नाना पाटेकर के निधन से सिनेमा जगत स्तब्ध
जब-जब भारत में रंगमंच और सिनेमा के व्याकरण की बात होगी, तब-तब एक नाम के बिना यह चर्चा अधूरी ही रहेगी. वो नाम है नाना पाटेकर. आज सुबह गोवा से आई एक दुखद खबर ने कला और सिनेमा की दुनिया को स्तब्ध कर दिया. दिल का दौरा पड़ने से नाना पाटेकर हम सभी को अलविदा कह गए. नाना पाटेकर का जाना सिर्फ एक दिग्गज अभिनेता का अंत नहीं है, हालांकि आज के बाद जब भी भारतीय सिनेमा और रंगमंच के आधुनिक इतिहास में अभिनय की व्याकरण, भाषा की स्वाभाविकता और पर्दे पर यथार्थवाद का जिक्र होगा, तो नाना पाटेकर का नाम पूरी व्यवस्था को चुनौती देता हुआ खड़ा दिखाई देगा।
दरसल बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह 5:20 बजे गोवा स्थित उनके घर पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट के बाद निधन हो गया। उन्हें बचाने के लिए 45 मिनट तक लगातार सीपीआर दिया गया, लेकिन उन्हें पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। गोवा के मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर सालकर ने बताया कि नाना पाटेकर को उनके घर पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया था। लगातार 45 मिनट तक सीपीआर देने के बावजूद उनकी हालत नहीं संभली और उनकी मौत हो गई। विश्वनाथ पाटेकर, जिन्हें दुनिया नाना पाटेकर के नाम से जानती है, हिंदी और मराठी सिनेमा के चर्चित अभिनेताओं में शामिल थे। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। वह सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक भी रहे। उन्हें भारतीय सिनेमा के बेहतरीन और प्रभावशाली अभिनेताओं में गिना जाता है।
संघर्ष से रंगमंच तक नाना पाटेकर का सफर
90 के दशक में जहां हिंदी सिनेमा मुख्यधारा के चमक-धमक वाले नायकों, सुडौल शरीर, गानों के इर्द-गिर्द घूमते किरदारों और लार्जर-दैन-लाइफ कहानियों से भरा पड़ा था, वहीं एक साधारण नैन-नक्श, साधारण संवाद शैली और रंगमंच के अनुशासन से लैस अभिनेता ने पर्दे पर कदम रखा. बिना किसी स्टारडम के मुकुट और ग्लैमरस आवरण के, नाना पाटेकर ने यह साबित किया कि सिनेमा की आत्मा उनकी स्टार-वैल्यू में नहीं, बल्कि अभिनय की प्रामाणिकता और चरित्र के सामाजिक यथार्थ में बसती है।
मुंबई में ‘सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट’ से विजुअल आर्ट्स की पढ़ाई करते हुए, नाना को अपनी आजीविका चलाने के लिए दोहरी जिंदगी जीनी पड़ी. वे दिन में मुंबई की सड़कों पर सिनेमा के बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर पेंट करते थे. इसके बदले उन्हें महीने के 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ‘स्ट्रुसा एडवरटाइजिंग’ में बतौर विजुलाइज़र नौकरी की. लेकिन विज्ञापनों की कृत्रिम दुनिया उनकी कलात्मक भूख को शांत नहीं कर सकी. यही वह दौर था जब उन्होंने महसूस किया कि उनकी असली मंजिल विज्ञापन नहीं, बल्कि जीवित इंसानों के बीच सांस लेता रंगमंच है।
परिंदा से बदला नाना पाटेकर के करियर का रुख
इसके बाद 1989 की ‘परिंदा’ ने उनके करियर को एक बड़ा मोड़ दिया। इस फिल्म में गैंगस्टर की भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 80 के दशक के उत्तरार्ध में नाना पाटेकर ने हिंदी सिनेमा में प्रवेश किया. वह दौर कमर्शियल और आर्ट सिनेमा के बीच की विभाजन रेखा का दौर था. नाना पाटेकर उन गिने-चुने अभिनेताओं में से रहे जिन्होंने इन दोनों धाराओं के बीच एक मजबूत पुल का निर्माण किया। नाना पाटेकर कैसे और किस स्तर के अभिनेता रहे इसको समझना हो तो उनकी ‘अंकुश’, ‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्में देखनी चाहिए.
अंकुश (1986) में आई थी. एन. चंद्रा की फिल्म में मुंबई के बेरोजगार, असंतुष्ट और भटके हुए युवाओं के गुस्से को नाना ने अपनी आवाज दी. उनका एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के क्लासिक एंग्री यंग मैन से अलग था. यह गुस्सा ग्लैमरस नहीं, बल्कि गलियों का कड़वा सच था। वहीं परिंदा जो 1989 में आई थी. विदु विनोद चोपड़ा की परिंदा में अंडरवर्ल्ड डॉन ‘अन्ना सेठ’ का किरदार हिंदी सिनेमा के विलेन की परिभाषा बदलने वाला साबित हुआ. आग से डरने वाले एक साइकोपैथ डॉन की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
इसके साथ ही नाना पाटेकर ने अपने करियर में कई अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘प्रहार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ उनकी चर्चित फिल्मों में शामिल हैं।
गंभीर भूमिकाओं से कॉमेडी तक बनाई अलग पहचान
गंभीर और दमदार भूमिकाओं के साथ-साथ उन्होंने कॉमेडी और व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। 1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे अहम फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इससे पहले ‘परिंदा’ और बाद में ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका था। कुल मिलाकर उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार फिल्मफेयर पुरस्कार और दो फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार मिले हैं। 2013 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
दरसल नाना पाटेकर का अभिनय केवल एक शैली नहीं, बल्कि अभिनय का एक पूरा शास्त्र है, जिसे तीन मुख्य तत्वों में विभाजित किया जा सकता है. पहला है थिएटर और कैमरे का संतुलन, आजकल अधिकांश थिएटर कलाकार जब कैमरे के सामने आते हैं तो उनका अभिनय अत्यधिक नाटकीय लगता है. नाना पाटेकर ने मंच की ‘लार्ज-दैन-लाइफ’ ऊर्जा को बनाए रखते हुए, कैमरे के क्लोज-अप फ्रेम के हिसाब से अपने भावों को नियंत्रित करना सीखा।
दूसरी खासियत की बात करें तो उनकी शारीरिक भाषा मंच से पर्दे तक कमाल की रही. तिरंगा हो या राजनीति वे संवाद बोलते समय अपने हाथों, कंधों की अकड़न और गर्दन के झुकाव का ऐसा इस्तेमाल करते हैं, जो उनके किरदार की सामाजिक पृष्ठभूमि को तुरंत स्थापित कर देता है। तीसरी और सबसे खास बात उनके अभिनय के क्राफ्ट की ये रही कि वो आम आदमी की भाषा का समावेश कर लेते थे.
बंबईया लहजे और आम भाषा को बनाया पहचान
उन्होंने हिंदी सिनेमा की उर्दू-मिश्रित, या साफ हिंदी की जगह बंबईया लहजे, मराठी-हिंदी के मिश्रण और आम गलियों की भाषा को मुख्यधारा के सिनेमा में स्वीकार्य बनाया। नाना पाटेकर ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उनकी निर्देशित फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में रही। बाद के वर्षों में ‘नटसम्राट’ जैसी मराठी फिल्म में भी उनके अभिनय को खूब सराहा गया। वह हिंदी और मराठी, दोनों सिनेमा में लंबे समय तक सक्रिय रहे।
नाना पाटेकर की सादगी और समाज सेवा
करोड़ों रुपये कमाने और राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बावजूद, कहा जाता है कि नाना पाटेकर मुंबई में 1BHK के साधारण फ्लैट में रहते रहे और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा समाज सेवा में दान करते रहे। कुल मिलाकर नाना पाटेकर का पूरा जीवन हमें ये सिखाता है कि जब कला सामाजिक सरोकारों और व्यक्तिगत अनुभवों की आंच में तपकर निकलती है, तो वह केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहती, बल्कि एक क्रांति बन जाती है.
उन्होंने मराठी रंगमंच के हमीदाबाईची कोठी और पुरुष से लेकर नटसम्राट तक, और हिंदी सिनेमा के अंकुश और परिंदा से लेकर अबतक छप्पन तक यह साबित किया कि अभिनय के लिए खूबसूरत चेहरा नहीं, बल्कि चरित्र में उतरने का जुनून चाहिए, संवाद केवल बोले नहीं जाते, बल्कि उनके बीच का सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है, एक सच्चा कलाकार केवल परदे पर ही नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ में भी नायक की भूमिका निभाता है।


