उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन इसकी सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है। चुनाव से पहले एक बार फिर ब्राह्मण वोट बैंक राजनीतिक दलों के लिए बेहद अहम होता दिखाई दे रहा है। बीजेपी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बाद अब AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयानों ने भी इस बहस को और हवा दे दी है।
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया कि बुलडोजर कार्रवाई और एनकाउंटर का असर सिर्फ मुसलमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्राह्मण समाज भी इसका शिकार हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के निशाने पर सबसे पहले मुसलमान और उसके बाद ब्राह्मण समाज आता है। यही बयान अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है। सवाल उठ रहा है कि आमतौर पर मुस्लिम राजनीति के प्रमुख चेहरे के तौर पर देखे जाने वाले ओवैसी को अचानक ब्राह्मण समाज की चिंता क्यों होने लगी है?
ब्राह्मण वोटों पर सभी दलों की नजर
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज की आबादी को आमतौर पर करीब 10 से 12 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। संख्या के लिहाज से यह वोट बैंक बहुत बड़ा भले ही न हो, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में इसका राजनीतिक प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि यूपी चुनाव 2027 से पहले लगभग हर प्रमुख दल ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।
समाजवादी पार्टी ने अपने PDA फॉर्मूले की व्याख्या में ‘P’ को पिछड़ा के साथ-साथ ‘पंडित’ से जोड़ने की कोशिश की है। वहीं मायावती भी अपने पुराने ब्राह्मण-दलित समीकरण की याद दिलाती रही हैं। अब AIMIM भी ब्राह्मण समाज को लेकर बयान दे रही है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ओवैसी ब्राह्मणों की बात क्यों कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि क्या AIMIM यूपी की राजनीति में अपने पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक से बाहर निकलकर नया सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है?
ओवैसी का ‘ब्राह्मण कार्ड’ कितना बड़ा दांव?
असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति लंबे समय से मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। AIMIM को भी उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर देखा जाता है। लेकिन अब पार्टी की रणनीति में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी ने साफ किया है कि उनकी पार्टी चुनाव मैदान में उतरेगी। कितनी सीटों पर चुनाव लड़ा जाएगा, इसका अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है।
इसी बीच पार्टी की ओर से ब्राह्मण चेहरे को टिकट देने का ऐलान भी चर्चा में आया। यह संकेत देता है कि AIMIM सिर्फ एक समुदाय तक सीमित राजनीतिक पहचान से बाहर निकलने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, सिर्फ किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट देना या ब्राह्मणों के पक्ष में बयान देना अपने आप में बड़े चुनावी गठबंधन का प्रमाण नहीं है। इसका वास्तविक असर चुनाव के दौरान वोटिंग पैटर्न सामने आने के बाद ही पता चलेगा।
क्या AIMIM मुस्लिम वोटों से आगे बढ़ना चाहती है?
राजनीतिक तौर पर ओवैसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि AIMIM को केवल मुस्लिम वोटों तक सीमित पार्टी की छवि से बाहर कैसे निकाला जाए। बिहार के सीमांचल और महाराष्ट्र के कुछ स्थानीय चुनावों में AIMIM ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह मुस्लिम वोटों के अलावा भी दूसरे सामाजिक समूहों में अपनी राजनीतिक जगह बना सकती है।
उत्तर प्रदेश में भी ओवैसी पिछड़े और सवर्ण समुदायों के बीच अपनी पहुंच बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। उनका संदेश यह है कि राजनीति में केवल एक समुदाय की भागीदारी पर्याप्त नहीं है। AIMIM अब हिस्सेदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात कर रही है। इसी रणनीति के तहत ब्राह्मण समाज तक पहुंच बनाने की कोशिश को देखा जा रहा है।
मायावती और अखिलेश भी पीछे नहीं
ब्राह्मण वोटों को लेकर सबसे दिलचस्प मुकाबला सिर्फ बीजेपी और AIMIM के बीच नहीं है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी इस वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण के सहारे उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। यही वजह है कि बीएसपी के लिए ब्राह्मण वोट बैंक आज भी महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार माना जाता है।
दूसरी तरफ अखिलेश यादव भी अपनी पार्टी की पुरानी मुस्लिम-यादव छवि से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। PDA के ‘P’ को पंडित से जोड़ना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। सवाल यह है कि क्या यह कोशिश बीजेपी के पारंपरिक ब्राह्मण समर्थन को वास्तव में प्रभावित कर पाएगी?
बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा लंबे समय से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है। हालांकि, किसी भी चुनाव में यह मान लेना कि कोई पूरा समुदाय एक ही पार्टी को वोट करेगा, राजनीतिक रूप से जोखिम भरा आकलन है। बीजेपी के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थन को बनाए रखने के साथ-साथ पिछड़े, दलित और महिला मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत रखे। वहीं विपक्षी दलों के सामने इससे भी बड़ी चुनौती है। सिर्फ बीजेपी से नाराजगी पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें ऐसा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाना होगा जो चुनाव के दिन वोट में बदल सके।
ओवैसी और अखिलेश के बीच भी सियासी टकराव
ओवैसी ने हाल के दिनों में अखिलेश यादव को गठबंधन का प्रस्ताव भी दिया है। साथ ही उन्होंने समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए अखिलेश पर निशाना साधा है। अगर AIMIM उत्तर प्रदेश में पर्याप्त सीटों पर चुनाव लड़ती है और मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा अपने पक्ष में खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी के चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है। यही वजह है कि ओवैसी की सक्रियता को सिर्फ ब्राह्मण वोटों तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे मुस्लिम वोटों में हिस्सेदारी बढ़ाने और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है।
क्या ब्राह्मण वोट बीजेपी से खिसकेंगे?
यह सबसे बड़ा सवाल है, लेकिन अभी इसका कोई निश्चित जवाब नहीं है। बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों की लगातार कोशिश के बावजूद ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बीजेपी से जुड़ा हुआ है। हालांकि, चुनावी राजनीति में वोट बैंक स्थायी नहीं होते। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, सरकार का प्रदर्शन, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय राजनीति मतदान को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए यूपी चुनाव 2027 में ब्राह्मण वोटों का रुख चुनावी नतीजों पर असर डालने वाले कई कारकों में से एक हो सकता है। फिलहाल ओवैसी का ब्राह्मणों को लेकर बयान एक बड़े चुनावी प्रयोग का संकेत जरूर देता है, लेकिन इसे अभी से किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी।
असली परीक्षा चुनाव के मैदान में होगी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हर पार्टी अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। बीजेपी सत्ता बचाने की तैयारी में है, समाजवादी पार्टी वापसी का रास्ता तलाश रही है, मायावती अपने पुराने सामाजिक समीकरण को फिर मजबूत करना चाहती हैं और AIMIM उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जगह बढ़ाना चाहती है। ऐसे में ब्राह्मण समाज को लेकर ओवैसी का रुख सिर्फ बयानबाजी है या किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा, इसका जवाब आने वाले महीनों में ज्यादा स्पष्ट होगा।
अभी इतना जरूर कहा जा सकता है कि यूपी चुनाव 2027 से पहले ब्राह्मण वोटों की लड़ाई दिलचस्प होने वाली है। अगर AIMIM मुस्लिम वोटों के साथ ब्राह्मण या दूसरे गैर-मुस्लिम समुदायों के एक हिस्से को जोड़ने में सफल होती है, तो इसका असर विपक्षी दलों के समीकरण पर पड़ सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, अगर यह रणनीति जमीन पर वोट में नहीं बदलती, तो ओवैसी का ‘ब्राह्मण कार्ड’ सिर्फ चुनावी बयान बनकर रह जाएगा। अब सवाल यही है—क्या ओवैसी की ब्राह्मणों को साधने की रणनीति बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी? या फिर यूपी चुनाव 2027 में ब्राह्मण समाज एक बार फिर बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा नजर आएगा?


