महात्मा गांधी की 157वीं जयंती और उनके जीवन की अमर यात्रा
पिछले 150 सालों में दुनिया पर अगर किसी ने सबसे ज्यादा छाप छोड़ी, तो वह निश्चित तौर पर मोहनदास करमचंद गांधी होंगे। 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्म के 157 साल हो रहे हैं। महात्मा गांधी की जीवन-यात्रा केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि सत्य की खोज, आत्मसंघर्ष और मानवता के उत्कर्ष की अमर साधना है। 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी का जीवन प्रयोगों, आत्म-सुधार और नैतिक साहस की अनवरत प्रक्रिया रहा।
उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ और ‘हिंद स्वराज’ जैसी रचनाएं उनके चिंतन की गहराई को दर्शाती हैं। दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने ‘सत्याग्रह’ का अमोघ अस्त्र गढ़ा। 1915 में भारत लौटने पर उन्होंने औपनिवेशिक शोषण, सामाजिक विषमता और सांप्रदायिक तनाव से जूझते देश की नाड़ी को पहचाना। चंपारण के किसानों के संताप से लेकर दांडी मार्च और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन तक, उन्होंने करोड़ों साधारण नागरिकों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा।
गांधीजी के लिए स्वाधीनता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर के भय, अन्याय और नैतिक दुर्बलता से मुक्ति थी। उन्होंने राजनीति को नैतिकता से और संघर्ष को अहिंसा से जोड़ा। उनके हाथ में चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं, बल्कि शोषण-मुक्त समाज का प्रतीक बना।
गांधी जयंती क्यों मनाई जाती है?
दरअसल मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें दुनिया “महात्मा गांधी” और पूरा भारत “बापू” के नाम से जानता है। इस बार उनकी 157वीं जयंती 2 अक्टूबर 2026 को मनाई जा रही है। यह दिन न केवल भारत में बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों में बड़े ही धूम-धाम से सेलिब्रेट किया जाता है। स्कूल, कॉलेज में इस दिन श्रद्धांजलि के साथ ही विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाया जाता है। गांधी जयंती हर साल 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और शांति के सिद्धांतों को याद करने के लिए मनाई जाती है। यह दिन केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्मदिन नहीं, बल्कि उस वैचारिक क्रांति का स्मरणोत्सव है जिसने बिना शस्त्र उठाए दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक शक्ति को हिला दिया था।
महात्मा गांधी का पूरा जीवन ही देश की सेवा में निकल गया और अंत में अपने प्राण भी देश के लिए त्यागे। भारत देश को एक सूत्र में पिरोने और अंग्रेजों से आजादी दिलाने में महात्मा गांधी कई बार जेल गए, अंग्रेजों से बेइज्जत हुए लेकिन उन्होंने देश को सर्वोपरि रखा। बापू के विचार आज भी समाज में समानता, स्वदेशी और सद्भाव का मार्ग दिखाते हैं। संयुक्त राष्ट्र इसे ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाता है, जो यह साबित करता है कि गांधी जी के मूल्य केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए प्रेरणापुंज हैं।
पारिवारिक संस्कारों से बना गांधी का व्यक्तित्व
दरअसल महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का निर्माण उनके पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी प्रशासनिक दायित्वों से जुड़े थे और माता पुतलीबाई धार्मिक आस्था, व्रत, संयम तथा करुणा के लिए जानी जाती थीं। बालक मोहनदास ने घर के वातावरण से सत्य, आत्मसंयम और धार्मिक सहिष्णुता के संस्कार ग्रहण किए। बाद में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाना उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ था। पश्चिमी समाज और आधुनिक जीवन-पद्धति से उनका परिचय हुआ। साथ ही उन्होंने धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया। भगवद्गीता सहित विभिन्न परंपराओं के विचारों ने उनके चिंतन को व्यापक बनाया।
वे धीरे-धीरे इस निष्कर्ष की ओर बढ़े कि सत्य किसी एक संप्रदाय या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि मनुष्य की सतत खोज का विषय है। गांधी के जीवन में आत्मपरीक्षण की प्रवृत्ति शुरू से अंत तक बनी रही। वे अपने सार्वजनिक जीवन को भी उसी नैतिक कसौटी पर कसते थे, जिस पर निजी जीवन को। इसीलिए गांधी को समझने के लिए उनके भाषणों से अधिक उनके जीवन के प्रयोगों को पढ़ना जरूरी है।
दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव से सत्याग्रह तक
आपको बता दें कि 1893 में गांधी दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। वहां भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव और अपमान ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से बाहर कर दिया गया। यह घटना उनके लिए व्यक्तिगत अपमान थी, लेकिन उन्होंने इसे व्यापक अन्याय की समस्या के रूप में देखा। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने भारतीय समुदाय की समस्याओं को समझा, संगठन बनाया और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। यहीं उनके राजनीतिक चिंतन में वह परिवर्तन आया, जिसने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई भाषा दी। यहीं सत्याग्रह की अवधारणा विकसित हुई। इस दृष्टि से सत्याग्रह राजनीतिक रणनीति के साथ नैतिक साधना भी था। गांधी ने संघर्ष की भाषा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। उन्होंने शक्ति का आधार हथियार के बजाय आत्मबल को बनाया।
भारत लौटकर किसानों और मजदूरों से जुड़ा आंदोलन
वर्ष 1915 में भारत लौटने के बाद गांधी ने तत्काल किसी बड़े राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व नहीं संभाला। उन्होंने भारत को समझने की कोशिश की। गांवों में गए, किसानों और मजदूरों से मिले तथा देश की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को निकट से देखा। गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को व्यापक जनजीवन से जोड़ा। 1917 का चंपारण सत्याग्रह इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। नील की खेती से जुड़े किसानों की समस्याओं को उन्होंने राष्ट्रीय प्रश्न बनाया। चंपारण में गांधी की कार्यशैली केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रही। उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सुधार को भी आंदोलन का हिस्सा बनाया।
इसके बाद 1918 में खेड़ा का किसान आंदोलन और अहमदाबाद के मिल मजदूरों का संघर्ष सामने आया। इन आंदोलनों ने गांधी को किसानों, मजदूरों और सामान्य नागरिकों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनीति अब केवल सभाओं और प्रस्तावों की चीज नहीं रही; वह खेत, कारखाने और गांव के जीवन में उतरने लगी। फिर साल 1920 का असहयोग आंदोलन गांधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का नया चरण था। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, सरकारी संस्थाओं से असहयोग और स्वदेशी का समर्थन इसके प्रमुख तत्व थे।
असहयोग आंदोलन, चरखा और साधन-साध्य का सिद्धांत
गांधी को विश्वास था कि औपनिवेशिक सत्ता केवल शासकों की शक्ति से नहीं चलती; जनता की भागीदारी और सहयोग भी उसकी शक्ति का आधार बनते हैं। खादी और चरखा इसी सोच के प्रतीक बने। 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय गांधी के दर्शन को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनके लिए लक्ष्य जितना महत्वपूर्ण था, साधन भी उतना ही महत्वपूर्ण था।
इसके साथ ही वर्ष 1930 का दांडी मार्च गांधी के राजनीतिक कौशल और जनसंपर्क की अनूठी मिसाल था। नमक कानून औपनिवेशिक शासन की व्यापक आर्थिक और राजनीतिक संरचना का एक छोटा-सा हिस्सा था, लेकिन गांधी ने उसे आम आदमी के जीवन से जोड़ दिया। साबरमती से दांडी तक की यात्रा ने नमक को प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। इस आंदोलन का महत्व केवल कानून तोड़ने में नहीं था। यह उस राजनीतिक शैली का उदाहरण था, जिसमें रोजमर्रा की जिंदगी की वस्तु राष्ट्रीय स्वतंत्रता के प्रश्न से जुड़ गई।
सत्य और अहिंसा गांधी के चिंतन के केंद्रीय तत्व
दरअसल गांधी के चिंतन में सत्य और अहिंसा केंद्रीय तत्व थे। सत्य उनके लिए केवल सही बात बोलने का नैतिक निर्देश नहीं था। वह जीवन की दिशा था। महात्मा गांधी मनुष्य को सत्य का पूर्ण स्वामी नहीं मानते थे। वे सत्य की खोज को विनम्रता और आत्मपरीक्षण के साथ जोड़ते थे। वही 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक चरण था। ‘करो या मरो’ का आह्वान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक जन भावना का प्रतीक बना। गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन विभिन्न रूपों में जारी रहा। गांधी का यह संघर्ष केवल सत्ता से मुक्ति के लिए नहीं था। उनके लिए भारत की स्वतंत्रता भारतीय जनता की आत्मनिर्णय क्षमता और आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना थी। 1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन विभाजन के कारण उत्पन्न हिंसा ने इस उपलब्धि पर गहरा दर्द अंकित कर दिया।
30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या और उनकी विरासत
आखिरकार 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। यह स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक इतिहास की सबसे निर्णायक त्रासदियों में से एक थी। गांधी का शरीर समाप्त हुआ, लेकिन उनके विचारों का सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ। सत्य, अहिंसा, स्वराज, सामाजिक समरसता, ग्राम स्वराज और नैतिक राजनीति के प्रश्न आगे भी बहस का हिस्सा बने रहे। उनकी मृत्यु के बाद यह प्रश्न और गहरा हो गया कि गांधी को किस रूप में याद किया जाए।
एक राष्ट्रपिता के रूप में, स्वतंत्रता सेनानी के रूप में, सामाजिक सुधारक के रूप में या नैतिक दार्शनिक के रूप में। कुल मिलाकर महात्मा गांधी का जीवन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे केवल स्वतंत्रता आंदोलन की घटनाओं के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। महात्मा गांधी की विरासत केवल आंदोलनों और राजनीतिक घटनाओं में नहीं है। उन्होंने ऐसे प्रश्न उठाए, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
सत्य का मूल्य क्या है? साधन और साध्य का संबंध कैसा होना चाहिए? विकास किसके लिए है? आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा कैसे सुनिश्चित की जाए? असहमति के बीच संवाद और धर्म के माध्यम से सामाजिक सद्भाव कैसे कायम रखा जाए? 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या ने उनके जीवन का अंत किया, लेकिन उनके विचारों और प्रश्नों की यात्रा नहीं रुकी। आज भी हिंसा, असमानता, सामाजिक विभाजन और पर्यावरणीय संकट के बीच गांधी का चिंतन संवाद का आधार बनता है।


