फरक्का बैराज विवाद क्यों बना इतना बड़ा मुद्दा?
बिहार की बाढ़… बंगाल के बंदरगाह की चिंता… और बांग्लादेश के पानी का सवाल। इन तीनों के बीच खड़ा है एक ऐसा बैराज, जिसने करीब पांच दशक से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में पानी को सबसे बड़ा मुद्दा बना रखा है—फरक्का बैराज। सवाल है कि फरक्का पर आखिर किसका हक है? क्या फरक्का की वजह से बिहार की बाढ़ बढ़ती है? क्या कोलकाता पोर्ट को बचाने के लिए बांग्लादेश का पानी रोका जाता है? और 1996 की जल संधि के बाद भी ये विवाद आज तक खत्म क्यों नहीं हुआ?
दरअसल बिहार में गंगा के बढ़ते जलस्तर के बीच फरक्का बैराज एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से बातचीत कर बैराज के सभी गेट खोलने का आग्रह किया है। इसके साथ ही फरक्का को लेकर पुरानी बहस भी फिर तेज हो गई है—क्या यह बैराज बिहार की बाढ़ और गाद की समस्या बढ़ाता है? क्या इसके निर्माण से पहले उठाई गई कुछ आपत्तियां सही थीं? और आखिर वो कौन इंजीनियर थे, जिन्होंने दशकों पहले ऐसी आशंकाएं जताई थीं?
फरक्का से पहले गंगा में ऊपर तक पहुंचती थी हिल्सा
बंगाल की खाड़ी की हिल्सा इलाहाबाद के संगम में। कभी-कभी तो आगरा में बहने वाली यमुना तक। सुनने में अजूबा लगने वाली ये बात 1975 से पहले सच हुआ करती थी। मॉनसून के दिनों में हिल्सा मछली विपरीत दिशा में तैरकर इतनी लंबी यात्रा करती थी। यह बात सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यू की कई रिपोर्ट्स, रिसर्च पेपर्स और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है।
फिर 1975 में बंगाल में गंगा नदी पर एक बांध बनाया गया और हिल्सा की ऊपर धारा की ये यात्रा हमेशा-हमेशा के लिए रुक गई। गंगा नदी पर बने इस बांध का नाम फरक्का बैराज है। दरअसल फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बना एक बड़ा बांध है। यह मुर्शिदाबाद जिले में है और बांग्लादेश की सीमा से सिर्फ 16-18 किलोमीटर ऊपर स्थित है। यह बांध लगभग 2.25 किलोमीटर लंबा है और इसमें 109 गेट लगे हैं।
अब सवाल उठता है कि इस बांध को बनाने की क्या वजह थी। दरअसल हुगली नदी में बहुत ज्यादा मिट्टी जमा हो रही थी। इससे नदी उथली हो गई थी और बड़े जहाज बंदरगाह तक नहीं पहुंच पा रहे थे। विशेषज्ञों ने सोचा कि अगर गंगा का थोड़ा पानी हुगली नदी में डाल दिया जाए, तो गाद बह जाएगी और बंदरगाह चालू रहेगा। 1853 में ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने भी ऐसा ही सुझाव दिया था कि गंगा पर फरक्का के पास बैराज बनाकर पानी हुगली नदी में मोड़ना चाहिए। लेकिन तब इस बात पर अमल नहीं हो पाया था।
फरक्का से गंगा की धारा कैसे बंटती है?
दरअसल बिहार-झारखंड से बहती हुई गंगा पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में प्रवेश करती है। यहां तक इसे गंगा ही कहा जाता है। इसके बाद गंगा फरक्का पहुंचती है। फरक्का बैराज गंगा के पानी को नियंत्रित करता है। फरक्का बैराज के आसपास गंगा दो भागों में बंटती है। गंगा की जो धारा भारत यानी कि पश्चिम बंगाल में बहती है, वो भागीरथी कहलाती है। आगे चलकर इसे हुगली नदी के नाम से जाना जाता है। इसी धारा के किनारे कोलकाता और हल्दिया जैसे महत्वपूर्ण इलाके हैं। यही वह धारा है जिसके लिए फरक्का बैराज बनाया गया था।
फरक्का बैराज से 38 से 42 किलोमीटर लंबी एक फीडर कैनाल के जरिए गंगा का पानी हुगली में डाला जाता है, ताकि कोलकाता बंदरगाह में गाद न जमा हो। जबकि बाई ओर की धारा बांग्लादेश में प्रवेश करती है। कहने का अर्थ यह है कि मुर्शिदाबाद जिले में गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़ने के उद्देश्य से फरक्का बैराज बनाया गया था। ताकि कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को हटाने और उसकी नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिले।
1996 की जल संधि से क्या तय हुआ था?
दरअसल फरक्का जल समझौता भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे का समझौता है। इस समझौते पर 12 दिसंबर 1996 को नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे। इसकी अवधि 30 वर्ष है। यानी कि दिसंबर 2026 में यह समझौता समाप्त हो रहा है। मॉनसून में तो पानी की उपलब्धता को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन यह समझौता मुख्य रूप से सूखे मौसम के दौरान फरक्का बैराज पर उपलब्ध पानी का बंटवारा तय करता है। लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश के बीच ये समझौता संतोषजनक ढंग से काम करता रहा। लेकिन हाल में ही बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश के सुर बदल गए।
बांग्लादेश को अब ज्यादा पानी चाहिए?
अब बांग्लादेश को ज्यादा पानी चाहिए। बांग्लादेश अब टकराव की मुद्रा में है और इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहता है। बांग्लादेश का कहना है कि जब समझौता किया गया था तो बांग्लादेश की आबादी कम थी, मौसम का संतुलन अलग था और इकोलॉजी भी आज के मुकाबले ज्यादा पॉजिटिव थी। लेकिन आज की स्थिति काफी अलग हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और सूखे के कारण नदी के प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ी है।
इधर बिहार सरकार का कहना है कि इस बैराज की वजह से राज्य में “कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा” जैसे हालात बन गए हैं। बैराज के पीछे भारी मात्रा में गाद जमा होने से गंगा नदी का तल काफी ऊपर उठ गया है। इससे नदी की पानी रोकने की प्राकृतिक क्षमता खत्म हो गई है और मानसून में भागलपुर तथा मुंगेर जैसे जिलों में भीषण बाढ़ आ जाती है। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने बिहार की ओर से इस संधि का सबसे मुखर विरोध किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह इस संधि को मौजूदा रूप में रिन्यू करने पर फिर से विचार करे। उनका तर्क है कि जब यह समझौता हुआ था तब बिहार के हितों की अनदेखी की गई थी।
बिहार ने नई संधि में क्या मांग रखी?
जेडीयू नेता ने कहा कि नए समझौते में बिहार की खेती, पीने के पानी और उद्योग से जुड़ी जरूरतों का आकलन आबादी और 2050 में होने वाली अनुमानित आबादी पर भी विचार किया जाना चाहिए। वहीं RJD के बक्सर से सांसद सुधाकर सिंह ने भी मांग की है कि अगली व्यवस्था में बिहार के पानी, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल-परिवहन से जुड़े हितों को शामिल किया जाए। यानी फरक्का बैराज विवाद अब सिर्फ भारत और बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे का मामला नहीं रह गया है। बिहार भी अपनी बाढ़, सिंचाई और जल-परिवहन से जुड़ी चिंताओं को लेकर इस बहस में खुलकर सामने आ गया है।
बंगाल के लिए फरक्का क्यों जरूरी है?
दरअसल पश्चिम बंगाल के लिए फरक्का सिर्फ बांग्लादेश को पानी देने का मामला नहीं है। फरक्का परियोजना का मूल उद्देश्य ही गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़कर कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता बनाए रखना था। इसलिए बंगाल के लिए सवाल है कि अगर बांग्लादेश को ज्यादा पानी दिया जाता है, तो क्या हुगली में पर्याप्त पानी बचेगा? यानी बंगाल की चिंता है कि पानी का ऐसा बंटवारा हो जिससे राज्य की अपनी जरूरतें और कोलकाता-हल्दिया क्षेत्र की नदी और बंदरगाह व्यवस्था प्रभावित न हो।
गौरतलब है कि फरक्का जल समझौते की दिसंबर 2026 की डेडलाइन से पहले होने वाली बातचीत अब सिर्फ भारत-बांग्लादेश का मामला नहीं रही है। यह बिहार बनाम बंगाल-बांग्लादेश के हितों के टकराव का सवाल बन गई है। अब फरक्का जल समझौते की अगली डील करने से पहले केंद्र सरकार की चुनौती होगी कि इन तीनों पक्षों के बीच संतुलन बनाया जाए। बिहार-बंगाल में तो बीजेपी की सरकार है, जबकि बांग्लादेश हमारा पड़ोसी है, जो फिलहाल कई मुद्दों पर भारत से अलग राय रखता है।
फरक्का विवाद का अगला अध्याय क्या होगा?
यही वजह है कि फरक्का बैराज विवाद आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकता है। एक तरफ बिहार बाढ़ और गाद की समस्या का समाधान चाहता है, दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल को कोलकाता पोर्ट और हुगली नदी की जरूरतों की चिंता है, जबकि बांग्लादेश अधिक पानी की मांग उठा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 1996 की संधि की समयसीमा खत्म होने से पहले क्या ऐसा रास्ता निकलेगा, जो तीनों पक्षों के हितों में संतुलन बना सके?
FAQ
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा नदी पर स्थित है। यह बांग्लादेश की सीमा से लगभग 16-18 किलोमीटर ऊपर बताया गया है।
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता 12 दिसंबर 1996 को हुआ था। दिए गए कंटेंट के अनुसार इसकी अवधि 30 वर्ष है और दिसंबर 2026 में इसकी समयसीमा समाप्त हो रही है।
बिहार सरकार का तर्क है कि बैराज के पीछे भारी गाद जमा होने से गंगा का तल ऊपर उठता है, जिससे बाढ़ की समस्या बढ़ सकती है। बिहार अपनी सिंचाई, पीने के पानी, बाढ़ नियंत्रण और जल-परिवहन से जुड़ी जरूरतों को भी नई व्यवस्था में शामिल करने की मांग कर रहा है।
दिए गए कंटेंट के अनुसार, बांग्लादेश अब ज्यादा पानी की मांग कर रहा है और उसका कहना है कि 1996 के समझौते के समय की तुलना में आज आबादी, जलवायु और नदी के प्रवाह की परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
फरक्का परियोजना का उद्देश्य गंगा का पानी हुगली की ओर मोड़ना था। हुगली नदी के माध्यम से कोलकाता और हल्दिया जैसे महत्वपूर्ण इलाकों तथा कोलकाता बंदरगाह की नौवहन व्यवस्था को बनाए रखने में इसकी भूमिका बताई जाती है।


