अदालत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर दागे तीखे सवाल
दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने बुधवार को सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से बेहद तीखे और असहज करने वाले सवाल पूछे। अदालत ने विशेष रूप से यह पूछा कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर किए गए करीब 43 लाख मतदाताओं में से जिनके नाम ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) या ‘अनुपस्थित’ श्रेणी में दर्ज कर दिए गए हैं, उन्हें दोबारा अपना नाम जुड़वाने के लिए Form-6 भरने को क्यों विवश किया जा रहा है?
अदालत ने सख्त लहजे में टिप्पणी की कि यह फॉर्म तो मूल रूप से पहली बार बने नए मतदाताओं के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) के लिए निर्धारित होता है, जबकि ये लाखों लोग तो पहले से ही दशकों से वैध मतदाता सूची में शामिल थे। दिल्ली एसआईआर सुप्रीम कोर्ट की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी ने चुनावी पुनरीक्षण प्रक्रिया की कानूनी वैधता पर बड़ी बहस छेड़ दी है।
वैधानिक फॉर्मों में मनमाना बदलाव नहीं कर सकता आयोग
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट और दो टूक शब्दों में चुनाव आयोग से कहा कि वह स्थापित नियमों के तहत लागू फॉर्म 6, 7 और 8 के मूल स्वरूप और उनकी कानूनी प्रक्रियाओं में अपनी मर्जी से कोई मनमाना बदलाव नहीं कर सकता है। अदालत को अवगत कराया गया कि दिल्ली में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू होने से पहले लगभग 1.45 करोड़ पंजीकृत मतदाता मौजूद थे। लेकिन 31 अगस्त को जब चुनाव आयोग ने अपनी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की, तो उसमें केवल 92.53 लाख नाम ही शामिल किए गए।
इस प्रकार एक ही झटके में लगभग 47.57 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए। इस भारी विसंगति पर अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए आयोग से पूछा कि इतने बड़े पैमाने पर नागरिकों के मताधिकार पर संशय क्यों पैदा किया गया। दिल्ली एसआईआर सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई अब निर्णायक दिशा में पहुंच चुकी है।
संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण पर जोर
शीर्ष अदालत ने इस बात पर विशेष बल दिया कि किसी भी वास्तविक और पात्र नागरिक को तकनीकी नियमों या फॉर्मों के फेर में उलझाकर उसके वोट देने के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। जिन लोगों के पते बदले हैं या जो सत्यापन के समय अनुपस्थित पाए गए थे, उनके लिए निर्धारित सुधारात्मक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए, न कि उन्हें नए सिरे से फॉर्म-6 भरवाकर पहली बार का मतदाता बनने पर मजबूर किया जाए।
चुनाव आयोग के वकीलों ने प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दलील दी, लेकिन अदालत ने नियमों की सख्त व्याख्या करते हुए आयोग को कानूनी परिधि में रहकर ही काम करने की ताकीद की। इस प्रकार दिल्ली एसआईआर सुप्रीम कोर्ट मामले ने चुनाव आयोग की कार्यशैली को न्यायिक समीक्षा के कड़े दायरे में ला खड़ा किया है।


