सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: कौन जिम्मेदार? छात्र संगठनों ने खोला मोर्चा

  • September 7, 2026
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सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे के बाद मलबे में रेस्क्यू ऑपरेशन और छात्र संगठनों का प्रदर्शन

सत्य निकेतन में इमारत गिरने से इलाके में मचा हड़कंप

रविवार दोपहर सत्य निकेतन की एक संकरी गली में अचानक इमारत के गिरने की खबर ने पूरे इलाके को हिला दिया। आसपास रहने वाले लोग और स्थानीय लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और मलबे में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश शुरू हुई। इसके बाद पुलिस, दमकल और बचाव दलों ने मोर्चा संभाला।

सबसे बड़ी चुनौती थी मलबे के बीच यह पता लगाना कि कितने लोग अंदर फंसे हैं और उन तक सुरक्षित तरीके से कैसे पहुंचा जाए। राहतकर्मियों के लिए हर मिनट अहम था, क्योंकि मलबे के नीचे फंसे लोगों की जिंदगी बचाने के लिए लगातार सर्च ऑपरेशन चलाना पड़ रहा था। रेस्क्यू ऑपरेशन आगे बढ़ा तो हादसे की गंभीरता सामने आती गई। मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक छह लोगों की मौत हुई है, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। कुछ घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया और मलबे में फंसे लोगों की तलाश भी जारी रही।

हादसे ने कई परिवारों को अचानक त्रासदी के सामने ला खड़ा किया

इस हादसे ने कई परिवारों को अचानक ऐसी त्रासदी के सामने ला खड़ा किया, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। किसी परिवार का बेटा पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था, तो किसी के लिए यह शहर बेहतर भविष्य की उम्मीद था। लेकिन एक सुरक्षित छत समझी जाने वाली जगह ही उनके लिए जानलेवा साबित हुई।

हादसे के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। विश्वविद्यालय ने कहा कि वह सत्य निकेतन में हुई इमारत गिरने की घटना से गहरे तौर पर दुखी और चिंतित है। DU ने प्रभावित छात्रों और उनके परिवारों के प्रति संवेदना जताई और कहा कि वह अपने छात्रों की हर संभव मदद के लिए तैयार है। लेकिन DU के इस बयान के साथ ही विश्वविद्यालय से जुड़ा एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—साउथ कैंपस के आसपास बड़ी संख्या में छात्र निजी पीजी में रहते हैं, तो क्या इन आवासों की सुरक्षा को लेकर विश्वविद्यालय और संबंधित एजेंसियों के बीच कोई नियमित निगरानी व्यवस्था है?

DU छात्रों के निजी PG और किराये के मकानों की सुरक्षा पर सवाल

दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास रहने वाले छात्रों की एक बड़ी संख्या विश्वविद्यालय के हॉस्टल पर निर्भर नहीं है। सीटों की सीमित उपलब्धता के कारण छात्र आसपास के इलाकों में निजी पीजी और किराये के मकानों में रहते हैं।

यही वजह है कि सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे के बाद बहस सिर्फ इस एक इमारत तक सीमित नहीं रही। सवाल यह है कि DU से जुड़े छात्र जिन निजी इमारतों में रहते हैं, वहां स्ट्रक्चरल सेफ्टी, फायर सेफ्टी और आपातकालीन निकासी जैसे मानकों की निगरानी आखिर कौन करता है। छात्र संगठनों ने इसी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की मांग की है। नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट ने हादसे को निजी हॉस्टल और पीजी की सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए व्यापक जांच की मांग की है। संगठन का कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के दोनों परिसरों और शहर के दूसरे कॉलेजों के आसपास चल रहे निजी छात्र आवासों में सुरक्षा मानकों की जांच होनी चाहिए।

NDTF ने निजी छात्र आवासों की समयबद्ध जांच की मांग की

खास तौर पर स्ट्रक्चरल सेफ्टी और फायर सेफ्टी को लेकर सवाल उठाए गए हैं। NDTF ने समयबद्ध जांच की मांग की है, ताकि हादसे के कारणों के साथ-साथ यह भी पता लगाया जा सके कि ऐसी इमारतों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

हादसे के बाद ABVP ने सीधे नगर निगम को निशाने पर लिया। संगठन के कार्यकर्ताओं ने सिविक सेंटर के बाहर प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि अगर संबंधित एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभातीं तो ऐसे हादसे की नौबत नहीं आती। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने MCD के खिलाफ नारे लगाए और जवाबदेही तय करने की मांग की। पुलिस के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने मुख्य भवन में प्रवेश करने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हुई और करीब 15 छात्रों को हिरासत में लिया गया।

ABVP ने MCD के साथ अधिकारियों की भूमिका पर भी उठाए सवाल

ABVP का फोकस अब सिर्फ हादसे की जांच तक सीमित नहीं है। संगठन ने मांग की है कि उन पीजी संचालकों के खिलाफ कार्रवाई हो जो सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करते पाए जाएं, लेकिन साथ ही उन अधिकारियों की भूमिका भी जांची जाए जिन्होंने ऐसी इमारतों को संचालित होने दिया।

संगठन का कहना है कि किसी भी जांच का मकसद सिर्फ एक संचालक को जिम्मेदार ठहराना नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरी नियामक व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी के साथ दिल्लीभर में छात्र आवासों का सेफ्टी ऑडिट कराने की मांग भी उठाई गई है। NSUI ने भी हादसे को लेकर प्रशासनिक लापरवाही का आरोप लगाया और बचाव अभियान को तेज करने की मांग की। संगठन ने इस घटना को छात्रों की सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि दिल्ली में पढ़ने आने वाले युवाओं के लिए सुरक्षित रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है।

NSUI और SFI ने छात्र आवास की पूरी व्यवस्था पर उठाए सवाल

यहां मुद्दा सिर्फ एक इमारत की स्थिति का नहीं है, बल्कि उन हजारों छात्रों का है जो विश्वविद्यालयों के आसपास निजी आवासों में रहते हैं। अगर ऐसे आवासों के लिए नियम मौजूद हैं, तो सवाल है कि उन नियमों को जमीन पर लागू कराने की व्यवस्था कितनी मजबूत है।

SFI ने इस घटना को छात्र आवास की बड़ी समस्या से जोड़कर देखा है। संगठन के मुताबिक दिल्ली आने वाले कई छात्रों के पास सीमित विकल्प होते हैं और हॉस्टल की कमी के कारण उन्हें निजी पीजी या छोटे फ्लैटों में रहना पड़ता है। ऐसे आवासों में सिर्फ इमारत की मजबूती ही चिंता नहीं है। कमरों में भीड़, वेंटिलेशन, साफ-सफाई, किरायेदारी की औपचारिकता और मनमाने किराये जैसी समस्याएं भी छात्रों के सामने रहती हैं। यानी सत्य निकेतन की घटना ने छात्र आवास की उस पूरी व्यवस्था को सवालों के घेरे में ला दिया है, जो लंबे समय से अनौपचारिक तरीके से चलती आ रही है।

संकरी गलियों में Emergency Response भी बड़ी चुनौती

सत्य निकेतन जैसे छात्र इलाकों में एक और चुनौती सामने आती है—इलाके की बनावट। कई जगह गलियां इतनी संकरी हैं कि किसी आपात स्थिति में फायर टेंडर या भारी बचाव उपकरणों को मौके तक पहुंचाना मुश्किल हो सकता है। NDTF ने भी ऐसे इलाकों में बचाव व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। किसी इमारत में आग लगे या वह अचानक गिर जाए, तो सिर्फ इमारत की सुरक्षा ही मायने नहीं रखती; राहत दल कितनी तेजी से मौके तक पहुंच सकते हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए अब छात्र इलाकों की पूरी emergency response व्यवस्था को भी जांच के दायरे में लाने की मांग हो रही है।

सत्य निकेतन हादसे के बाद अब जवाबदेही तय करने की चुनौती

यह उस व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है जिसमें पढ़ने और भविष्य बनाने के लिए दिल्ली आने वाला छात्र कई बार सुरक्षित छत के लिए भी संघर्ष करता है। DU ने दुख जताया, छात्र संगठनों ने आवाज उठाई और अब जांच एजेंसियों के सामने जिम्मेदारी तय करने की चुनौती है। लेकिन असली जवाब तब मिलेगा जब जांच के बाद सिर्फ दोष तय नहीं होंगे, बल्कि छात्र इलाकों में मौजूद दूसरी असुरक्षित इमारतों की पहचान भी होगी।