हिजाब विवाद: ओवैसी का बड़ा बयान, मायावती ने योगी पर क्या कहा?

  • August 26, 2026
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उत्तर प्रदेश में हिजाब विवाद पर ओवैसी और मायावती की प्रतिक्रिया

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद बढ़ा हिजाब विवाद

उत्तर प्रदेश में स्कूलों में हिजाब और यूनिफॉर्म से जुड़ा विवाद अब राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के बाद इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने जहां मामले को आपसी समझ और संवेदनशीलता से सुलझाने की अपील की है, वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले पर असहमति जताते हुए इसे संविधान में मिले मौलिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश के स्कूलों में ड्रेस कोड और हिजाब के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने प्रयागराज के एक निजी स्कूल की छात्रा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त तौर पर हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी।

हिजाब पहनने को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि छात्रा यह साबित करने में असफल रही कि हिजाब पहनना इस्लाम का ऐसा अभिन्न या अनिवार्य अंग है, जिसकी अनुपस्थिति में धर्म का पालन असंभव हो जाए। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया। दरअसल मामले की शुरुआत तब हुई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की दो जजों की बेंच ने एक याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिका दाखिल करने वाली छात्रा यह साबित नहीं कर पाई कि हिजाब पहनना उसके धर्म का ऐसा जरूरी हिस्सा है, जिसके बिना उसकी आस्था पर खतरा पैदा हो जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि स्कूल में हिजाब पहनने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

मायावती ने आपसी समझ से समाधान की अपील की

इसी फैसले के बाद यह पूरा विवाद खड़ा हुआ और देशभर में इस पर बहस शुरू हो गई। इसी बीच बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एक ऐसा संविधान दिया है, जो हर जाति और धर्म को बराबरी का अधिकार देता है।

उनका कहना है कि हर धर्म के लोगों को अपनी धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के हिसाब से जीने का हक है, और इसमें दखल देने के बजाय इसकी पवित्रता का सम्मान होना चाहिए। मायावती ने विशेष रूप से स्कूलों में यूनिफॉर्म और धार्मिक पहनावे के सवाल को लेकर स्कूल प्रबंधन तथा प्रशासन से व्यावहारिक समाधान निकालने की अपील की। उन्होंने कहा कि पर्दा, चादर या हिजाब जैसे विषयों को आवश्यकता से अधिक तूल देकर उन्हें लगातार कानूनी विवाद में बदलने के बजाय संबंधित पक्षों को आपसी समझ से रास्ता निकालना चाहिए।

दूसरी ओर, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर खुलकर असहमति जताई। हैदराबाद स्थित पार्टी मुख्यालय में उन्होंने कहा कि वह अदालत के निर्णय से सहमत नहीं हैं। ओवैसी ने दावा किया कि हिजाब पहनने के सवाल पर दिया गया फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 में दिए गए अधिकारों के अनुरूप नहीं है। ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल उठाते हुए पूछा कि किसी व्यक्ति के धार्मिक आचरण में क्या आवश्यक है और क्या नहीं, इसका निर्धारण कौन करेगा।

ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल उठाया

उन्होंने हिजाब को लेकर अदालत की टिप्पणी को इस्लाम और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए इसका विरोध किया। हालांकि, उनके ये बयान अदालत के फैसले की उनकी राजनीतिक और कानूनी व्याख्या हैं। इसी कार्यक्रम में ओवैसी ने यूपी चुनाव को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा कि हर समुदाय की तरह मुसलमानों की भी अपनी अलग राजनीतिक लीडरशिप होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि 18 करोड़ की आबादी वाले समुदाय के पास संसद में सिर्फ 24 सांसद हैं, जो उनकी आवाज उठाने के लिए काफी नहीं हैं।

दरअसल हिजाब विवाद के केंद्र में स्कूलों में निर्धारित ड्रेस कोड और विद्यार्थियों की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल है। स्कूलों में यूनिफॉर्म का उद्देश्य सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस व्यवस्था बनाए रखना होता है। दूसरी तरफ, धार्मिक आस्था से जुड़े पहनावे को लेकर नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का हवाला देते रहे हैं। इसी वजह से इस तरह के मामलों में शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है।

मायावती और ओवैसी का अलग-अलग नजरिया

अलग-अलग राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने दृष्टिकोण से देख रहे हैं। मायावती का जोर विवाद को शांतिपूर्ण और स्थानीय स्तर पर सुलझाने पर है, जबकि ओवैसी ने सीधे अदालत के फैसले की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किए हैं। मामला केवल हिजाब तक सीमित नहीं है। भारत जैसे बहुधार्मिक देश में स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक पहचान से जुड़े पहनावे को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। ऐसे मामलों में अदालतें जहां संविधान और कानून के आधार पर निर्णय लेती हैं, वहीं राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं।

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक बहस का हिस्सा बना मुद्दा

फिलहाल उत्तर प्रदेश में हिजाब विवाद राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। एक तरफ संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की चर्चा है, तो दूसरी तरफ शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और समान यूनिफॉर्म व्यवस्था का सवाल है। मायावती ने जहां टकराव से बचने और आपसी सहमति से समाधान तलाशने का रास्ता सुझाया है, वहीं ओवैसी ने अदालत के फैसले का विरोध करते हुए मौलिक अधिकारों का मुद्दा उठाया है। अब इस मुद्दे पर आगे की राजनीतिक और कानूनी बहस किस दिशा में जाती है, इस पर सभी की नजर रहेगी।