मुशायरों से संसद तक पहुंची इमरान प्रतापगढ़ी की आवाज
जो कभी मोहब्बत की बात करते हैं और कभी सियासत पर सवाल उठाते हैं। मंच पर शेर पढ़ते हुए हजारों की भीड़ को बांध लेना और संसद में उसी भाषा की धार से सरकार पर हमला करना—ये कहानी है उस शायर और नेता की, जिसके अल्फाज़ पहले मुशायरों में गूंजे और फिर संसद के गलियारों तक पहुंच गए।
हम बात कर रहे हैं कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी की।
प्रतापगढ़ी ने मुशायरों से अपनी पहचान बनाई। उनकी नज़्मों में मदरसा, फिलिस्तीन, कश्मीर, जेएनयू छात्र नजीब अहमद और मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दे दिखाई दिए। उन्होंने खुद यह रुख अपनाया कि शायरी सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना का मंच भी हो सकती है। यहीं से उनकी ताकत और उनकी आलोचना—दोनों की शुरुआत होती है।
अतीक अहमद के परिवार को लेकर क्यों घिरी चुप्पी?
दरसअल शायरी के जरिए सियासत में कदम रखने वाले कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं। एक समय था जब वह अतीक अहमद की शान में कसीदा पढ़ा करते थे। अब जब अतीक के परिवार पर संकट आया और उनके बेटे अबान अहमद की सड़क हादसे में मौत हुई, तो इमरान प्रतापगढ़ी की कथित चुप्पी पर सवाल खड़े होने लगे।
अबान अहमद की मौत पर इमरान प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया पर कोई ट्वीट कर दुख जाहिर नहीं किया और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य से संवेदना प्रकट की। इसी वजह से सोशल मीडिया पर उनकी चुप्पी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
अतीक अहमद से पुराने रिश्ते पर बीजेपी का हमला
दरसल 6 अगस्त 1987 को जन्मे इमरान प्रतापगढ़ी का नाम कांग्रेस ने अपने स्टार प्रचारकों में रखा तो उनसे जुड़े पुराने मुद्दे भी सामने आने लगे।
अतीक अहमद से उनके पुराने संबंधों को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर हमला किया था। कर्नाटक में भाजपा नेता शोभा करंदलाजे ने इमरान प्रतापगढ़ी के एक पुराने वीडियो के सहारे कांग्रेस पर सवाल उठाए थे। वीडियो में इमरान प्रतापगढ़ी अतीक अहमद के पक्ष में सम्मानजनक शब्द बोलते हुए दिखाई दिए थे। बीजेपी ने सवाल उठाया था कि ऐसे विवादित लोगों के पक्ष में बोलने वाले व्यक्ति को कांग्रेस अपना स्टार प्रचारक बनाकर क्या संदेश देना चाहती है।
हालांकि इमरान प्रतापगढ़ी ने अतीक अहमद से अपने रिश्तों को लेकर सफाई दी थी। उनका कहना था कि यह एक सामान्य घटना थी। अतीक वहां मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद थे और मंच पर उनकी तारीफ में बोलना माहौल बनाने का एक तरीका था। उन्होंने यह भी कहा था कि राजनीति का अपराधीकरण अलग विषय है और वह एक शायर हैं, इसलिए उनका कई तरह के लोगों से सामना होता रहता है।
इमरान प्रतापगढ़ी की राजनीतिक पहचान
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इमरान प्रतापगढ़ी कांग्रेस के बड़े मुस्लिम चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में किसी विवादित आपराधिक पृष्ठभूमि वाले परिवार के समर्थन में खुलकर सामने आना उनकी राजनीतिक छवि के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
इसी राजनीतिक नफे-नुकसान के बीच उनकी चुप्पी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, यह कहना कि उनकी चुप्पी का कारण केवल राजनीतिक रणनीति है, एक अनुमान होगा। इसके पीछे उनका वास्तविक कारण क्या है, यह उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया है।
प्रतापगढ़ से निकले इमरान की कहानी
दरसअल इमरान उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले हैं। उनका पूरा नाम मोहम्मद इमरान खान है। वह अपने जिले प्रतापगढ़ के नाम को तखल्लुस की तरह इस्तेमाल करते हैं। एक दौर में उन्होंने मुशायरों के जरिए अपनी पहचान बनाई। कहा जाता है कि उनकी शायरी में मोहब्बत के साथ-साथ सियासी मुद्दों की झलक भी दिखाई देती रही है।
इमरान ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हिंदी की पढ़ाई की है। हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में उनकी पकड़ बताई जाती है। उनके पिता मोहम्मद इलयास खान पेशे से डॉक्टर हैं।
इमरान को बचपन से ही शायरी का शौक था। उन्होंने पांचवीं क्लास से शेर-ओ-शायरी और कविता लिखना शुरू कर दिया था। उनकी मदरसा, फिलिस्तीन, ‘हम मुसलमान हैं’ और नजीब पर लिखी गई नज़्में चर्चित रही हैं। वह मुसलमानों की तालीम की वकालत करते हैं और मुसलमानों के अधिकारों तथा राजनीतिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट सोच रखते हैं। एक दौर में उन्होंने अन्ना हजारे के खिलाफ भी नज़्में पढ़ी थीं।
मुशायरों से कांग्रेस तक कैसे पहुंचे?
इमरान प्रतापगढ़ी ने साल 2019 में मुरादाबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था। हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद 3 जून 2021 को उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जुलाई 2022 में वह महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद बने और कांग्रेस के युवा चेहरों में शामिल हो गए। राज्यसभा में भी इमरान प्रतापगढ़ी ने कई मौकों पर अपनी बेबाक और भावनात्मक शैली से चर्चा बटोरी।
वक्फ बिल के विरोध से सुप्रीम कोर्ट तक
अप्रैल 2025 में उन्होंने वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए संसद के बाहर काले कपड़ों में प्रदर्शन किया और “Reject Waqf Bill” का बोर्ड पकड़े खड़े रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी इस बिल के खिलाफ याचिका दायर की थी। इससे यह सामने आया कि वह केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि कानूनी स्तर पर भी मुद्दों को उठाते रहे हैं।
राहुल गांधी से मुलाकात ने बदली सियासी दिशा
एक कार्यक्रम में इमरान प्रतापगढ़ी ने बताया था कि वह कांग्रेस से कैसे जुड़े।
उनके मुताबिक, साल 2018 में उनकी राहुल गांधी से मुलाकात हुई थी। मुलाकात आधे घंटे के लिए तय हुई थी, लेकिन बातचीत करीब डेढ़ घंटे तक चली। इस दौरान शायरी, सियासत और देश से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। इमरान ने बताया था कि राहुल गांधी की सादगी और उनके विजन ने उन्हें प्रभावित किया। इसके बाद प्रियंका गांधी की मौजूदगी ने भी उन्हें प्रभावित किया।
कविता पर FIR और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
दरसअल जनवरी 2025 में गुजरात पुलिस ने इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ एक वीडियो पोस्ट करने पर FIR दर्ज की थी। इसमें ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो…’ कविता का इस्तेमाल किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले उनके खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाई। बाद में मार्च 2025 में अदालत ने FIR रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि कविता और कलात्मक अभिव्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के घृणा फैलाने वाला भाषण नहीं माना जा सकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
शायरी और सियासत के बीच इमरान की राजनीति
इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी और राजनीतिक गतिविधियों में सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यकों के अधिकार और बहुलता की रक्षा जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। 2017 में उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर “लहू बोल रहा है” नाम से रक्तदान शिविर आयोजित किया था। इसे लिंचिंग की घटनाओं के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर देखा गया।
वह मंचों से लेकर संसद तक इन मुद्दों को उठाते रहे हैं। उनकी ताकत उनकी युवा अपील, साहित्यिक पृष्ठभूमि और अल्पसंख्यक राजनीति में उनकी भूमिका में मानी जाती है। वहीं उनकी आलोचना भी होती रही है। कुछ लोग उन्हें पहचान आधारित राजनीति का चेहरा मानते हैं, जबकि उनके समर्थक उन्हें बहुलवादी आवाज के रूप में देखते हैं।
आगे की राजनीति में कितनी बड़ी भूमिका?
प्रतापगढ़ से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने वाले इमरान प्रतापगढ़ी ने साहित्य और राजनीति का जो संगम बनाया है, वह उन्हें अलग पहचान देता है। अब उनके सामने चुनौती यह है कि इस पहचान को जमीन पर मतदाताओं और समाज के बीच कितना मजबूत किया जा सकता है। अल्पसंख्यक राजनीति और संसद में उनकी सक्रियता उन्हें कांग्रेस की अगली पीढ़ी के प्रभावशाली नेताओं में जगह दिला सकती है।
यदि वह अल्पसंख्यक मुद्दों के साथ युवाओं, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर भी अपनी सक्रियता बढ़ाते हैं, तो उनका राजनीतिक प्रभाव और बढ़ सकता है।
इमरान प्रतापगढ़ी को केवल “कांग्रेस के मुस्लिम चेहरे” या “विवादित शायर” के रूप में देखना उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। उनकी कहानी उस दौर की राजनीति को भी दिखाती है, जहां कविता, पहचान, सोशल मीडिया और चुनावी राजनीति एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं।


