उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हिंदुत्व और सनातन सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनने की ओर बढ़ रहा है।
क्या यूपी में ‘असली सनातनी’ बनने की होड़ शुरू हो चुकी है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हिंदुत्व और सनातन सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनने की ओर बढ़ रहा है। दिलचस्प बात ये है कि जिस मुद्दे पर अब तक बीजेपी का दबदबा माना जाता था, उसी मैदान में अब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी उतरती दिखाई दे रही हैं। सवाल है… क्या यूपी में ‘असली सनातनी’ बनने की होड़ शुरू हो चुकी है? और क्या इससे बीजेपी की बढ़त को चुनौती मिलेगी?
2027 चुनाव का संदर्भ
दरसअल उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की कवायद में है तो कांग्रेस और सपा सत्ता में वापसी को बेताब हैं. ऐसे में यूपी की चुनावी पिच पर सिर्फ विकास, रोजगार और कानून व्यवस्था की गूंज नहीं बल्कि खुद को असली सनातनी बताने की होड़ मची हुई है। बीजेपी ने हिंदुत्व के जरिए सियासी बुलंदी हासिल की है और खुद को सनातन की असली पैरोकार बताती रही है. अब बीजेपी के पारंपरिक कोर एजेंडे पर सपा और कांग्रेस ने भी दांव खेल दिया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि ‘समाजवाद ही सनातन है’ तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने ‘आजतक पंचायत उत्तर प्रदेश’ के कार्यक्रम में कांग्रेस हो असली सनातनी बताया।
सपा की बदलती रणनीति और सॉफ्ट हिंदुत्व
दरसअल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बदले-बदले नजर आ रहे हैं. हाल के दिनों में उन्होंने राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण को उठाते हुए भगवान राम में आस्था रखने वालों की बात की तो वहीं शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के चरणों में भी बैठे दिखे. लखनऊ में सपा की ओर से ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन कराया गया और अब ऐसे ही एक और कार्यक्रम की तैयारी है. यही नहीं सपा दफ्तर के बाहर तो ‘सनातन ही समाजवाद है’ लिखा बैनर लगाया गया. ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर यूपी में प्रभावी सवर्ण वोट लुभाने के लिए उन्हें यही रास्ता दिखा है?
बीजेपी का आरोप और सनातन की राजनीति पर बहस
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा वैचारिक बदलाव साफ दिख रहा है. कांग्रेस और सपा अपने आपको सनातनी बताने की कोशिश कर रही है तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी विपक्ष के इस बदले रूप को ‘चुनावी ढोंग’ और ‘मौकापरस्ती’ बताकर निशाने पर ले रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यूपी की राजनीति में सपा और कांग्रेस खुद को ‘सनातनी’ साबित करने में क्यों जुट गई हैं ?
दरसअल समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने पिछले दिनों लखनऊ में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात किया. इस दौरान उन्होंने गौरक्षा से लेकर सनातन के मुद्दे पर चर्चा की फिर सपा प्रमुख ने ट्वीट कर लिखा, ‘समाजवाद ही सनातन है’. इसके बाद सपा कार्यालय के बाहर लगी कई होर्डिंग में सनातन और समाजवाद को एक साथ जोड़ने वाली कोशिश दिखाई दी. होर्डिंग में लिखा गया है कि ‘सनातन ही समाजवाद है।
सपा-कांग्रेस की नई चुनावी रणनीति क्यों?
दरसअल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अपने सियासी सिलेबस में बदलाव किया है. सेक्लुयर पॉलिटिक्स के साथ सनातन की सियासी केमिस्ट्री बनाने में जुटे हैं. बीजेपी के इस पारंपरिक कोर एजेंडे पर अब सपा और कांग्रेस भी पूरी ताकत से दांव खेल रही हैं. अखिलेश यादव का इटावा में भव्य ‘केदारेश्वर महादेव मंदिर’ का निर्माण करवाना हो या शंकराचार्य से मुलाकात. सिर्फ यही नहीं कांग्रेस नेताओं का खुद को बीजेपी से बड़ा रामभक्त और सनातनी साबित करना सबकुछ सनातन के इर्द गिर्द ही घूम रहा है।
दरअसल, 2014 के बाद से उत्तर प्रदेश का राजनीति पैटर्न बदल गया है. देश और प्रदेश में अब बहुसंख्यक समाज केंद्रित राजनीति हो गई है और इस फॉर्मूला के जरिए ही बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है. यूपी में सिर्फ मुस्लिम वोटों के सहारे सरकार नहीं बनाई जा सकती है. इसीलिए सपा और कांग्रेस दोनों दल का उद्देश्य सनातन के पिच पर उतरकर बीजेपी को मात देने का है. सपा और कांग्रेस यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उन पर ‘एंटी-हिंदू’ या ‘तुष्टीकरण’ का ठप्पा लग गया, तो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण फिर से बीजेपी के पक्ष में हो जाएगा. इसलिए, वे खुद को बीजेपी से बड़ा और सच्चा सनातनी दिखा रहे हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात
आपको बता दे की अखिलेश यादव केदारनाथ की तर्ज पर इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर बनवा रहे हैं, जिसका उद्घाटन सावन शिवरात्रि पर होने की उम्मीद है. इसके अलावा अखिलेश यादव ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से चार महीने में दो बार मुलाकात की हैं. पिछले दिनों अखिलेश के परिवार ने काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना और दर्शन किए. राम मंदिर में चंदा चोरी के मुद्दो को आक्रामक तेवर से अपना रखा है. इसी तरह से कांग्रेस की कमान यूपी में संभाल रहे अजय राय भी हिंदुत्व के पिच पर खड़े नजर आ रहे हैं. कांग्रेस और सपा के नेता अब यह नैरेटिव सेट करने में जुटे हैं कि बीजेपी ने भगवान राम और सनातन का राजनीतिकरण किया है, जबकि हम भगवान के सच्चे भक्त हैं।
बीजेपी का जवाब और हार्ड बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व
वही वहीं सीएम योगी और बीजेपी के शीर्ष नेता हर मंच से याद दिला रहे हैं कि कैसे पिछली सरकारों में हिंदू त्योहारों पर बंदिशें लगाई जाती थीं और सपा सरकार में रामभक्तों पर गोलियां चलाई गई थीं. बीजेपी और सीएम योगी खुलकर हिंदुत्व के दांव खेल रहे हैं और खुद को सच्चा सनातनी बताने में जुड़े हैं. इस तरह सनातन के जरिए सपा और कांग्रेस का उद्देस्य हिंदुत्व वोटों को साधने का है, जिसके लिए हार्ड बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व का एजेंडा सेट किए जाने लगा है।
वोट बैंक की राजनीति और PDA फॉर्मूला
दरसअल समाजवादी पार्टी अब केवल मुस्लिम यादव (M-Y) समीकरण के भरोसे नहीं बैठना चाहती. सपा अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का दांव खेलकर बहुसंख्यक हिंदू आबादी को साधने की कयावद है. सपा यह बताने में जुटी है कि वो किसी एक मजहब की पार्टी नहीं है, बल्कि उसके नेता भी शिवभक्त और सनातनी हैं. वहीं कांग्रेस भी अपने नेताओं के मंदिर दौरों के जरिए यही नैरेटिव सेट कर रही है।
आपको बता दे की उत्तर प्रदेश में लगभग 80 फीसदी आबादी हिंदू है जबकि 20 फीसदी मुस्लिम वोट हैं. राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए इस बड़ी आबादी के एक बड़े हिस्से का समर्थन अनिवार्य है, बीजेपी जहां खुद को सनातन संस्कृति की रक्षक के तौर पर पेश करती है, वहीं कांग्रेस और सपा अब यह साबित करने में जुटे हैं कि वे भी उतने ही आस्थावान हैं. यूपी की राजनीति में ‘सनातनी बनने की यह होड़’ कोई आध्यात्मिक जागृति नहीं, बल्कि विशुद्ध वोट बैंक की इंजीनियरिंग है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उत्तर प्रदेश में अब मुकाबला सिर्फ हिंदुत्व बनाम सेक्युलर राजनीति का नहीं रह गया है। अब लड़ाई इस बात की भी है कि हिंदू मतदाता के बीच भरोसा किसका ज्यादा है। क्या बीजेपी अपने स्थापित हिंदुत्व एजेंडे के दम पर बढ़त बनाए रखेगी? या फिर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपनी नई रणनीति के जरिए उन मतदाताओं तक पहुंच बना पाएंगी, जो धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय और आर्थिक मुद्दों पर भी फैसला करते हैं? आप इस खबर को लेकर क्या सोचते है अपनी राय हमें कमैंट्स में जरूर बताए।



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