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश कर रहा है।
7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौता किया। इसके तहत एक सदस्य पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि तीनों देशों ने इसे किसी धार्मिक या सैन्य गुट के तौर पर पेश करने से इनकार किया है। ऐसे में सवाल बड़ा है—क्या पाकिस्तान एक साथ अरब देशों का रणनीतिक साझेदार और ईरान का भरोसेमंद बिचौलिया बन सकता है? और सबसे बड़ा सवाल—सुन्नी देशों के साथ बढ़ती सैन्य नजदीकी के बीच पाकिस्तान शिया ईरान का भरोसा आखिर कैसे जीतेगा?
‘सुन्नी NATO’ के बीच ईरान का भरोसा कैसे जीतेगा पाकिस्तान?
दरअसल पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हालिया मक्का रक्षा समझौते को कई सिक्योरिटी एक्सपर्ट ‘सुन्नी NATO’ बता रहे हैं। यह समझौता सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर आधारित है। यानी कि किसी एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि सुन्नी बहुल देशों का यह गठबंधन शिया बहुल ईरान का भरोसा कैसे जीत पाएगा? ईरान उस पाकिस्तान पर कैसे भरोसा करेगा जो इस डिफेंस पैक्ट का अहम पार्टनर है?
बता दें कि सऊदी अरब और तुर्किये घोर सुन्नी मुस्लिम राष्ट्र हैं। ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि ऐसे ही माहौल में पाकिस्तान ईरान-अमेरिका के बीच मीडिएशन का दूसरा राउंड शुरू करने की कोशिश कर रहा है। इधर ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी अरब की संपत्तियों और उनके ठिकानों पर लगातार हमला कर रहे हैं। ईरान भी अमेरिकी हमलों के जवाब में जब-तब सऊदी प्रतिष्ठानों पर हमला करता रहता है।
ईरान-अमेरिका के बीच फिर बिचौलिया बनना चाहता है पाकिस्तान
अब पाकिस्तान ईरान-अमेरिका की इसी लड़ाई में फिर से बिचौलिया बनने चाहता है। इससे पहले पाकिस्तान ईरान-अमेरिका जंग में मध्यस्थ बन चुका है। तब बहुत धूमधाम से इस्लामाबाद समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था। लेकिन कुछ ही हफ्तों में यह समझौता मुंह के बल गिरा।
अब पाकिस्तान फिर से बिचौलिया बनने की कोशिश में है। इसी सिलसिले में पाकिस्तान के गृह मंत्री और शहबाज शरीफ कैबिनेट के एकमात्र शिया मंत्री मोहसिन नकवी तेहरान पहुंचे हैं। दरअसल पाकिस्तान की स्थिति अनोखी है। वह ईरान से लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है और उसके अंदर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी रहती है। इसलिए इस्लामाबाद किसी भी सूरत में तेहरान से खुली दुश्मनी नहीं चाहता।
मोहसिन नकवी फिर सक्रिय कर रहे हैं पाकिस्तान का मध्यस्थता चैनल
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाई। उसने दोनों पक्षों के बीच बातचीत के द्वार खुले रखे और इस्लामाबाद में वार्ता की मेजबानी भी की। मोहसिन नकवी एक बार फिर से पाकिस्तान के लिए वही रोल चाहते हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने बुधवार को इस्लामाबाद में एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि वह क्षेत्र के दूसरे देशों की मदद से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहा है।
नकवी की तेहरान यात्रा के बारे में पूछे जाने पर अंद्राबी ने कहा, “पाकिस्तान इस संकट को सुलझाने के लिए अपने मित्र देशों के साथ मिलकर ईमानदारी से कोशिशें कर रहा है। “उन्होंने कहा, “पाकिस्तान सीधे और परोक्ष तरीकों से बाधा डालने वालों का मुकाबला करना जारी रखेगा और सभी लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए रचनात्मक बातचीत को आगे बढ़ाएगा।”
तेहरान में ईरानी नेतृत्व को दिया भरोसे का संदेश
एक राजनयिक सूत्र के अनुसार, ईरानी राष्ट्रपति के साथ अपनी बैठक में नकवी ने पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को “मजबूत और अटूट” बताया और तेहरान के साथ संबंधों के व्यापक विकास को आगे बढ़ाने के लिए इस्लामाबाद के “गंभीर संकल्प और इच्छाशक्ति” को व्यक्त किया।
राष्ट्रपति पेज़ेशकियन ने कहा कि ईरान-पाकिस्तान संबंध दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को पूरा करेंगे और साथ ही क्षेत्रीय स्थिरता और सुरक्षा में भी योगदान देंगे। दरअसल नकवी की यह पहल इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि पाकिस्तान खुद को मुस्लिम दुनिया में एक प्रभावशाली ताकत के तौर पर पेश करता रहा है। हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब, तुर्किये, कतर और अन्य सुन्नी देशों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है।
पाकिस्तान के लिए ईरान-अमेरिका डील फिर शुरू कराना क्यों जरूरी?
नकवी के तेहरान दौरे का सबसे अहम मुद्दा जून में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ वह समझौता है, जिसके तहत उच्चस्तरीय बातचीत के लिए 60 दिनों की खिड़की खोलने की कोशिश हुई थी। पाकिस्तान इस प्रक्रिया में गारंटर की भूमिका में था। लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और अमेरिका-ईरान के बीच फिर सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बाद यह प्रक्रिया पटरी से उतर गई। पाकिस्तान अब इस बातचीत को दोबारा शुरू कराने के लिए अपना मध्यस्थता चैनल सक्रिय रखना चाहता है। हालांकि इस दिशा में उसे अभी तक बड़ी सफलता नहीं मिली है।
होर्मुज विवाद ने पाकिस्तान की राह और मुश्किल की
इसकी एक बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का विवाद है। दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम यह समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के बीच स्थित है। ईरान और ओमान के बीच फिलहाल इस रास्ते से सुरक्षित जहाजरानी को लेकर अलग बातचीत चल रही है। ऐसे में पाकिस्तान को सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच राजनीतिक दूरी कम करने की चुनौती नहीं है, बल्कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच अपने सभी रणनीतिक रिश्तों को संतुलित रखना भी जरूरी है।
क्या पाकिस्तान बन सकता है अमेरिका-ईरान और खाड़ी देशों के बीच पुल?
कुल मिलाकर तेहरान को भरोसा दिलाने के लिए पाकिस्तान को यह साबित करना होगा कि सऊदी अरब के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी ईरान के खिलाफ रणनीतिक मोर्चा नहीं है।
क्योंकि अगर पाकिस्तान यह संतुलन साधने में कामयाब होता है, तो वह सिर्फ एक क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं रहेगा—बल्कि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के बीच एक अहम कूटनीतिक पुल बन सकता है। लेकिन अगर इस्लामाबाद की अरब देशों के साथ बढ़ती सैन्य नजदीकी तेहरान को अपने खिलाफ जाती दिखाई देती है, तो पाकिस्तान के लिए ईरान का भरोसा बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या पाकिस्तान एक साथ सऊदी अरब और तुर्किये का रणनीतिक साझेदार और ईरान-अमेरिका के बीच भरोसेमंद मध्यस्थ बन पाएगा?


