यूपी चुनाव से पहले यूजीसी आंदोलन, योगी-अखिलेश या मायावती किसकी बढ़ेगी टेंशन?

  • September 22, 2026
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आगरा में UGC के नए नियमों और आरक्षण व्यवस्था के विरोध में सवर्ण समाज का आंदोलन

आगरा में UGC नियम और आरक्षण को लेकर क्यों तेज हुआ आंदोलन?

दलित राजनीति की प्रयोगशाला कहे जाने वाले आगरा में इन दिनों एक अलग तरह की राजनीतिक हलचल दिखाई दे रही है। मुद्दा है UGC के नए इक्विटी नियम और आरक्षण व्यवस्था। आगरा में पिछले करीब एक महीने के दौरान सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों ने कई प्रदर्शन किए हैं—बाइक रैली से लेकर सत्याग्रह और ट्रैक्टर मार्च तक। सवाल ये है कि क्या ये आंदोलन सिर्फ UGC नियमों तक सीमित है, या फिर इसके पीछे आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस भी जुड़ रही है? और अगर ये मुद्दा आगे बढ़ता है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

दरअसल उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला कहे जाने वाले आगरा में एक नया सियासी समीकरण जन्म ले रहा है, पिछले एक महीने में आगरा के एत्मादपुर क्षेत्र में यूजीसी के नए नियमों और आरक्षण व्यवस्था में संशोधन की मांग को लेकर एक के बाद एक तीन बड़े सवर्ण आंदोलन हो चुके हैं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की अगुवाई में तमाम सवर्ण संगठनों ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों के विरोध में आंदोलन एक बार फिर तेज कर दिया है. ‘यूजीसी मुक्ति मोर्चा’ के बैनर तले बड़ी संख्या में लोग एकजुट होकर अपनी मांग तेज कर रहे हैं। रविवार को UGC के विरोध में सवर्ण समाज के हजारों युवक सड़क पर उतर आए. करीब 200 ट्रैक्टरों के साथ पहुंचे प्रदर्शनकारियों ने आगरा-नोएडा यमुना एक्सप्रेस-वे पर चढ़ गए. प्रदर्शनकारी कलेक्ट्रेट का घेराव करने के लिए आगे बढ़ रहे थे, लेकिन पुलिस और PAC ने बुलडोजर, JCB और हाइड्रा लगाकर रास्ता ब्लॉक कर दिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई। कुछ प्रदर्शनकारी यमुना एक्सप्रेस-वे पर चढ़ गए और बीच सड़क पर खड़े होकर वाहनों को रोक दिया।

पिछले 25 दिनों में तीन बड़े सवर्ण आंदोलन

आपको बता दे की आगरा के एत्मादपुर से उठी सवर्ण समाज के विरोध की चिंगारी अब सिर्फ छात्रों या संगठनों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तपिश भी बढ़ा दी है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि आगरा में तेज होता सवर्ण आंदोलन 2027 में किसकी चुनौती बढ़ाएगा? दरअसल सवर्ण समाज (खासकर क्षत्रिय और ब्राह्मण युवाओं) द्वारा यूजीसी के नए नियमों (‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी’) को वापस लेने और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में बदलाव कर उसे आर्थिक आधार पर लागू करने की मांग को लेकर पिछले 25 दिनों में तीन आंदोलन हो चुके हैं।

एक सितंबर को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के बैनर तले युवाओं ने आगरा के एत्मादपुर के मुड़ी चौराहे पर हाईवे जाम कर सांकेतिक विरोध दर्ज कराया. इसके अलावा आगरा के शहीद स्मारक पर ‘सत्याग्रह’ का आयोजन किया गया। आगरा में दूसरा आंदोलन 18 सितंबर को हुआ, जब ‘सिस्टम सुधार संगठन’ और राष्ट्रीय करणी सेना के नेतृत्व में दर्जनों ट्रैक्टरों के साथ विरोध मार्च निकाला गया. ‘सिस्टम सुधार संगठन’ के अध्यक्ष अंशुमान ठाकुर और राष्ट्रीय करणी सेना के जिलाध्यक्ष प्रतीक चौहान की अगुवाई में बड़ी संख्या में सवर्ण समुदाय के लोग सड़क पर उतरे।

20 सितंबर को 200 से अधिक ट्रैक्टरों के साथ प्रदर्शन

तीसरा आंदोलन 20 सितंबर को हुआ. अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष कुंवर हरिवंश सिंह और राघवेंद्र सिंह राजू की अगुवाई में आगरा में एक बड़ा कार्यक्रम किया गया, जिसमें यूजीसी के नए नियमों को खत्म करने और आरक्षण के नियमों में बदलाव की मांग उठी. क्षत्रिय महासभा की अगुवाई में ‘यूजीसी मुक्ति मोर्चा’ के आह्वान पर कलेक्ट्रेट का घेराव किया गया. इस दौरान सवर्ण समाज के युवाओं ने 200 से अधिक ट्रैक्टरों के साथ यमुना एक्सप्रेस-वे को बाधित कर दिया।

आगरा पुलिस की बैरिकेडिंग और जेसीबी से रास्ता रोकने के बावजूद प्रदर्शनकारी अलग-अलग रास्तों से आगे बढ़ते हुए यमुना एक्सप्रेस-वे तक पहुंच गए, जिससे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। बता दे की आगरा के आसपास वाले फिरोजाबाद, मथुरा, अलीगढ़, हाथरस और एटा में के सवर्णों की आबादी ठीक-ठाक है. 18 और 20 सितंबर को हुए ट्रैक्टर मार्चों में पड़ोसी जिलों से बड़ी संख्या में भीड़ जुटने का मुख्य कारण यही कनेक्टिविटी थी।

2027 चुनाव से पहले सवर्ण संगठनों की रणनीति

दरसल उच्च जाति समुदाय के संगठनों की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में होने वाले हैं. संगठनों का मानना है कि चुनाव का समय ही वह वक्त होता है जब सरकार पर सबसे अधिक दबाव बनाया जा सकता है; राजनीतिक दलों के सिर पर तभी जूं रेंगती है, जब उन्हें अपनी सीट जाने का खतरा नजर आता है।

चुकी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में अब कुछ समय बचा है. सवर्ण युवाओं का मानना है कि पारंपरिक राजनीतिक दल (विशेषकर भाजपा) सवर्ण वोटबैंक को ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ मानते हैं, जबकि सपा अपने ‘PDA’ और बसपा अपने दलित कैडर को साधने में लगी है. आगरा जैसे संवेदनशील राजनीतिक केंद्र पर आंदोलन खड़ा करके सवर्ण संगठन मुख्यधारा की पार्टियों पर अपनी अनदेखी न करने का रणनीतिक दबाव बना रहे हैं।

आगरा में सवर्ण लामबंदी से क्या बदलेगा?

वही राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगरा में सवर्णों की यह लामबंदी 2027 के चुनाव में मुख्य राजनीतिक धड़ों के समीकरण बिगाड़ सकती है. आगरा शहर को जाटव/दलित राजनीति का गढ़ माना जाता है, लेकिन जिले के ग्रामीण और बाहरी क्षेत्रों में सवर्ण मतदाताओं की भी अच्छी-खासी संख्या है. डॉ. आंबेडकर से लेकर कांशीराम तक ने दलित राजनीति के लिए आगरा को चुना था; अब सवर्ण समाज उसी इलाके से हुंकार भरकर अपनी ताकत दिखा रहा है।

आपको बता दे की आगरा जिले में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 23 फीसदी है, जिसमें जाटव सबसे ज्यादा हैं. वहीं, पश्चिमी यूपी और खासकर आगरा बेल्ट में सवर्ण मतदाता, विशेषकर क्षत्रिय और ब्राह्मण, भाजपा का पारंपरिक वोटबैंक माने जाते हैं. यूजीसी एक्ट और आरक्षण नीतियों को लेकर जिस तरह सवर्ण समाज का गुस्सा सड़कों पर दिखा है, उससे बीजेपी के लिए अपने इस कोर वोटबैंक को साधे रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।

BJP, SP और BSP के लिए क्या हैं राजनीतिक सवाल?

ऐसे में बीजेपी के लिए स्थिति ‘एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई’ जैसी है. अगर वह सवर्णों के साथ खड़ी होती है तो दलित और ओबीसी नाराज हो सकते हैं, और अगर चुप रहती है तो कोर वोटबैंक के छिटकने का डर है। वही सपा प्रमुख अखिलेश यादव का पीडीए यानी (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला आगरा जैसे दलित बहुल जिले में पैठ बनाने की कोशिश में है। सपा के लिए चुनौती सिर्फ बसपा से दलित वोट खींचने की नहीं है, बल्कि भाजपा की गैर-जाटव दलितों में बनी पैठ को भी कमजोर करने की है. आगरा बसपा का गढ़ रहा है, लेकिन मायावती के राजनीतिक ढलान के साथ कमजोर हुआ है।

आंदोलन पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलाने की चेतावनी

आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि यदि यूजीसी के नियमों में संशोधन नहीं किया गया और आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं बनाया गया, तो यह आंदोलन केवल आगरा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैलेगा। तो 2027 के चुनाव से पहले ‘दलितों की प्रयोगशाला’ आगरा में सवर्ण समाज की यह लामबंदी इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण एक नया मोड़ लेने वाले हैं।