दिल्ली में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का विरोध तेज
देश की राजधानी दिल्ली में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। विपक्ष की मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से इस्तीफा दें। लेकिन सवाल ये है कि अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देने से इनकार कर देते हैं, तो विपक्ष के पास आखिर कौन-कौन से विकल्प बचेंगे? क्या विपक्ष सड़क से संसद तक अपना आंदोलन तेज कर सकता है? क्या संसद में महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया का सहारा लिया जा सकता है? और क्या इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा फैसला सुना सकता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव में धांधली के आरोपों को लेकर चारों तरफ से मुश्किलों में घिरते जा रहे हैं। एक तरफ उनके इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन जारी है तो वहीं सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया। यह नोटिस एक याचिका पर सुनवाई करने के दौरान जारी किया गया जिसमें आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग के कई फैसले एकतरफा लिए गए थे। हालांकि, कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से हटाने या सस्पेंड करने का कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया।
SIR के विरोध में विपक्ष ने निकाला मार्च
दरअसल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दल सड़कों पर हैं। SIR के विरोध में और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मंगलवार को कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने मार्च निकाला। मार्च के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हाथ में ‘ज्ञानेश इट्स डन ब्रो’ वाला पोस्टर था। पुलिस ने रोका तो राहुल-प्रियंका 8 घंटे से ज्यादा समय तक आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठे रहे। प्रदर्शन में तिरंगे के सामने प्रियंका तनकर खड़ी हो गईं। राहुल ने उन्हें एनर्जी ड्रिंक ऑफर किया। लगभग पूरे दिन मंगलवार को विपक्ष एक्शन मोड में दिखा।
सभी विपक्षी दल एक सुर में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। हालांकि अभी तक इस्तीफे को लेकर या विपक्ष की मांग पर ज्ञानेश कुमार की तरफ से कोई बयान नहीं आया है। अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो विपक्ष के पास और क्या-क्या कानूनी और संवैधानिक विकल्प है?
अगर इस्तीफा नहीं हुआ तो विपक्ष क्या कर सकता है?
अगर ऐसा होता है तो राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष एकजुट होकर एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे में इसे बदलने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपना सकता है। राजनीतिक लामबंदी और संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए विपक्ष मुख्य रूप से इन संवैधानिक विकल्पों पर काम करने की तैयारी कर सकता है। यदि प्रशासनिक इस्तीफे की मांग पूरी नहीं होती है, तो विरोध प्रदर्शन को बड़े स्तर पर सड़कों पर लाने पर विपक्ष विचार कर सकता है। NSUI और वामपंथी छात्र संगठनों के माध्यम से निर्वाचन सदन के घेराव, जंतर-मंतर पर रैलियों और ‘जेल भरो’ आंदोलनों की तैयारी की जा सकती है।
राहुल गांधी द्वारा दिए गए संदेश “यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि वोट की चोरी और लोकतंत्र पर हमला है” इसको सीधे जनता के बीच ले जाकर जन-आंदोलन का रूप दिया जाने पर काम किया जा सकता है। इस तरह अगर इस्तीफे की मांग पूरी नहीं होती है तो विपक्ष के सामने राजनीतिक आंदोलन को और व्यापक करने का विकल्प भी मौजूद रह सकता है।
विपक्षी एकजुटता के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है चुनाव आयोग
दरअसल चुनाव आयोग की आत्मनिर्णय का मुद्दा विपक्षी एकजुटता के लिए एक ऐसा मुद्दा है जिसपर सभी एकमत हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और वामदलों से लेकर क्षेत्रीय पार्टी तक सभी दल विचारधारात्मक मतभेदों को भुलाकर एक साझा मंच पर आकर इस मुद्दे को उठा सकते हैं और केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान चला सकते हैं।
यदि राजनीतिक दबाव के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने रहते हैं, तो भारतीय संविधान और न्यायिक व्यवस्था विपक्ष को कई कानूनन विकल्प प्रदान करती है। यानी मामला केवल सड़क पर होने वाले विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह सकता। विपक्ष के सामने राजनीतिक लामबंदी के साथ-साथ संवैधानिक और कानूनी रास्तों पर आगे बढ़ने का विकल्प भी हो सकता है।
अनुच्छेद 324 के तहत CEC को हटाने की प्रक्रिया
जैसे संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है, जो उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर लागू होती है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा के कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा के 50 सांसद हस्ताक्षरयुक्त नोटिस अध्यक्ष/सभापति को देंगे। प्रस्ताव स्वीकार होने पर सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रसिद्ध कानूनविद की 3-सदस्यीय जांच समिति ‘प्रमाणित दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ के आरोपों की जांच करेगी।
समिति की रिपोर्ट में पुष्टि होने के बाद ही संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कराया जाना अनिवार्य है। इस पूरी प्रक्रिया से साफ है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक व्यवस्था सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई की तरह नहीं है। इसके लिए निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होता है।
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया कितनी सख्त है?
दरअसल संविधान में CEC को हटाने की प्रक्रिया बहुत सख्त है। कोर्ट ऐसे किसी पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ लगे आरोप को सीधे पद से हटाने के बराबर नहीं मान सकता। हाल ही में (अक्टूबर 2026 में) चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एकतरफा फैसले लेने के आरोपों पर दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान उन्हें तुरंत सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया है। इस मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर कोई फैसला नहीं दे सकती और यदि जांच में चुनाव आयोग के कोई फैसले कानून या संविधान के खिलाफ पाए जाते हैं, तो कोर्ट उन्हें रद्द या निरस्त कर सकता है। लेकिन कोर्ट में दायर याचिका में पद से हटाने और अंतरिम रोक लगाने के बीच अंतर करने की कोशिश की गई है।
चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होने पर क्या व्यवस्था है?
वहीं ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 18 कहती है कि आयोग को अपना कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से करना चाहिए। अगर CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होता है, तो मामले का फैसला बहुमत से किया जाएगा। इस प्रावधान के बीच चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष की मांग को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। विपक्ष की ओर से जहां चुनाव आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं इस पूरे मामले में न्यायिक प्रक्रिया भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति क्या है?
गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संविधान द्वारा सुरक्षित है। चुनाव आयोग से यह उम्मीद की जाती है कि वह सरकार की (कार्यपालिका) से स्वतंत्र होकर काम करे। अनुच्छेद 324 चुनावों की “देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण” की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को सौंपता है, न कि व्यक्तिगत रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को। इसमें यह भी प्रावधान है कि जब अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है, तो CEC आयोग के अध्यक्ष के रूप में काम करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इस संवैधानिक व्यवस्था के कारण मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को लेकर किसी भी तरह की कार्रवाई के लिए निर्धारित प्रक्रिया का महत्व काफी बढ़ जाता है।
अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो क्या होगा?
तो साफ है कि अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं, तो विपक्ष के सामने रास्ते पूरी तरह बंद नहीं होते। अगर विपक्ष को लगता है कि चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं, तो वह इस मुद्दे को आगामी चुनावों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकता है। यानी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तत्काल पूरी नहीं होती, तो लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति के इस्तीफे तक सीमित नहीं रह सकती।
यह चुनाव सुधार, मतदाता सूची, चुनाव आयोग की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। ऐसे में विपक्ष के सामने एक तरफ सड़क पर आंदोलन को आगे बढ़ाने का विकल्प है, तो दूसरी तरफ संसद और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ने की संभावनाएं भी चर्चा में हैं।
अब विपक्ष के सामने कौन-कौन से रास्ते हैं?
फिलहाल इस पूरे मामले में विपक्ष की रणनीति कई स्तरों पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ दिल्ली में प्रदर्शन और मार्च के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है। दूसरी तरफ विपक्षी दल इस मुद्दे को चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जोड़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की बात कर रहे हैं।
वहीं संवैधानिक स्तर पर अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया का विकल्प भी मौजूद है, हालांकि इसके लिए निर्धारित संसदीय और जांच प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होगा। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं के जरिए चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने का रास्ता भी सामने है। दिए गए विवरण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने या सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया है।
क्या यह लड़ाई सिर्फ ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक सीमित रहेगी?
अब सबसे बड़ा सवाल है कि —क्या विपक्ष इन विकल्पों को सिर्फ राजनीतिक विरोध तक सीमित रखता है, या फिर कोई ठोस संवैधानिक और कानूनी कदम भी उठाता है? और इसी के साथ अब निगाहें इस बात पर हैं कि चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच बढ़ता यह टकराव आने वाले दिनों में किस बड़े राजनीतिक मोड़ तक पहुंचता है। अगर इस्तीफे की मांग पूरी नहीं होती है, तो विपक्ष के पास आंदोलन को व्यापक बनाने, राजनीतिक दबाव बढ़ाने और उपलब्ध संवैधानिक तथा कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करने के रास्ते मौजूद हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से इस्तीफे की मांग पर कोई बयान नहीं आया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका, चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष के आरोप और दिल्ली में जारी विरोध प्रदर्शन के कारण यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि विपक्ष अपनी मांग को किस दिशा में आगे ले जाता है और चुनाव आयोग से जुड़े इस विवाद का राजनीतिक तथा संवैधानिक स्तर पर क्या असर सामने आता है।


