आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत, तेजस्वी यादव के बयान से नई बहस
आरक्षण…देश की सियासत का वो मुद्दा, जिस पर बहस कभी थमती नहीं…जंतर-मंतर पर आरक्षण के विरोध में हुए आंदोलन के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है—क्या आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए? क्या आरक्षण का फायदा समाज के सबसे वंचित तबके तक पहुंच रहा है? और इसी बहस के बीच बिहार की सियासत में एक बयान ने नई बहस छेड़ दी है…आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा—उन्होंने अपने जीवन में कभी आरक्षण का लाभ नहीं लिया।
साथ ही चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पर निशाना साधते हुए कहा कि दोनों नेता आरक्षित सीटों से चुनाव लड़कर सदन पहुंचे हैं। तो सवाल ये है की तेजस्वी यादव ने अब तक ऐसा क्या किया है, जहां उन्हें आरक्षण का लाभ लेने का मौका मिलता?
यह भी पढ़ें- आरक्षण विवाद: जातिगत आरक्षण और महिला आरक्षण पर क्यों मचा बवाल?
बिहार आरक्षण विवाद में तेजस्वी यादव ने चिराग-मांझी पर साधा निशाना
दरसल बिहार में आरक्षण की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है…एक तरफ लोजपा रामविलास के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान है…तो दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी…और इनके बीच अब आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी खुलकर मैदान में हैं। दरअसल, विवाद की शुरुआत आरक्षण के भीतर अति-वंचित दलित समुदायों के लिए अलग हिस्सेदारी यानी सब-कैटेगरी की मांग से हुई। जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन की तरफ से आरक्षण की समीक्षा और उसके लाभ के बंटवारे पर सवाल उठाए गए। वहीं चिराग पासवान ने मौजूदा SC-ST आरक्षण व्यवस्था के संवैधानिक आधार पर जोर दिया और आर्थिक आधार पर आरक्षण की बहस पर सवाल उठाया।
इसी राजनीतिक खींचतान के बीच तेजस्वी यादव ने चिराग और मांझी पर हमला बोला। उन्होंने कहा—अगर आरक्षण से दिक्कत है तो मंत्री पद से इस्तीफा देकर सामान्य सीट से चुनाव लड़कर दिखाइए। तेजस्वी ने यह भी कहा कि उन्होंने खुद कभी आरक्षण का लाभ नहीं लिया। अब सवाल है की आखिर तेजस्वी यादव ने ऐसा क्या किया है, जहां उन्हें आरक्षण के आधार पर कोई सीधा लाभ मिल सकता था?
लालू यादव और तेजस्वी यादव ने आरक्षण को लेकर क्या कहा?
दरअसल आरक्षण की समीक्षा को लेकर देशभर में छिड़ी बहस में राष्ट्रीय जनता दल की तरफ से लालू प्रसाद यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव का बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल है. पिता-पुत्र दोनों आरक्षण की समीक्षा करने वालों या उसे खत्म करने के प्रयास करने वालों को सीधी चुनौती देते दिख रहे हैं. वे साफ तौर से कह रहे हैं कि भारत में आरक्षण को खत्म करने वाला कोई पैदा नहीं लिया है।
वहीं बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने कहा- ‘अभी तक कोई पैदा नहीं हुआ है जो आरक्षण को खत्म कर दे. उन लोगों को तो नागपुर से खबर जाती है कि एक पक्ष में बोलो और एक विपक्ष में बोलो. आप लोग जानते होंगे कि तेजस्वी यादव ने आजतक कभी भी आरक्षण का इस्तेमाल नहीं किया और ना ही फायदा उठाया. लेकिन चाहे जीतन राम मांझी हों. चाहे चिराग पासवान हों, ये लोग लगातार आरक्षित सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं. तेजस्वी ने कहा की आरएसएस और भाजपा शुरू से ही आरक्षण विरोधी रहे है।
तेजस्वी ने कहा की 12 साल से लगातार ये लोग मंत्री भी है, आरक्षण का लाभ भी उठाएंगे और बाद में बहस भी करेंगे। तेजस्वी यादव ने आगे कहा कि 2015 में मोहन भागवत ने कहा था आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए. बिहार के लोगों ने कान पकड़कर उनको उठक-बैठक करा दिया. इसलिए इन लोगों के कहने से कुछ नहीं होता. ये लोग केवल अपनी भलाई और कुर्सी के लिए है, ना कि समाज के लिए।
यह भी पढ़ें- जंतर-मंतर पर आरक्षण हटाओ प्रदर्शन, दिल्ली में बड़ा विरोध
आखिर तेजस्वी यादव को आरक्षण का लाभ लेने का मौका कहां मिला?
इसका जवाब समझने के लिए तेजस्वी की राजनीतिक यात्रा और उनके चुनावी सफर को देखना जरूरी है। दरअसल तेजस्वी…यादव समुदाय से आते हैं, जिसे संविधान के तहत OBC वर्ग में शामिल किया गया है। लेकिन आरक्षण का लाभ अपने आप हर क्षेत्र में नहीं मिलता। देश में लागू आरक्षण में ओबीसी कैटेगरी वालों को केवल उच्च शिक्षा, टेक्टनिकल शिक्षा या सरकारी नौकरी में आरक्षण का लाभ मिलता है. सवाल उठता है कि तेजस्वी यादव ने तो 10वीं तक की भी पढ़ाई पूरी नहीं की है. ना ही कभी भी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया है तो भला उन्हें आरक्षण का लाभ कहां से मिलता।
ग्राम पंचायत के चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक में कहीं भी ओबीसी के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं होती है. इसलिए तेजस्वी यादव के पास आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का विकल्प भी नहीं है। दरसल आरक्षण का सवाल तब आता है जब कोई व्यक्ति ऐसी शिक्षा, सरकारी नौकरी या चुनावी व्यवस्था के दायरे में आता है, जहां आरक्षित सीट या आरक्षित पद लागू हो। तेजस्वी का सार्वजनिक जीवन मुख्य तौर पर राजनीति से जुड़ा रहा है। उन्होंने क्रिकेट में भी करियर बनाने की कोशिश की, लेकिन बाद में सक्रिय राजनीति में आए। 2015 में पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे और उपमुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया। 2020 में वे राघोपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में आए।
जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद बढ़ी आरक्षण पर बहस
गौरतलब है की आरक्षण की समीक्षा और उसको खत्म करने की मांग को लेकर पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था, जिसके बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा था कि वह इस मुद्दे को लेकर अपने केंद्रीय नेतृत्व से बात करेंगे. इसके बाद से देश भर के दलित और ओबीसी नेता आरक्षण पर अपनी अपनी बात रख रहे है.
इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने आरक्षण की समीक्षा करने की वकालत की थी. उनका आरोप है कि दलित समाज को समुचित तरीके से आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है। खासकर दलित और ओबीसी की राजनीति करने वाले नेता खुलकर इसपर अपनी बात रख रहे हैं. इसी कड़ी में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि उन्होंने कभी भी आरक्षण का लाभ नहीं लिया, लेकिन जीतन राम मांझी और चिराग पासवान जैसे नेता लगातार इसका फायदा उठा रहे हैं. सवाल उठता है कि तेजस्वी यादव ने अबतक अपने जीवन में ऐसा क्या किया है जहां उन्हें आरक्षण का लाभ लेने का मौका मिलता?
आरक्षण की बहस के पीछे क्या है बड़ी सियासी लड़ाई?
लेकिन इस पूरी बहस के पीछे सिर्फ आरक्षण का सवाल नहीं है। इसके पीछे है—दलित राजनीति की दिशा। पिछड़े वर्गों की राजनीति और बिहार में सामाजिक न्याय की अगली सियासत। फिलहाल आप इस खबर को लेकर क्या सोचते है अपनी राय हमें कमैंट्स में जरूर बताए।
FAQ
दिए गए कंटेंट के अनुसार, विवाद आरक्षण के भीतर अति-वंचित दलित समुदायों के लिए अलग हिस्सेदारी यानी सब-कैटेगरी की मांग और आरक्षण की समीक्षा को लेकर उठे सवालों के बीच तेज हुआ।
तेजस्वी यादव ने कहा कि उन्होंने आजतक आरक्षण का इस्तेमाल नहीं किया और न ही उसका फायदा उठाया। उन्होंने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी पर आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने को लेकर निशाना साधा।
तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर आरक्षण से दिक्कत है तो मंत्री पद से इस्तीफा देकर सामान्य सीट से चुनाव लड़कर दिखाना चाहिए।
दिए गए कंटेंट के अनुसार, तेजस्वी यादव का कहना है कि उन्होंने न तो ऐसी शिक्षा प्राप्त की जहां उन्हें आरक्षण का लाभ मिला हो और न ही सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया। उनके राजनीतिक सफर में भी उन्होंने आरक्षित विधानसभा या लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ा।
दिए गए कंटेंट के अनुसार, जीतन राम मांझी ने आरक्षण की समीक्षा की वकालत की और आरोप लगाया कि दलित समाज को समुचित तरीके से आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है।


