परिसीमन बिल पर कहा आ रही अड़चनमोदी सरकार के सामने हैं ये दो ऑप्शन

  • August 5, 2026
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संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर राजनीतिक चर्चा का सांकेतिक चित्र।

Women Reservation Bill News: महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार की तैयारी तेज, क्या विशेष सत्र में बनेगी सहमति?

महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सरकार की तैयारी तेज

लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले महिला आरक्षण कानून और उससे जुड़े परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे पर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। संसद का मानसून सत्र अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और इसी बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि केंद्र सरकार इन महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए विशेष सत्र बुला सकती है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस विषय पर चर्चाएं लगातार जारी हैं।

दरअसल, संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था। शुरुआत में यह माना जा रहा था कि सरकार इसी सत्र में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयक पेश कर सकती है। लेकिन लगातार हंगामे और विपक्ष के विरोध के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित रही और यह विधेयक अब तक पेश नहीं किए जा सके।

क्या संसद का विशेष सत्र बुलाया जाएगा?

सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार मानसून सत्र समाप्त होने के बाद तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की संभावना पर विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि यदि आवश्यक राजनीतिक समर्थन सुनिश्चित हो जाता है तो सरकार विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है।

हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी तक सरकार की ओर से विशेष सत्र की तारीख या एजेंडा को लेकर कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है। फिलहाल यह चर्चा राजनीतिक और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर सामने आई है।

दो-तिहाई बहुमत सबसे बड़ी चुनौती

महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही संविधान संशोधन से जुड़े विषय हैं। ऐसे में इन विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में आवश्यक संवैधानिक बहुमत की जरूरत होगी।

लोकसभा में वर्तमान प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर संविधान संशोधन के लिए लगभग दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होगा। यही कारण है कि सरकार केवल अपने सहयोगी दलों के समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय अन्य दलों से भी बातचीत करने की कोशिश कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पर्याप्त समर्थन नहीं मिला तो सरकार के लिए इन विधेयकों को पारित कराना आसान नहीं होगा।

विपक्ष से सहमति बनाने की कोशिश

सरकार ने विपक्षी दलों के साथ संवाद बढ़ाने की भी कोशिश शुरू कर दी है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष के नेताओं से बातचीत की है। इस दौरान राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेतृत्व के साथ भी चर्चा होने की खबरें सामने आई हैं।

हालांकि कांग्रेस की ओर से अभी तक इस विषय पर अंतिम रुख सार्वजनिक नहीं किया गया है। विपक्ष के कई दल परिसीमन की प्रक्रिया, राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या आधारित सीटों के पुनर्वितरण को लेकर अपनी अलग-अलग चिंताएं पहले भी जता चुके हैं।

परिसीमन पर क्यों है राजनीतिक मतभेद?

परिसीमन का विषय लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। कई राज्यों का मानना है कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया गया तो कुछ राज्यों के प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है, जबकि अन्य राज्यों को अधिक लाभ मिल सकता है।

इसी कारण दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल पहले भी इस विषय पर अपनी आशंकाएं व्यक्त कर चुके हैं। वहीं कुछ अन्य दलों का कहना है कि महिला आरक्षण लागू करने से पहले परिसीमन की प्रक्रिया और उसके प्रभावों पर व्यापक सहमति बननी चाहिए।

सरकार के सामने कौन-कौन से विकल्प हैं?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार सरकार के सामने फिलहाल दो प्रमुख रास्ते दिखाई देते हैं।

पहला, सरकार संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित कर संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की कोशिश करे।दूसरा, विपक्ष के साथ व्यापक राजनीतिक सहमति बनाकर सर्वसम्मति या व्यापक समर्थन के आधार पर विधेयक को आगे बढ़ाया जाए।

विश्लेषकों का मानना है कि इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव के लिए राजनीतिक सहमति भविष्य में किसी भी विवाद को कम करने में मददगार हो सकती है।

आगे क्या होगा?

महिला आरक्षण और परिसीमन दोनों ही भारत की चुनावी व्यवस्था और प्रतिनिधित्व से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण विषय हैं। इसलिए इन पर होने वाला कोई भी फैसला दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

फिलहाल सरकार की ओर से विशेष सत्र बुलाने या विधेयक पेश करने को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार किया जा रहा है। दूसरी ओर विपक्ष भी अपने राजनीतिक रुख को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल होती है या फिर इन महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ती है।