यूपी चुनाव 2027: अखिलेश-राहुल में सीटों की लड़ाई, फायदा किसे?

  • September 11, 2026
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यूपी चुनाव 2027 से पहले अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच सपा कांग्रेस सीट बंटवारा

यूपी चुनाव 2027 से पहले सपा-कांग्रेस में सीटों की लड़ाई

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी जैसे-जैसे तेज हो रही है… विपक्षी गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा भी शुरू हो गई है। मुद्दा है—सीट शेयरिंग का। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस 2027 का चुनाव साथ लड़ने की तैयारी में हैं… लेकिन सीटों की संख्या को लेकर दोनों दलों के बीच फासला कम होने का नाम नहीं ले रहा। एक तरफ समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के सामने करीब 86 सीटों का प्रस्ताव रखा है… तो दूसरी तरफ कांग्रेस 105 से 115 सीटों पर दावा ठोक रही है। यानी मामला एक-दो सीट का नहीं… बल्कि करीब 20 से 30 सीटों के अंतर का है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भले ही दिल्ली और खासकर संसद में एक दूसरे का खूब सपोर्ट करते दिखते हैं, लेकिन यूपी सीट बंटवारे में फिर से वही खींचतान होनी शुरू हो गई है. तीन दिन पहले रायबरेली पहुंचे राहुल गांधी की अखिलेश यादव से मुलाकात हुई. इस दौरान सीट शेयरिंग के लेकर बात होने की खबरें आई। बताया जा रहा है कि सपा गठबंधन में कांग्रेस को जितनी सीटें ऑफर कर रही है उसमें करीब 30 सीटों को लेकर झगड़ा है. सपा के ऑफर में कांग्रेस करीब 30 सीटें ज्यादा मांगने पर अड़ी है।

सपा ने 86 सीटों का फॉर्मूला रखा, कांग्रेस की मांग ज्यादा

दरसल उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के साथ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रिश्ते की भी परीक्षा शुरू हो गई है. दोनों पार्टियां फिलहाल साथ हैं, लेकिन असली सवाल सीटों के बंटवारे का है. कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, इसे लेकर दोनों के बीच अब तक बड़ा अंतर दिख रहा है. कांग्रेस की तरफ से ज्यादा सीटों की मांग सामने आने के बाद गठबंधन को लेकर चर्चा तेज है.

हालांकि, संसद के मानसून सत्र में अखिलेश यादव जिस तरह राहुल गांधी के समर्थन में खड़े नजर आए, उससे संकेत मिला कि दोनों पार्टियां गठबंधन बचाए रखना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक सपा ने कांग्रेस के सामने 86 सीटों का फॉर्मूला रखा है. कांग्रेस इससे ज्यादा सीटों की मांग कर रही है. पार्टी 2027 में करीब 105 से 115 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. यानी दोनों पार्टियों की शुरुआती मांग में करीब 20 से 30 सीटों का अंतर है. अब बातचीत का सबसे अहम मुद्दा यही है कि दोनों के बीच कितनी सीटों पर सहमति बनती है।

वही सपा का सीट शेयरिंग फॉर्मूला 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से जुड़ा बताया जा रहा है. यूपी में कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीती थीं. सपा के फॉर्मूले के मुताबिक कांग्रेस को इन छह लोकसभा क्षेत्रों के तहत आने वाली विधानसभा सीटों में ज्यादा हिस्सेदारी दी जा सकती है। इसके अलावा बाकी लोकसभा क्षेत्रों से एक-एक विधानसभा सीट देने का प्रस्ताव बताया जा रहा है।

रायबरेली और अमेठी पर दोनों दलों की नजर

दरसल कांग्रेस पार्टी की सीट बंटवारे में सबसे ज्यादा नजर रायबरेली और अमेठी इलाके पर है. कांग्रेस इन क्षेत्रों को गांधी परिवार से जुड़े अपने मजबूत इलाकों के तौर पर देखती है. दूसरी तरफ सपा भी यहां अपनी जीती हुई विधानसभा सीटों को छोड़ना नहीं चाहती. ऊंचाहार, हरचंदपुर, गौरीगंज और अमेठी जैसी सीटों को लेकर दोनों दलों की पसंद अलग बताई जा रही है. सपा की रणनीति में अपने पुराने बागी नेताओं मनोज पांडे और राकेश प्रताप सिंह को चुनावी चुनौती देना भी शामिल है।

कांग्रेस का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में उसका राजनीतिक आधार मजबूत हुआ है. पार्टी इसी आधार पर 2027 में ज्यादा विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. कांग्रेस को लगता है कि लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा चुनाव में भी बढ़ाया जा सकता है. इसलिए पार्टी कम सीटों के समझौते के बजाय ज्यादा सीटों पर अपना संगठन और उम्मीदवार मैदान में उतारना चाहती है।

90 से 95 सीटों पर बन सकता है समझौता?

फिलहाल सपा और कांग्रेस के बीच बातचीत का रास्ता खुला हुआ है. दोनों दल जानते हैं कि अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में विपक्षी वोटों के बंटने का फायदा बीजेपी को मिल सकता है. इसी वजह से बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो सकती है.

सूत्रों के मुताबिक अंतिम समझौता सपा के 86 और कांग्रेस की 105-115 सीटों की मांग के बीच हो सकता है. आंकड़ा करीब 90 से 95 सीटों तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है. हालाँकि बड़ा सवाल यही है कि 2027 में सपा और कांग्रेस का गठबंधन सीटों की खींचतान से कितना मजबूत होकर निकलता है। क्यूंकि गठबंधन की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पार्टियां अपनी-अपनी पसंदीदा सीटों पर कितना समझौता करती है।

2017 में भी सीटों को लेकर बिगड़ा था समीकरण

गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़े थे. सपा ने कांग्रेस को 105 सीटें दी थी, लेकिन कांग्रेसी नहीं माने और 114 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए थे. इस वजह से बीजेपी को इस गठबंधन पर सवाल उठाने का पूरा मौका मिला और सपा-कांग्रेस गठबंधन बुरी तरह हारा।

इसके अलावा पड़ोसी राज्य बिहार में भी 2025 के चुनाव में कांग्रेस और आरजेडी नॉमिनेशन के आखिरी दिन तक खींचतान करते रहे. यहां भी कांग्रेस ने छह सीटों पर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारे, यहां भी बीजेपी और पूरे एनडीए ने इसको लेकर खूब हमले किए और आलम यह हुआ कि आरजेडी 25 और कांग्रेस के महज 6 विधायक जीत पाए।

हालिया दिनों में देखें तो क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने में कांग्रेस हमेशा से खींचतान करती रही है. इसका खामियाजा पूरे गठबंधन के रिजल्ट पर पड़ता रहा है. जबकि मध्य प्रदेश समेत जिन राज्यों में कांग्रेस मजबूत है वह वहां किसी दूसरे दल को तनिक भी तवज्जो नहीं देते रहे हैं।

अखिलेश यादव के सामने भी बड़ी चुनौती

दूसरी तरफ अखिलेश यादव के सामने भी कम चुनौती नहीं है। सपा को कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखना है…लेकिन ऐसा सीट शेयरिंग फॉर्मूला भी नहीं बनाना है जिससे पार्टी के अपने मजबूत उम्मीदवारों और संगठन के हित प्रभावित हों। क्योंकि 2027 का चुनाव सीधे योगी सरकार के खिलाफ सत्ता की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है।

ऐसे में विपक्षी वोटों का बंटवारा रोकना सपा-कांग्रेस दोनों के लिए बेहद अहम होगा। लेकिन सवाल यही है… क्या राहुल गांधी और अखिलेश यादव 30 सीटों के इस अंतर को पाट पाएंगे? क्या कांग्रेस 105 से 115 सीटों की अपनी मांग से पीछे हटेगी? क्या सपा 86 सीटों के अपने प्रस्ताव को बढ़ाएगी? और सबसे बड़ा सवाल…रायबरेली और अमेठी में किसका फॉर्मूला चलेगा?