ईरान तेल संकट: तीन बड़े रास्तों पर बढ़ा दबदबा, अमेरिका और भारत की बढ़ी मुश्किलें

  • September 12, 2026
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ईरान तेल संकट के बीच होर्मुज बाब-अल-मंदेब और सऊदी तेल पाइपलाइन

तीन बड़े रास्तों पर तेल सप्लाई का संकट

सोचिए… अगर एक साथ तेल की सप्लाई के तीन बड़े समुद्री रास्ते प्रभावित हो जाएं, तो क्या होगा? तेल के लिए दुनिया के सामने क्या एक साथ तीन बड़े संकट खड़े हो गए हैं? एक तरफ़ होर्मुज़ में पहले से तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है…दूसरी तरफ़ बाब-अल-मंदेब पर हूती लड़ाकों की पकड़ मजबूत होने की खबरें हैं…और अब सऊदी अरब ने अपने उस अहम ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को भी अस्थायी तौर पर बंद कर दिया है, जिसे होर्मुज़ का वैकल्पिक रास्ता माना जाता है।

अब बड़ा सवाल ये है कि अगर ये संकट लंबा खिंचा, तो भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर कितना बड़ा दबाव आएगा? दरअसल दुनिया भर में एनर्जी का संकट बढ़ता ही जा रहा है, क्योंकि होर्मुज पहले से ही प्रभावित है और अब सऊदी अरब ने इराकी क्षेत्र से किए गए कई ड्रोन हमलों के बाद अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. इसके साथ यमन के लाल सागर तट पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले में हूती विद्रोही बाब अल-मंडेब पर कंट्रोल करने के कगार पर पहुंच चुके हैं।

होर्मुज, बाब-अल-मंदेब और सऊदी पाइपलाइन कितने अहम?

ये तीनों रास्ते दुनिया की तेल सप्लाई के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का 20 फीसदी तेल आयात करता था, जबकि सऊदी अरब के पाइपलाइन से हर दिन 40 से 50 लाख बैरल तेल सप्लाई होती थी. वहीं बाब अल-मंदेब से भी दुनिया के कुल समुद्री तेल और गैस व्यापार का लगभग 5% से 12% हिस्सा यानी 4 से 5 मिलियन बैरल हर दिन तेल सप्लाई होता है। इसका मतलब है कि इन तीनों रास्ते से करीब 30 फीसदी सप्लाई प्रभावित होगी, क्योंकि होर्मुज और बाब अल मंडेब के बाद ईरान तेल सप्लाई को अपने तरीके से चला सकता है और वह मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल-गैस को रोक सकता है।

अब अगर इन तीनों रास्तों को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है तो दुनिया की लगभग 30 फीसदी सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाएगी. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूरोप, भारत और चीन जैसे देशों को जाने वाली एनर्जी सप्लाई ज्यादा प्रभावित हो जाएंगी और अगर ये लंबे समय तक बंद रहता है तो दुनिया भर को एक भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है।

तेल संकट बढ़ा तो पेट्रोल-डीजल से महंगाई तक असर

जैसे पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम तेजी से बढ़ेंगे. सप्लाई चेन प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आने वाली चीजें काफी महंगी हो जाएंगी, भारत से इन देशों को निर्यात भी प्रभावित होगा. कच्चा माल महंगा होने से प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ जाएंगी, जिससे बाजार में खरीदारी कम होगी और महंगाई के कारण इकोनॉमी प्रभावित होगी। वही शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहेगा. जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी. कंपनियों की कमाई भी तेजी से घट सकती है, जिससे इनके शेयरों पर असर होगा।

सऊदी अरब की पाइपलाइन बंद होने से किसे झटका?

आपको बता दे की सऊदी अरब का तेल, उसके पूर्वी क्षेत्र से होते हुए Arabian Peninsula के अंदर से पश्चिम की ओर Yanbu Port की ओर जाता है, फिर यहां से लाल सागर में जाकर मिलता है और वहां से टैंकरों के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्लाई होता है. यह रास्ता दुनिया के कुल तेल का 4 से 5 फीसदी ही सप्लाई करता है, लेकिन इसकी खास बात ये है कि इससे कई देशों की आपूर्ति पूरी होती है. अब इस रास्ते के बंद होने से यूरोप के कई देश प्रभावित हो सकते हैं।

वही भारत पर इसका असर उतना गंभीर नहीं होगा, क्योंकि भारत पहले ही अपने तेल जरूरतों का ज्यादातर हिस्सा दूसरे देशों या रास्तों से आयात कर रहा है. हालांकि, एक असर ये होगा कि गल्फ से आने वाले तेल की सप्लाई कम हो जाएगी, क्योंकि पहले से ही होर्मुज का रास्ता प्रभावित है और अब होर्मुज को सरपास करने वाला ये रूट भी बंद कर दिया गया है।

बाब-अल-मंदेब पर संकट से भारत की बढ़ेगी चिंता

इधर ईरान सर्पोटिव यमन, जिसे अब लाल सागर तट कहते है वहां पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले के बाद अब स्थिति कंट्रोल होने के करीब है. यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी और उससे आगे अरब सागर से जोड़ता है। हूतियों के नियंत्रण से 29 किलोमीटर चौड़े इस जलमार्ग को तेहरान अपने नियंत्रण में ले सकता है और होर्मुज जैसी रणनीति अपनाकर हिंद महासागर में खाड़ी देशों से होने वाले ऊर्जा निर्यात को प्रभावी ढंग से रोक सकता है।

दरसल भारत के लिए यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. भारत कच्चे तेल और अन्य पेट्रोकेमिकल्स के आयात के साथ-साथ यूरोप तक पहुंचने के लिए भी बाब अल-मंडेब पर निर्भर है. ईंधन, दवाइयां, मशीनरी और अन्य वस्तुओं का परिवहन करने वाले जहाज नियमित रूप से नीदरलैंड के रॉटरडैम और फ्रांस के मार्सिले जैसे बड़े यूरोपीय बंदरगाहों तक पहुंचने के लिए इस जलमार्ग का उपयोग करते हैं।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा संकट?

ऐसे में, बाब अल-मंडेब पर कब्जा भारत को तेल की महत्वपूर्ण आपूर्ति को बाधित कर सकता है, जिसे अमेरिका- ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से खाड़ी देशों से पेट्रोलियम शिपमेंट में पहले ही काफी व्यवधान का सामना करना पड़ा है। कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की जो आपूर्ति भारत से होकर गुजरती है, वह 2023 में प्रतिदिन 93 लाख बैरल से घटकर 2025 की पहली छमाही में लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन रह जाएगी.

गौरतलब है की अभी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल है, लेकिन अगर ये आगे भी बंद रहता है तो ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि ये कितनी महंगी हो सकती हैं। तो सवाल सिर्फ ये नहीं है कि तेल के रास्ते बंद होंगे या नहीं। असली सवाल ये है कि अगर दुनिया के इन अहम ऊर्जा कॉरिडोर पर लंबे समय तक संकट बना रहा…तो क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था एक और बड़े तेल झटके को झेल पाएगी? और भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?