वंदे मातरम् विवाद के बीच बीके हरिप्रसाद का बड़ा बयान
वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बयानबाजी का बड़ा मुद्दा बन गया है। मामला इस बात को लेकर है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के कितने छंद गाए जाएं। इसी बीच कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने अपना रुख साफ कर दिया। उन्होंने कहा कि वह वंदे मातरम् के सिर्फ दो छंद गाएंगे।
हरिप्रसाद ने यह भी कहा कि उन पर चाहे किसी तरह का दबाव बनाया जाए, वह अपना फैसला नहीं बदलेंगे। उनके इस बयान के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर सवाल उठाए हैं। वहीं कांग्रेस की ओर से इसे पार्टी के ऐतिहासिक रुख से जोड़कर देखा जा रहा है। बीके हरिप्रसाद के बयान की सबसे ज्यादा चर्चा उनकी उस टिप्पणी को लेकर है, जिसमें उन्होंने कहा कि फांसी दी जाए या जेल भेजा जाए, वह वंदे मातरम् के दो ही छंद गाएंगे। इस बयान के जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह किसी दबाव में अपना रुख नहीं बदलेंगे।
बीके हरिप्रसाद सिर्फ दो छंद गाने पर क्यों अड़े?
हरिप्रसाद ने कहा कि कांग्रेस पहले भी वंदे मातरम् का गायन करती रही है और आगे भी शुरुआती दो छंद गाती रहेगी। उनके अनुसार कांग्रेस लंबे समय से वंदे मातरम् के दो छंद गाती रही है और वह इसी परंपरा को आगे भी जारी रखेंगे। इस बयान के पीछे वंदे मातरम् के गायन को लेकर लंबे समय से चली आ रही ऐतिहासिक बहस भी है। गीत के अलग-अलग हिस्सों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक विचार सामने आते रहे हैं। इसी वजह से शुरुआती दो छंदों के गायन को लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक अलग परंपरा देखने को मिलती है।
आजादी की लड़ाई से जुड़ा है वंदे मातरम् का इतिहास
वंदे मातरम् का इतिहास भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना वंदे मातरम् ने आजादी की लड़ाई के दौरान लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय भावना और संघर्ष का प्रतीक बन गया था। स्वतंत्रता सेनानियों और आम लोगों के बीच भी इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई। इसलिए आज भी वंदे मातरम् को केवल एक गीत के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक स्मृति से जोड़कर देखा जाता है।
बीके हरिप्रसाद ने बीजेपी और RSS पर भी साधा निशाना
बीके हरिप्रसाद ने सिर्फ वंदे मातरम् के दो छंदों की बात नहीं की। उन्होंने अपने बयान में बीजेपी और आरएसएस पर भी निशाना साधा। हरिप्रसाद ने सवाल उठाया कि आजादी की लड़ाई के दौरान वंदे मातरम् और इंकलाब जिंदाबाद जैसे नारों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन बीजेपी और आरएसएस ने कभी इन नारों का इस्तेमाल किया है या नहीं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी राजनीतिक दल से प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है। इस बयान के बाद विवाद और बढ़ गया, क्योंकि इसमें सीधे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी संगठनों पर सवाल उठाया गया।
कांग्रेस और बीजेपी के बीच बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
हरिप्रसाद के बयान के बाद बीजेपी की ओर से कांग्रेस पर सवाल उठाए जाने की उम्मीद है। बीजेपी लगातार राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा बनाती रही है। ऐसे में कांग्रेस नेता का यह कहना कि वह सिर्फ दो छंद गाएंगे, बीजेपी के लिए कांग्रेस को घेरने का एक और मौका बन सकता है। बीजेपी का तर्क यह हो सकता है कि वंदे मातरम् देश की राष्ट्रीय भावना से जुड़ा गीत है और इसका पूरा सम्मान होना चाहिए। दूसरी तरफ कांग्रेस अपने नेता के बयान को ऐतिहासिक परंपरा और पार्टी के रुख से जोड़ रही है। इसी वजह से राजनीतिक टकराव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस का कहना- वंदे मातरम् का हमेशा सम्मान किया
कांग्रेस की ओर से इस मामले को देखने का तरीका बीजेपी से अलग है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम् का सम्मान पार्टी हमेशा से करती रही है। बीके हरिप्रसाद ने भी अपने बयान में यही बात कही कि कांग्रेस वंदे मातरम् का गायन पहले से करती आई है। उनका जोर इस बात पर है कि दो छंदों का गायन किया जाए। यानी विवाद गीत के सम्मान को लेकर नहीं, बल्कि इसके कितने हिस्से सार्वजनिक रूप से गाए जाएं, इस सवाल को लेकर ज्यादा दिखाई दे रहा है। यही अंतर अब दोनों राजनीतिक दलों के बीच बहस का मुख्य कारण बन गया है।
इंकलाब जिंदाबाद का भी किया जिक्र
बीके हरिप्रसाद ने अपने बयान में वंदे मातरम् के साथ इंकलाब जिंदाबाद का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान ये नारे लगाए जाते थे। इस संदर्भ के जरिए उन्होंने कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास को सामने रखने की कोशिश की। हरिप्रसाद ने बीजेपी और आरएसएस से सवाल किया कि क्या उन्होंने कभी इन नारों का इस्तेमाल किया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस को देशभक्ति का प्रमाणपत्र किसी राजनीतिक दल से लेने की जरूरत नहीं है। इस बयान ने वंदे मातरम् के विवाद को सीधे राजनीतिक इतिहास और देशभक्ति की बहस से जोड़ दिया।
क्या वंदे मातरम् को राजनीति से अलग रखा जा सकता है?
दरअसल, वंदे मातरम् को लेकर बहस केवल गायन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे इतिहास, राजनीति, राष्ट्रीय भावना और अलग-अलग सामाजिक दृष्टिकोण भी जुड़े हुए हैं। जब कोई राजनीतिक दल या नेता इस मुद्दे पर बयान देता है, तो उसके साथ पुराने राजनीतिक विवाद भी जुड़ जाते हैं। बीके हरिप्रसाद के बयान के बाद भी यही हुआ। उनके बयान में कांग्रेस की परंपरा का जिक्र है और साथ ही बीजेपी-आरएसएस पर राजनीतिक सवाल उठाए गए हैं। इसलिए अब बहस सिर्फ दो छंदों तक सीमित नहीं रही। यह सवाल भी उठ रहा है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीति से किस तरह अलग रखा जाए।
“फांसी दें या जेल भेजें…” बयान क्यों हुआ वायरल?
हरिप्रसाद के बयान का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा उनकी यह टिप्पणी है कि फांसी दी जाए या जेल भेजा जाए, वह दो छंद ही गाएंगे। यह भाषा बताती है कि नेता इस मुद्दे पर अपने रुख को लेकर कितना स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं। राजनीतिक नजरिए से देखें तो ऐसा बयान अपने समर्थकों को मजबूत संदेश देता है, वहीं विरोधी दल के लिए यह हमला करने का मौका भी बन जाता है। इसी वजह से यह बयान आने वाले समय में कांग्रेस और बीजेपी की राजनीतिक बहस में बार-बार सामने आ सकता है।
सोशल मीडिया पर भी तेज हो सकती है बहस
वंदे मातरम् विवाद का असर सोशल मीडिया पर भी दिखाई दे सकता है। जैसे ही किसी बड़े राजनीतिक नेता का बयान सामने आता है, उसके समर्थन और विरोध में प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। हरिप्रसाद का “फांसी दें या जेल भेजें” वाला बयान भी अपनी तीखी भाषा के कारण चर्चा में है। समर्थक इसे अपने रुख पर मजबूती के रूप में देख सकते हैं, जबकि विरोधी इसे राष्ट्रीय गीत को लेकर आपत्तिजनक या राजनीतिक बयान के तौर पर पेश कर सकते हैं। हालांकि पूरे मामले को समझने के लिए मूल बयान और उसके संदर्भ को देखना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक टकराव से अलग रखा जा सकता है। वंदे मातरम् देश के स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण विरासत है और इसका सम्मान सभी पक्षों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इसके गायन के तरीके को लेकर राजनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं। बीके हरिप्रसाद ने अपने बयान से इसी मतभेद को फिर सामने ला दिया है। उन्होंने कहा है कि चाहे उन्हें फांसी दी जाए या जेल भेजा जाए, वह दो छंद ही गाएंगे। अब राजनीतिक बहस का अगला चरण इस बयान पर आने वाली प्रतिक्रियाओं से तय होगा।


