BJP के सामने राहुल गांधी की एंटी-इनकंबेंसी वाली रणनीति क्यों नहीं चली?

  • September 26, 2026
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BJP के सामने राहुल गांधी की एंटी-इनकंबेंसी रणनीति

एंटी-इनकंबेंसी क्या है और चुनाव में क्यों होती है चर्चा?

एंटी-इनकंबेंसी यानी सत्ता में बैठे दल के खिलाफ पैदा होने वाली नाराज़गी। चुनावों में ये शब्द जितना आसान सुनाई देता है, इसकी राजनीति उतनी ही पेचीदा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए ये पूछा कि नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी आखिर क्यों नहीं दिखती? लेकिन चुनावी इतिहास एक दूसरी तस्वीर भी दिखाता है—सिर्फ एंटी-इनकंबेंसी का होना काफी नहीं, उसे वोट में बदलना भी पड़ता है। और फिर सवाल उठता है—क्या विपक्ष हमेशा सत्ता की नाराज़गी को अपने पक्ष में भुना पाता है? एंटी-इनकंबेंसी यानी सत्ताधारी के खिलाफ माहौल। जिसकी चर्चा सबसे ज्यादा चुनाव से पहले या फिर चुनाव परिणामों के विश्लेषण में की जाती है। खासतौर पर तब, जब कोई पार्टी चुनाव में अपनी सत्ता न बचा पाई हो।

मोदी सरकार के बाद प्रो-इनकंबेंसी की चर्चा

लेकिन, जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तब से लोकसभा चुनाव ही नहीं, विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा जिस शब्द के इर्द-गिर्द होती है, वह है- प्रो इनकंबेंसी। खासकर उत्तर भारत, और उसमें भी हिंदी पट्टी वाले राज्यों में। राहुल गांधी इसे असाधारण मानते हैं। कहते हैं यह स्वाभाविक नहीं है। ये साजिश है। चुनाव आयुक्तों के खुलासे के बाद यह साबित हो गया है। राहुल गांधी कहते हैं कि देश के बड़े-बड़े राजनेता एंटी-इनकंबेंसी का शिकार बने हैं। चुनाव हारते रहे हैं। लेकिन, मोदी और शाह अपने भाषणों में 50 साल, 30 साल, 15 साल सरकार में बने रहने की बात करते हैं।

ऐसा क्या है कि इनके मामले में एंटी-इनकंबेंसी काम नहीं करती। वे इसके पीछे चुनाव आयोग की कथित बेइमानी को दोष देते हैं। लेकिन, उनका ये लॉजिक हफ्ताभर पहले आए दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव नतीजों में धराशायी हो जाता है। जहां कांग्रेस की स्टूडेंट विंग NSUI चारों पदों पर चारों खाने चित्त हो जाती है। उस ABVP के सामने जो लंबे अरसे दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र संघ पर काबिज है।

DUSU चुनाव और एंटी-इनकंबेंसी का सवाल

ये भी नहीं कहा जा सकता कि चुनाव में धांधली हुई है। क्योंकि, DUSU के चुनाव तो ज्ञानेश कुमार वाला चुनाव आयोग नहीं करवाता। यानी, तमाम Gen-Z आंदोलन, पेपर लीक के मुद्दे, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने के बावजूद बीजेपी समर्थित ABVP अपनी बात छात्रों तक पहुंचाने में कामयाब रहता है। और ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रमों की झड़ी लगा देने वाले राहुल गांधी की पार्टी नाकाम।

ऐसा इसलिए क्योंकि, सिर्फ एंटी-इनकंबेंसी से चुनाव नहीं जीता जाता। चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है। जिसमें उम्मीदवारों का चयन, सत्ता पक्ष के खिलाफ गठबंधन, और भी कई गुणा-भाग काम आता है। हालाँकि कोई जरूरी नहीं कि किसी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी हो ही। या, उसने ऐसा कुछ बुरा किया हो जिसे एंटी-इनकंबेंसी कहा जा सके। लेकिन, यह विपक्ष की खूबी होती है कि वह सत्ता पक्ष के सिर पर कोई ऐसा ठप्पा मढ़ दे, जो उसे जनविरोधी साबित कर दे।

2024 में विपक्ष के नैरेटिव की चर्चा

जैसे, 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने काफी हद तक ये नैरेटिव चलाने में कामयाबी हासिल की कि यदि नरेंद्र मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आई तो वह संविधान बदल देगी। हालांकि, बीजेपी ने संविधान बदलने की कोई मंशा जाहिर नहीं की थी, सिवाय उसके कुछेक नेताओं के बयान के। बीजेपी ने बहुत भरोसा दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं होगा। लेकिन, दलित वोटरों ने विपक्ष का नैरेटिव स्वीकार किया, और यूपी जैसे राज्य में बीजेपी को बड़ा नुकसान पहुंचाया।

कई राज्यों में विपक्ष सत्ता विरोधी माहौल क्यों नहीं भुना पाया?

अब आते हैं उस ट्रेंड पर, जहां एंटी-इनकंबेंसी को भुनाना तो छोड़िए, विपक्षी दल के रूप में पार्टियों ने सत्ता पक्ष के आगे सरेंडर ही कर दिया। तमिलनाडु में कांग्रेस की सरकार आखिरी बार 1967 में बनी थी। उसके बाद वह न सिर्फ सत्ता से बाहर हुई, वह चैलेंजर भी नहीं रही। पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस का यही हाल हुआ। 1977 में वामपंथी दलों ने वहां की सत्ता पर ऐसा कब्जा जमाया कि वह कांग्रेस हाशिये से भी बाहर हो गई। गुजरात, ओडिशा जैसे राज्यों में भी कांग्रेस ने अपना वजूद खो दिया।

वहीं यूपी, मध्यप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की ओर जहां बीजेपी या एनडीए दल लगातार सत्ता पर काबिज हैं। बेशक, इन सरकारों के कई पहलू एंटी-इनकंबेंसी का कारण बन सकते थे। लेकिन, यहां पर बीजेपी और एनडीए दल अपने विरोधियों की पुरानी सरकारों की एंटी-इनकंबेंसी वोटरों के मनमस्तिष्क में ऐसी बैठाई है कि हर चुनाव में सत्ता पक्ष पर हमलावर होने के बजाय विपक्ष अपने खिलाफ नैरेटिव की ही सफाई देता रह जाता है।

लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं का उदाहरण

दरअसल राहुल गांधी अपने भाषण में राजस्थान, हरियाणा, यूपी, तमिलनाडु जैसे राज्यों का हवाला देते हैं, जहां पहले हर चुनाव में वोटर सत्ताधारी पार्टी को बदल देते थे। लेकिन, बार-बार सत्ता में पार्टियों को बदलना चुनाव की आदर्श स्थिति नहीं है। इसका मतलब यह है कि उनके पास एक स्थायी ऑप्शन नहीं है। वह जल्दी-जल्दी ऊब जाते हैं।

ऐसा यूपी, बिहार ही नहीं, देश के कई राज्यों में होता रहा। फिर, वोटरों को जिस भी पार्टी या नेता में उन्हें स्थायी समाधान मिला, उन्होंने लंबे समय तक उन्हें सत्ता सौंप दी। जैसे, गुजरात में नरेंद्र मोदी, मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह, बिहार में नीतीश कुमार, यूपी में योगी आदित्यनाथ, त्रिपुरा में माणिक सरकार, ओडिशा में नवीन पटनायक। ये भी अलग-अलग पार्टियों के नेता था, लेकिन इन्होंने एंटी-इनकंबेंसी को ‘आउट ऑफ कोर्स’ शब्द बना दिया। यूपी में योगी को अगर ‘बुल्डोजर बाबा’ कहा जाता है, तो उसका फायदा उन्हें प्रो-इनकंबेंसी के रूप में मिलता है।

एंटी-इनकंबेंसी को वोट में बदलना भी जरूरी

कुल मिलाकर, एंटी-इनकंबेंसी एक पेड़ पर लगा हुआ फल है। जिसे नेताओं को चुनाव से पहले मेहनत करके डाली पर चढ़कर तोड़ना होता है। बहुत किस्मत वालों की झोली में ही यह सीधा आकर गिरता है। होशियार सत्ताधारी अपनी एंटी-इनकंबेंसी के इस फल को पेड़ पर ही या तो सड़ा देते हैं, या फिर अपने नैरेटिव के पत्तों में छुपा लेते हैं। राहुल गांधी को एंटी-इनकंबेंसी का फायदा चुनाव से पहले मेहनत और सियासी गणित से हासिल हो सकता है। चुनाव हार गए तो सिर्फ इनकंबेंसी के एंटी बातें ही रह जाती हैं। तो एंटी-इनकंबेंसी भुनाना एक आर्ट है जिसका बेसिक राहुल गांधी शायद मिस कर रहे हैं।