नरेंद्र मोदी की CM बनने की कहानी: उपचुनाव में हार और वाजपेयी का फोन

  • October 7, 2026
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नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने की कहानी

नरेंद्र मोदी के राजनीतिक नेतृत्व के 25 साल

7 अक्टूबर 2001… ये वो तारीख है, जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने। सीएम बनने से पहले तक उनके पास सत्ता चलाने का कोई अनुभव नहीं था। हां, संगठन चलाने का लंबा एक्सपीरियंस जरूर था। 1985 में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बीजेपी में आए। तब उन्हें संगठन मंत्री बनाया गया। 15 सालों में मोदी गुजरात ईकाई से बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी तक पहुंचे।

अक्टूबर 2001 को सीधे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। साल 2001 से साल 2014 तक नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम रहे। 26 मई 2014 को मोदी सीधे देश के प्रधानमंत्री बने। ये वो 25 साल हैं, जब नरेंद्र मोदी एक भी चुनाव नहीं हारे। नरेंद्र मोदी की लीडरशिप के ये 25 साल पूरे होने को बीजेपी ने ‘सेवा संकल्प अभियान’ नाम दिया। दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में भव्य आयोजन हुआ। पीएम मोदी ने इसमें ऐतिहासिक भाषण दिया।

7 अक्टूबर 2001 में जब नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब वे न तो किसी सदन के सदस्य थे और न ही उनके पास सरकार चलाने का कोई पिछला प्रशासनिक अनुभव था. उस वक्त भाजपा के भीतर और गुजरात के सियासी हालात ऐसे बन चुके थे कि पार्टी के पास चेहरे और नेतृत्व को बदलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। तो आखिर साल 2001 में भाजपा के भीतर वे कौन सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने संगठन में काम करने वाले संघ के एक पुराने प्रचारक को गुजरात की कमान सौंप दी?

भुज भूकंप के बाद गुजरात में बिगड़े हालात

दरअसल जनवरी 2001 में गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था. उस वक्त केशूभाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री थे. भूकंप के बाद राहत और बचाव कार्य जिस सुस्ती और बदहाली से चला, उसने जनता के गुस्से को भड़का दिया। भूकंप के बाद बने माहौल की सच्चाई जल्द ही चुनावी नतीजों में सामने आ गई. सितंबर-अक्टूबर 2001 में हुए उपचुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. सब्र का बांध तब टूटा जब पार्टी साबरमती विधानसभा सीट और आनंद लोकसभा सीट पर कांग्रेस से चुनाव हार गई।

बता दे की साबरमती को भाजपा का गढ़ माना जाता था . वहां हारने का मतलब था कि भाजपा के हाथ से गुजरात का जनाधार पूरी तरह खिसक रहा था. उस वक्त भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व (अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी) समझ गए थे कि अगर 2002 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले गुजरात में नेतृत्व नहीं बदला गया, तो पार्टी का राज्य से सूपड़ा साफ होना तय है।

दरसल केशूभाई पटेल कभी गुजरात में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हुआ करते थे, लेकिन 2001 तक आते-आते वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे. इसके अलावा उनके इर्द-गिर्द के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे. गुजरात भाजपा उस वक्त भीषण गुटबाजी का शिकार थी. एक तरफ केशूभाई का गुट था, तो दूसरी तरफ शंकरसिंह वाघेला के पार्टी छोड़ने के बाद भी उनके समर्थक और बागी सुर अंदर ही अंदर सुलग रहे थे. पार्टी के कार्यकर्ता पूरी तरह निराश हो चुके थे और संगठन बिखर रहा था. केशूभाई प्रशासनिक तौर पर बेहद ढीले साबित हो रहे थे और वे इस अंदरूनी कलह पर काबू पाने में पूरी तरह नाकाम थे।

गुजरात भाजपा में नरेंद्र मोदी की भूमिका

वही नरेंद्र मोदी उस वक्त दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्रियों में से एक थे और हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों का काम देख रहे थे. वे दिल्ली में जरूर थे, लेकिन गुजरात भाजपा की रग-रग से वाकिफ थे. 1995 में जब भाजपा ने पहली बार गुजरात में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब उसकी रणनीति और चुनावी ताने-बाने के पीछे नरेंद्र मोदी का ही दिमाग था।

जब दिल्ली में आलाकमान ने गुजरात में चेहरा बदलने का फैसला किया, तो शुरुआत में मामला इतना सीधा नहीं था. केशूभाई पटेल आसानी से कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे. वे मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के सख्त खिलाफ थे. वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई की किताब ‘2014: द इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया’ और कई वरिष्ठ पत्रकारों के संस्मरणों के मुताबिक, शुरुआत में मोदी को केशूभाई की सरकार में उप-मुख्यमंत्री बनाकर भेजने का प्रस्ताव दिया गया था. लेकिन मोदी ने इस आधे-अधूरे ऑफर को साफ खारिज कर दिया.

मोदी ने पूरी जिम्मेदारी के साथ गुजरात जाने की शर्त रखी

नरेंद्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी से साफ कहा, “अगर मुझे जाना है, तो पूरी जिम्मेदारी के साथ जाऊंगा. आधे-अधूरे काम में मैं हाथ नहीं डालूंगा. अगर आप चाहते हैं कि मैं गुजरात संभालूं, तो मुझे काम करने की पूरी आजादी देनी होगी.” मोदी जानते थे कि उप-मुख्यमंत्री बनकर वे कभी भी अपनी नई नीतियां लागू नहीं कर पाएंगे और पुरानी गुटबाजी का शिकार हो जाएंगे।

वही अक्टूबर 2001 में जब मोदी ने गुजरात की कमान संभाली, तब राजनीतिक पंडितों का मानना था कि वे एक अस्थायी मुख्यमंत्री हैं. कहा जा रहा था कि वे 2002 के चुनाव तक सिर्फ डैमेज कंट्रोल करने आए हैं. वे खुद विधायक भी नहीं थे, इसलिए उन्हें राजकोट से उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचना पड़ा था।

सत्ता में आते ही नरेंद्र मोदी ने प्रशासन में बदलाव शुरू किया

लेकिन मोदी ने सत्ता में आते ही प्रशासन का हुलिया बदलना शुरू कर दिया. उन्होंने सरकारी मशीनरी में अनुशासन कायम किया, भूकंप पुनर्वास के काम में तेजी लाए और पार्टी कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया. उसके बाद जो हुआ, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का हिस्सा है. 2001 में एक बेहद नाजुक, बिखरी हुई और असंतोष से भरी राजनीतिक स्थिति के बीच ‘इमरजेंसी मैनेजर’ के रूप में गुजरात भेजे गए नरेंद्र मोदी ने उस मौके को किस तरह भुनाया, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक अस्थायी व्यवस्था के तहत गुजरात भेजे गए मोदी ने ऐसी शुरुआत की कि वे उसके बाद से आज तक कभी कोई चुनाव नहीं हारे और पिछले 25 सालों से लगातार सत्ता के केंद्र में बने हुए हैं।

मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक नरेंद्र मोदी का सफर

मोदी चाहे, मुख्यमंत्री रहे हों या आज प्रधानमंत्री, वे बखूबी जानते हैं कि अपने चिंतन को लोगों के बीच कैसे पहुंचाया जाए. हर रविवार होने वाली ‘मन की बात’ से लेकर बुधवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में हुई ‘विकसित भारत संकल्प सभा’, प्रधानमंत्री मोदी जनता में जोश भरने के लिए “वी विल डू इट” जैसा नारा देते हैं. नेतृत्व के रूप में अपने 25 साल के लिए जनता का आभार मानते हैं। वर्ष 2001 हो या 2026, मोदी के लक्ष्य हमेशा स्पष्ट रहे हैं, जिनके बल पर वे शीर्ष पर कायम हैं।