भारत-ईरान ट्रेड डील पर मार्को रुबियो का बयान
भारत और ईरान की दोस्ती को लेकर अमेरिका की तरफ से एक बड़ा बयान सामने आया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता हो रहा है। रुबियो का ये बयान ऐसे वक्त आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से मुलाकात की है। मुलाकात के बाद से ही इस बात की चर्चा तेज थी कि क्या भारत और ईरान के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को लेकर कोई बड़ी डील आगे बढ़ रही है।
दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियन की मुलाकात ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। जून में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम समझ बनी थी, लेकिन उसके बाद फिर तनाव बढ़ गया। अगस्त के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव भी हुआ। ऐसे माहौल में मोदी-पेज़ेश्कियन मुलाकात को कूटनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है।
मोदी-पेज़ेश्कियन मुलाकात में किन मुद्दों पर जोर रहा?
बिश्केक में हुई इस मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत और कूटनीति के जरिए समस्याओं का समाधान निकालने पर जोर दिया। भारत की तरफ से क्षेत्र में शांति, स्थिरता, व्यापार और समुद्री रास्तों की स्वतंत्रता को अहम बताया गया। खास तौर पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस समुद्री मार्ग से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है और भारतीय जहाजरानी तथा ऊर्जा सुरक्षा भी इससे जुड़ी हुई है।
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यही वजह है कि मोदी और पेज़ेश्कियन की मुलाकात को सिर्फ दो देशों के नेताओं की सामान्य बैठक के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध, ऊर्जा सुरक्षा और भारत के रणनीतिक हित जैसे कई बड़े मुद्दे हैं। भारत लंबे समय से ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, जबकि दूसरी तरफ अमेरिका भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है।
अमेरिका की भारत-ईरान रिश्तों पर क्या चिंता है?
इसी बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से जब पूछा गया कि क्या भारत और ईरान किसी व्यापारिक व्यवस्था पर काम कर रहे हैं, तो उनका जवाब था—उन्हें ऐसा नहीं लगता कि दोनों देशों के बीच कोई व्यापार समझौता है। रुबियो ने यह भी कहा कि अलग-अलग देश अपनी विदेश नीति खुद तय करते हैं और दुनिया के कई देश ईरानी सरकार के साथ बातचीत करते हैं। लेकिन अमेरिका की चिंता वहां शुरू होती है जहां किसी देश की गतिविधियां ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद करती हैं।
रुबियो ने प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी रुख भी स्पष्ट किया। उनका कहना था कि अगर कोई देश ईरान को इस तरह की व्यवस्था मुहैया कराता है जिससे वह प्रतिबंधों को दरकिनार कर सके, तो अमेरिका उसके खिलाफ भी कार्रवाई कर सकता है। यानी वॉशिंगटन का संदेश साफ है—ईरान से संबंध रखना एक बात है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने में मदद करना दूसरी बात।
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ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध क्यों अहम हैं?
अब सवाल ये है कि अमेरिका को भारत-ईरान रिश्तों को लेकर इतनी चिंता क्यों है। इसकी सबसे बड़ी वजह है ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध और ईरान की तेल अर्थव्यवस्था। अमेरिका लंबे समय से कोशिश कर रहा है कि ईरान की तेल बिक्री और वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बनाए रखा जाए। ऐसे में अगर भारत और ईरान के बीच व्यापारिक रास्ते मजबूत होते हैं, तो वॉशिंगटन इस पर बारीकी से नजर रखेगा।
हालांकि भारत की स्थिति अमेरिका से अलग है। भारत ईरान के साथ अपने संबंधों को क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों के नजरिए से देखता है। ईरान भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भारत ने अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान के साथ संवाद के रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं किया है।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत और ईरान के रिश्तों में चाबहार बंदरगाह का भी खास महत्व है। चाबहार भारत को ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है। भारत के लिए ये सिर्फ एक बंदरगाह परियोजना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए दिल्ली के लिए तेहरान के साथ संबंध बनाए रखना लंबे समय से विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है।
दूसरी तरफ ईरान भी भारत को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच तेहरान अपने आर्थिक और कूटनीतिक विकल्पों को व्यापक रखना चाहता है। चीन और रूस के साथ ईरान के रिश्ते पहले से ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत के साथ संपर्क भी उसकी रणनीतिक गणना का हिस्सा है। ऐसे में मोदी और पेज़ेश्कियन की बैठक दोनों देशों के लिए संदेश देती है कि मुश्किल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद संवाद जारी है।
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भारत-ईरान रिश्तों पर आगे क्या होगा?
फिलहाल तस्वीर यही है कि भारत-ईरान ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन किसी नई बड़ी व्यापारिक डील की पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिका की नजर ईरान से जुड़े हर आर्थिक रास्ते पर है, जबकि भारत अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के मुताबिक विदेश नीति को आगे बढ़ा रहा है।
मोदी-पेज़ेश्कियन मुलाकात ने जहां भारत-ईरान रिश्तों की अहमियत फिर सामने रखी है, वहीं मार्को रुबियो के बयान ने ये भी साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में दिल्ली और वॉशिंगटन—दोनों को ईरान के मुद्दे पर एक-दूसरे के हित और सीमाएं ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा।
FAQ
मार्को रुबियो ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता हो रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से मुलाकात की।
ईरान भारत के लिए क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशिया तथा अफगानिस्तान तक रणनीतिक पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
अमेरिका की मुख्य चिंता ईरान पर लगे प्रतिबंधों से जुड़ी है और वह ऐसी किसी व्यवस्था पर नजर रखता है जिससे ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद मिल सकती है।


