मायावती की अलग राजनीतिक स्टाइल और आकाश आनंद पर बड़ा फैसला
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पाटी की प्रमुख मायावती की अलग राजनीतिक स्टाइल है. यह तौर-तरीका न सिर्फ उनके करीबियों बल्कि कई बार उनके विरोधियों तक को हैरान करता है. मायावती कब किसे बसपा से बाहर का रास्ता दिखाकर पैदल कर दें और कब किसे फर्श से अर्श पर पहुंचा दें, इसका अंदाजा लगाना नामुमकिन होता है। मायावती की इस अलग स्टाइल का शिकार उनकी पार्टी के कई दिग्गज हो चुके हैं और अब इस फेहरिस्त में एक बार फिर से आकाश आनंद का नाम जुड़ा है.
लखनऊ स्थित बसपा मुख्यालय में पार्टी बैठक के दौरान मायावती ने अपने भतीजे और चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद को पद से हटाकर पार्टी कार्यकर्ता की भूमिका में लाकर खड़ा कर दिया है. यह तीसरा मौका है जब आकाश आनंद को इस तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ा है. वहीं, इस बैठक में आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद की मौजूदगी ने नए राजनीतिक कयासों को जन्म दे दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि मायावती आखिर आकाश आनंद पर क्यों भरोसा नहीं जता पा रही हैं और क्यों सारे पद छीनकर पैदल कर दिया है?
बसपा बनी ‘क्वालिटी कंट्रोल लैब’, आकाश आनंद बार-बार दे रहे टेस्ट
दरसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी इन दिनों किसी राजनीतिक दल से ज्यादा एक ‘क्वालिटी कंट्रोल लैब’ जैसी नजर आती है. इस लैब की एकमात्र चीफ साइंटिस्ट हैं बहन कुमारी मायावती, और उनके हर प्रयोग के एकमात्र सैंपल हैं उनके भतीजे आकाश आनंद. भारतीय राजनीति में उत्तराधिकार ट्रांसफर करने की प्रक्रिया काफी सरल मानी जाती है, जहां वरिष्ठ नेता हाथ पकड़कर कुर्सी पर बिठा देते हैं और जनता धीरे-धीरे उसकी आदत डाल लेती है.
लेकिन बसपा का मामला थोड़ा अलग है. यहां उत्तराधिकारी बनने के लिए एक कठिन राजनीतिक मैच्योरिटी टेस्ट देना पड़ता है. विडंबना यह है कि आकाश आनंद हर कुछ महीनों में यह परीक्षा देते हैं, और हर बार बुआ जी का बयान या ट्वीट आ जाता है कि सैंपल अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं हुआ है, इसलिए इसे दोबारा लैब में भेजा जा रहा है।
आकाश आनंद के राजनीतिक करियर का ग्राफ क्यों बना चर्चा का विषय?
दरसल आकाश आनंद के राजनीतिक करियर का ग्राफ अगर किसी शेयर बाजार के चार्ट पर देखा जाए, तो अनुभवी निवेशक भी अपना माथा पकड़ लेंगे. मायावती ने उन्हें एक बार नहीं, बल्कि कई बार बड़ी जिम्मेदारी सौंपी और फिर अचानक से उनसे सारे पद वापस ले लिए। आपको बता दे की दिसंबर 2023 में मायावती ने बड़े धूमधाम से आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था. उस वक्त लगा कि बसपा में नई पीढ़ी का दौर शुरू हो गया है.
आकाश ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं, आक्रामक भाषण दिए और खुद को दलित युवाओं के नए चेहरा के रूप में पेश किया. लेकिन मई 2024 में लोकसभा चुनाव के बीच में सीतापुर में दिए गए एक तीखे भाषण के बाद जब पुलिस में मामला दर्ज हुआ, तो मायावती का फरमान आ गया. उन्होंने आकाश को अपरिपक्व बताते हुए नेशनल कोऑर्डिनेटर और उत्तराधिकारी के पद से हटा दिया। चुनाव खत्म होने के बाद जून 2024 में उनकी फिर से वापसी हुई.
पद से हटाने और वापसी का सिलसिला नहीं रुका
यह सिलसिला यहीं नहीं रुका. मार्च 2025 में एक विवाद के चलते आकाश को फिर पार्टी के सभी पदों से हटाया गया और बाद में पार्टी से निष्कासित तक कर दिया गया. सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के बाद अप्रैल-मई 2025 में उनकी दोबारा वापसी हुई और उन्हें चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया गया. इसके बाद अब फिर से मायावती ने घोषणा कर दी है कि आकाश में अभी राजनीतिक परिपक्वता की कमी है, इसलिए उनसे संगठन की बड़ी जिम्मेदारियां वापस ली जाती हैं और वे सिर्फ एक कार्यकर्ता के रूप में काम करेंगे।
आकाश आनंद का Gen-Z अंदाज क्यों बना मायावती के लिए चुनौती?
दरसल आकाश आनंद की पढ़ाई लंदन में हुई है. उनका पहनावा, उनकी भाषा और उनका अंदाज पारंपरिक बसपा नेताओं से काफी अलग है. वे सूट-बूट में दिखते हैं, सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं और अपने भाषणों में बेरोजगारी, शिक्षा और युवाओं के मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाते हैं. उनका यह ‘Gen-Z’ तेवर दलित युवाओं को अपनी ओर खींचता है. लेकिन जैसे ही यह युवा वर्ग आकाश के पीछे लामबंद होने लगता है, मायावती का ब्रेक लग जाता है. इससे बसपा का नया और युवा समर्थक वर्ग बेहद नाराज और हताश है. उन्हें लगता है कि जिस दौर में अखिलेश यादव और राहुल गांधी आक्रामक राजनीति कर रहे हैं, उस दौर में उनके नेता को घर में ही ‘पॉलिटिकल अरेस्ट’ करके रखा जा रहा है. जब पार्टी ही अपने युवा नेता को गंभीरता से नहीं ले रही, तो जनता क्यों लेगी?
बसपा अपने सबसे बुरे दौर से क्यों गुजर रही है?
दरसल यूपी की राजनीति में कभी ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ का नारा देकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य, 2019 में सपा के साथ गठबंधन करके 10 सीटें, और 2024 में फिर से शून्य. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ 1 सीट पर सिमटकर रह गई थी.
ऐसे में बुआ और भतीजे की यह बिगड़ी हुई केमिस्ट्री पार्टी के कार्यकर्ताओं को भ्रमित कर रही है. एक तरफ पार्टी का कैडर गायब हो रहा है, वोट बैंक खिसक रहा है, और दूसरी तरफ पार्टी का पूरा नेतृत्व इस खेल में उलझा है कि आकाश आनंद आज मैच्योर हैं या कल होंगे. जब सेनापति ही मैदान में बार-बार बदला जाएगा, तो सिपाही किसके भरोसे लड़ाई लड़ेंगे? यह मिसकैमिस्ट्री बसपा को मुख्य मुकाबले से बाहर धकेल रही है. सवाल उठ रहा है कि मायावती के पास फिलहाल खोने के लिए क्या है, जो वे आकाश आनंद को लेकर इतनी आशंकित हो रही हैं?
मायावती की कड़क छवि का आकाश आनंद पर क्या असर पड़ रहा है?
हालाँकि यह एक ऐतिहासिक सच है कि मायावती का सियासी कद बहुत बड़ा है. भले ही उनकी पार्टी चुनाव हार रही हो, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके नाम का एक अलग ही खौफ और सम्मान रहा है. जब वे बोलती हैं, तो प्रशासनिक अमला और विरोधी दल दोनों ध्यान से सुनते हैं. लेकिन त्रासदी यह है कि मायावती अपनी इसी ‘कड़क छवि’ का इस्तेमाल जब अपने ही भतीजे पर करती हैं, तो उसका असर उल्टा होता है।
जब बसपा सुप्रीमो खुद दुनिया के सामने यह स्वीकार कर लेती हैं कि उनका उत्तराधिकारी अभी समझदार नहीं हुआ है, तो वे अनजाने में ही सही, आकाश के राजनीतिक भविष्य पर ‘अयोग्यता’ का ऐसा ठप्पा लगा देती हैं. फिलहाल बसपा की मैच्योरिटी टेस्टिंग लैब से आकाश आनंद को कब ‘पासिंग सर्टिफिकेट’ मिलेगा, यह तो बुआ जी ही जानें. लेकिन इतना तय है कि अगर यह लैब ऐसे ही चलती रही, तो जब तक आकाश ‘मैच्योर’ होंगे, तब तक शायद टेस्ट देने के लिए पार्टी ही नहीं बचेगी।


