25 जून 1975 की रात भारत में Emergency लागू हुई और 21 मार्च 1977 तक देश आपातकाल के दौर से गुजरा। जानिए राजनारायण केस, जेपी आंदोलन और इंदिरा गांधी के फैसले से जुड़ी पूरी कहानी।
25 जून 1975: जब भारत में लगा Emergency
जिसने भारत की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया, जिसने 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान को करारी शिकस्त दिलाई और बांग्लादेश के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई, उसी इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन से जुड़ा एक ऐसा अध्याय भी है जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में बेहद विवादित माना जाता है।
25 जून 1975 की रात भारत में Emergency लागू की गई। इसके बाद 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक देश आपातकाल के दौर से गुजरा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसे देश के लिए जरूरी और समय की मांग बताया था। हालांकि, इसके पीछे राजनीतिक परिस्थितियों और उनकी सत्ता पर बढ़ते दबाव की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि Emergency की कहानी सिर्फ एक सरकारी फैसले की कहानी नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक संकट, अदालत का फैसला, विपक्षी आंदोलन और सत्ता पर बढ़ते दबाव की पूरी कड़ी जुड़ी हुई है।
Emergency से पहले ही बन चुकी थी राजनीतिक संकट की जमीन
दरअसल, Emergency की कहानी को समझने के लिए 12 जून 1975 से शुरुआत करना जरूरी है। इसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के 1971 के चुनाव को लेकर अहम फैसला सुनाया था। इंदिरा गांधी रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीती थीं। उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण ने उनके चुनाव को चुनौती दी थी। उन्होंने चुनाव प्रचार में सरकारी मशीनरी के कथित इस्तेमाल समेत कई आरोप लगाए थे। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा और 12 जून 1975 को जस्टिस सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी माना। उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया गया और उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने की रोक भी लगाई गई। इस फैसले ने इंदिरा गांधी की राजनीतिक स्थिति को बेहद मुश्किल बना दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री पद पर बने रहने को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया।
राजनारायण केस ने बदल दिया पूरा राजनीतिक समीकरण
राजनारायण की याचिका में इंदिरा गांधी पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोपों में सरकारी अधिकारियों को चुनाव एजेंट बनाने, चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और मतदाताओं को प्रभावित करने जैसी बातें शामिल थीं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी के सामने राजनीतिक संकट खड़ा हो गया। एक तरफ अदालत का फैसला था, तो दूसरी तरफ विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ गया था। इसी बीच इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति दी, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई। इसके साथ ही उनके संसद सदस्य के रूप में मतदान करने के अधिकार पर भी रोक रही। इस फैसले के बाद राजनीतिक तनाव और बढ़ गया।
रामलीला मैदान की रैली और जेपी आंदोलन
इधर गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलनों के बाद विपक्षी दल कांग्रेस सरकार के खिलाफ लगातार एकजुट हो रहे थे। जयप्रकाश नारायण यानी जेपी इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की बड़ी जनसभा हुई। इस दौरान सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे उठाए गए। इस रैली ने सरकार और विपक्ष के बीच टकराव को और तेज कर दिया। इंदिरा गांधी की सरकार पहले से ही अदालत के फैसले और विपक्ष के दबाव से घिरी हुई थी। ऐसे में जेपी की रैली ने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया।
25 जून की रात क्या हुआ था?
25 जून की रात घटनाएं तेजी से बदलीं। आपके दिए गए कंटेंट के मुताबिक, Emergency लागू करने की तैयारी के दौरान सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के बीच बैठकें हुईं। इसी दौरान जेलों में बड़ी संख्या में लोगों को रखने की तैयारियां भी शुरू की गईं। तिहाड़ जेल प्रशासन को बड़ी संख्या में कैदियों के लिए जगह तैयार रखने के निर्देश दिए जाने का उल्लेख भी इस कहानी में आता है। इसके बाद इंदिरा गांधी राष्ट्रपति भवन पहुंचीं और तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने Emergency लगाने का प्रस्ताव रखा गया। राष्ट्रपति ने Emergency की घोषणा से जुड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही देश में आंतरिक आपातकाल लागू हो गया।
26 जून की सुबह इंदिरा गांधी ने देश को क्या बताया?
अगली सुबह देश के लोगों ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज सुनी। उन्होंने देशवासियों को बताया कि राष्ट्रपति ने Emergency की घोषणा की है और इससे डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल चुका था। कई बड़े विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका था और देश में राजनीतिक गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंधों का दौर शुरू हो गया था। यानी एक तरफ सरकार लोगों को सामान्य स्थिति का संदेश दे रही थी, जबकि दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो चुकी थीं।
Emergency के बाद शुरू हुआ गिरफ्तारियों का दौर
Emergency लागू होने के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। आपके दिए गए कंटेंट के अनुसार, मीसा के तहत 36 हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि अकेले बिहार से करीब 2,500 लोगों की गिरफ्तारी का उल्लेख है। 25 जून की रात करीब डेढ़ बजे जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार किए जाने का भी जिक्र है। इसके बाद देश के कई प्रमुख विपक्षी नेता जेल पहुंच गए। इस दौरान गिरफ्तार किए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह स्पष्ट जानकारी नहीं थी कि वे कितने समय तक जेल में रहेंगे या Emergency कितने समय तक जारी रहेगी।
इंदिरा गांधी ने Emergency क्यों लगाई?
Emergency लगाने को लेकर सरकार की ओर से देश में आंतरिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता को आधार बताया गया था। वहीं, इसके राजनीतिक संदर्भ को देखें तो इंदिरा गांधी के सामने उस समय कई मोर्चे खुल चुके थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, सुप्रीम कोर्ट का आदेश, विपक्ष का इस्तीफे का दबाव और जेपी आंदोलन—इन सभी घटनाओं ने उनकी सरकार के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया था। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में Emergency लागू करने का फैसला लिया गया।
संजय गांधी की भूमिका भी चर्चा में रही
Emergency के दौरान संजय गांधी की भूमिका भी राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बनी। आपके दिए गए कंटेंट में Emergency के दौरान संजय गांधी और उनकी करीबी टीम के प्रभाव का उल्लेख किया गया है। सरकार और प्रशासन के कामकाज पर उनके प्रभाव को लेकर उस समय और बाद में भी सवाल उठाए गए। इसी वजह से Emergency का इतिहास सिर्फ इंदिरा गांधी के फैसले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें संजय गांधी की भूमिका भी लगातार चर्चा का विषय बनी।
19 महीने तक चला Emergency का दौर
Emergency करीब 19 महीने तक जारी रही। इस दौरान विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं और राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंधों का दौर बना रहा। सरकार का दावा था कि इससे देश में स्थिरता आएगी और व्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन समय बीतने के साथ Emergency के खिलाफ असंतोष भी बढ़ता गया। जिस विरोध को शांत करने के लिए Emergency लागू की गई थी, वही विरोध आगे चलकर कांग्रेस के खिलाफ बड़े राजनीतिक गुस्से में बदल गया।
18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने किया बड़ा ऐलान
18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। इसके बाद 16 मार्च 1977 को लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों को हार का सामना करना पड़ा। इसके कुछ ही दिनों बाद 21 मार्च 1977 को Emergency समाप्त कर दी गई। इस तरह 25 जून 1975 से शुरू हुआ भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का यह विवादित दौर करीब 19 महीने बाद खत्म हुआ।
Emergency के बाद भारतीय राजनीति में आया बड़ा बदलाव
Emergency खत्म होने के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और विपक्षी दलों ने मिलकर सरकार बनाई। Emergency का दौर भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा राजनीतिक सबक बन गया। इसने यह सवाल भी सामने रखा कि सत्ता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन कितना जरूरी है। इसी कारण आज भी 25 जून 1975 को भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और विवादित दिनों में गिना जाता है।
31 अक्टूबर 1984: इंदिरा गांधी की हत्या
Emergency के कई साल बाद इंदिरा गांधी के जीवन का अंत भी भारतीय इतिहास की एक बड़ी त्रासदी के रूप में हुआ। 31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा गांधी अपने आवास से एक कार्यक्रम के लिए निकल रही थीं। इसी दौरान उनके दो सुरक्षा कर्मियों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उन पर गोलियां चला दीं। इंदिरा गांधी गंभीर रूप से घायल हुईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी हत्या के बाद देश के कई हिस्सों में सिख-विरोधी हिंसा भड़क गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई।
इंदिरा गांधी की विरासत आज भी विवादित क्यों है?
इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की उन शख्सियतों में शामिल हैं जिनकी विरासत को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। एक तरफ उन्हें शक्तिशाली प्रधानमंत्री, निर्णायक नेता और 1971 के युद्ध में भारत की बड़ी राजनीतिक भूमिका निभाने वाली नेता के तौर पर याद किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ Emergency उनके राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित अध्याय है। यही विरोधाभास इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत को आज भी बहस का विषय बनाए रखता है।
Emergency ने भारतीय राजनीति को बदल दिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का यह दौर आज भी भारत के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। तो Emergency की पटकथा से लेकर सत्ता से बाहर होने और फिर इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ने वाली इंदिरा गांधी की यह कहानी आपको कैसी लगी? अपनी राय हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।


