चिराग के बाद तेजस्वी का बड़ा दांव, शरद-रघुवंश-पासवान की विरासत पर क्यों नजर?

  • September 12, 2026
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बिहार की विरासत की सियासत में तेजस्वी यादव चिराग पासवान और दिवंगत नेताओं की विरासत

बिहार की विरासत की सियासत में तेज हुई जंग

बिहार की राजनीति में अब सिर्फ वर्तमान की सत्ता नहीं, बल्कि अतीत की विरासत भी सियासी हथियार बनती दिख रही है। दिवंगत नेताओं के नाम, उनकी प्रतिमाएं और उनके राजनीतिक योगदान को लेकर सियासी दावे तेज हो गए हैं। चिराग पासवान के बाद अब तेजस्वी यादव ने भी विरासत की राजनीति में बड़ा दांव चला है। रामविलास पासवान के साथ-साथ शरद यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेताओं को साधने की कोशिश ने सियासी बहस को और गर्म कर दिया है।

दरसल बिहार की राजनीति में इन दिनों सिर्फ चुनावी मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत और प्रतीकों को लेकर भी खींचतान दिख रही है। शहरों, सड़कों और गोलंबरों के नामकरण से शुरू हुई सियासत अब दिवंगत नेताओं की आदमकद प्रतिमाओं तक पहुंच गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस राजनीतिक कवायद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने तरीके से सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। पहले बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीशपुर करने की मांग उठी, फिर जदयू के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने का सुझाव आया। इसके बाद चिराग पासवान ने रामविलास पासवान के नाम और विरासत को सामने रखा। अब तेजस्वी यादव ने शरद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामविलास पासवान के नामों के साथ इस बहस को और बड़ा कर दिया है।

चिराग ने रामविलास पासवान की विरासत को आगे रखा

दरसल केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने मरीन ड्राइव गोलंबर का नाम अपने पिता रामविलास पासवान के नाम पर करने की मांग रखी थी। साथ ही उन्होंने नीतीश, लालू और रामविलास पासवान की आदमकद प्रतिमाएं लगाने का सुझाव दिया था। राजनीतिक तौर पर चिराग की यह पहल महत्वपूर्ण मानी गई, क्योंकि इसमें उन्होंने अपने पिता के साथ लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का नाम लेकर बिहार की तीन अलग-अलग राजनीतिक धाराओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश की।

अब तेजस्वी यादव ने भी रामविलास पासवान का नाम अपनी मांग में शामिल कर दिया है। इसके साथ उन्होंने शरद यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह की प्रतिमाएं लगाने की मांग भी रखी है। अब इसे महज प्रतिमा लगाने की मांग के बजाय राजनीतिक विरासत पर दावे की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। तेजस्वी यादव की मांग में तीन ऐसे नाम हैं, जिनका बिहार की राजनीति में अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रहा है। शरद यादव लंबे समय तक समाजवादी और सामाजिक न्याय की राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे। रघुवंश प्रसाद सिंह राजद की राजनीति और खासकर ग्रामीण एवं गरीब तबके से जुड़े मुद्दों के बड़े चेहरे रहे। वहीं रामविलास पासवान दलित राजनीति के राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे।

शरद, रघुवंश और पासवान को साथ लाने का सियासी संदेश

रामविलास पासवान सिर्फ एक बड़े दलित नेता नहीं थे, बल्कि बिहार की राजनीति में सामाजिक समीकरणों को प्रभावित करने वाले ऐसे नेता थे, जिनकी स्वीकार्यता अलग-अलग राजनीतिक खेमों में रही। ऐसे में इन तीनों नामों को एक साथ आगे कर तेजस्वी ने समाजवादी, सामाजिक न्याय और दलित राजनीति की अलग-अलग धाराओं को एक मंच पर जोड़ने का राजनीतिक संदेश दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू चिराग पासवान और तेजस्वी यादव की राजनीति से भी जुड़ा है। चिराग ने अपने पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के साथ लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे नेताओं को भी सम्मान देने की बात कही। इसके बाद तेजस्वी ने भी रामविलास पासवान का नाम अपनी मांग में शामिल किया।

दरसल शरद यादव की पहचान समाजवादी राजनीति के बड़े चेहरे के तौर पर रही। वहीं रघुवंश प्रसाद सिंह आरजेडी के सबसे पुराने और जमीन से जुड़े नेताओं में गिने जाते थे। यानी संदेश साफ है—आरजेडी अब सिर्फ मौजूदा नेताओं की राजनीति नहीं, बल्कि उन पुराने समाजवादी चेहरों की राजनीतिक पूंजी को भी अपने साथ जोड़ना चाहती है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या बिहार की राजनीति में युवा नेताओं के बीच अब दिवंगत दिग्गजों की विरासत और उनके सामाजिक आधार पर प्रभाव को लेकर नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो रही है?

नीतीश कुमार की विरासत को लेकर भी सियासत तेज

इधर सत्ता पक्ष में नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर भी लगातार चर्चा हो रही है। मंत्री संतोष कुमार सुमन की ओर से बख्तियारपुर का नाम नीतीशपुर करने की मांग और संजय झा की ओर से जदयू के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने का सुझाव इसी कड़ी में देखा जा रहा है।

यानी एक तरफ एनडीए खेमे में नीतीश कुमार की विरासत को राजनीतिक पहचान देने की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष अपने पुराने समाजवादी और सामाजिक न्याय के चेहरों को आगे रख रहा है। और अब पूरा मामला सरकार के पाले में आता दिख रहा है। अलग-अलग दलों के नेता अपने पसंदीदा राजनीतिक चेहरों को सार्वजनिक सम्मान देने की मांग कर रहे हैं। यदि सरकार किसी एक नेता के नामकरण या प्रतिमा की मांग को मंजूरी देती है तो उसके राजनीतिक संदेश को लेकर भी चर्चा होना तय है।

प्रतिमाओं और नामकरण से क्या निकलेगा राजनीतिक संदेश?

क्योंकि किसी एक नेता के नाम पर लिया गया फैसला सिर्फ सरकारी आदेश नहीं होता। वह आने वाले दिनों में यह संदेश भी दे सकता है कि सरकार किस सामाजिक समूह, किस राजनीतिक विरासत और किस ऐतिहासिक योगदान को कितनी अहमियत दे रही है। ऐसे में बिहार की विरासत की सियासत सिर्फ दिवंगत नेताओं की प्रतिमाओं या शहरों के नामकरण तक सीमित नहीं रह सकती। इसके पीछे अलग-अलग राजनीतिक दलों की सामाजिक पहुंच और पुराने राजनीतिक आधार को अपने साथ जोड़ने की कोशिश भी दिखाई दे रही है।

तो रामविलास पासवान से लेकर शरद यादव और रघुवंश प्रसाद सिंह तक— दिवंगत नेताओं के नाम पर शुरू हुई यह सियासत आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। फिलहाल गेंद बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पाले में है। अब देखना यह होगा की सरकार विरासत की इन मांगों पर क्या फैसला करती है…और उस फैसले का बिहार की सियासत पर कितना बड़ा असर पड़ता है।