NDA में चिराग पासवान की अलग सियासत, ज्ञानेश कुमार से लेकर बिहार तक क्यों चर्चा?

  • September 25, 2026
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NDA के भीतर चिराग पासवान की अलग राजनीतिक भूमिका

NDA में रहते हुए चिराग पासवान की अलग राजनीतिक लाइन

NDA के भीतर चिराग पासवान की सियासत इन दिनों एक अलग ही अंदाज़ में दिखाई दे रही है। कभी बिहार के लॉ एंड ऑर्डर पर अपनी ही सरकार को घेरना, कभी आरक्षण के मुद्दे पर NDA के ही सहयोगी जीतन राम मांझी से सीधा टकराव और अब चुनाव आयोग को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से सार्वजनिक तौर पर जवाब मांगना, इन घटनाओं ने उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ा दी है।

एनडीए का हिस्सा रहते हुए चिराग शराबबंदी, बिहार के लॉ एंड ऑर्डर और अपनी पार्टी के मंत्री संजय सिंह से जुड़े विवाद जैसे मुद्दों पर अपनी अलग राय रखते रहे हैं। अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर उनके बयान ने फिर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष जहां ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है, वहीं चिराग ने इस्तीफे का समर्थन नहीं किया, लेकिन चुनाव आयोग से अपनी स्थिति जनता के सामने मजबूती से रखने को कहा।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चिराग एनडीए के भीतर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बनाए रखने के लिए लगातार प्रेशर बिल्डअप पॉलिटिक्स कर रहे हैं? या फिर NDA के भीतर अपनी राजनीतिक bargaining power बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति?

ज्ञानेश कुमार पर चिराग ने क्या कहा?

दरअसल, एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री और बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन के अहम घटक दल के नेता चिराग पासवान पिछले कुछ समय से कई ऐसे मुद्दों पर अपनी अलग राय रखते दिखे हैं, जिन पर आमतौर पर सत्ता पक्ष एकजुट नजर आता है। शराबबंदी से लेकर लॉ एंड ऑर्डर, अपनी ही पार्टी के मंत्री पर लगे आरोप और अब चुनाव आयोग की विश्वसनीयता तक उनके बयानों में एक बात समान दिखती है—गठबंधन के साथ रहते हुए भी अलग-अलग मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक लाइन।

ताजा मामला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़ा है। जहां राहुल गांधी समेत विपक्ष की ओर से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच चिराग ने इस्तीफे की मांग का समर्थन नहीं किया। लेकिन उन्होंने चुनाव आयोग को अपनी स्थिति मजबूती से जनता के सामने रखने की सलाह जरूर दी। उनका कहना था कि अगर चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं तो आयोग की जिम्मेदारी है कि वह अपना पक्ष स्पष्ट करे, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा होना ठीक नहीं है। यानी चिराग पासवान ने विपक्ष की लाइन नहीं पकड़ी, लेकिन चुनाव आयोग का बचाव करने तक खुद को सीमित भी नहीं रखा। उन्होंने मुद्दे को जनता के भरोसे और संस्थागत जवाबदेही से जोड़ दिया।

लॉ एंड ऑर्डर और शराबबंदी पर भी सरकार से सवाल

वहीं बिहार में कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी चिराग समय-समय पर सरकार और प्रशासन से जवाबदेही की मांग करते रहे हैं। जमुई, समस्तीपुर कांड समेत विभिन्न घटनाओं पर उनकी प्रतिक्रियाओं में यह रुख दिखाई दिया। यहां उनकी राजनीतिक स्थिति अहम हो जाती है। विपक्ष का यही सवाल सरकार विरोधी हमला माना जा सकता है, लेकिन एनडीए के सहयोगी की ओर से उठने पर सरकार के लिए उसका जवाब देना जरूरी हो जाता है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिराग पासवान बार-बार अपनी सरकार को बेहतर पुलिसिंग का सुझाव देते रहे हैं।

बिहार की शराबबंदी नीति पर चिराग कई बार समीक्षा की जरूरत बता चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि करीब एक दशक बाद यह देखना जरूरी है कि कानून अपने मूल उद्देश्य में कितना सफल रहा और अवैध व जहरीली शराब की समस्या पर इसका क्या असर पड़ा। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चिराग एनडीए का हिस्सा है और शराबबंदी बिहार सरकार की प्रमुख नीतियों में रही है। ऐसे में उनकी मांग विपक्षी आलोचना के बजाय गठबंधन के भीतर से आई नीतिगत संबंधी असहमति के रूप में सामने आती है।

अपनी ही पार्टी के मंत्री के मामले में भी अपनाया अलग रुख

दरअसल, चिराग पासवान की इस शैली का उदाहरण अपनी ही पार्टी के नेता और बिहार सरकार में मंत्री संजय सिंह से जुड़ा विवाद भी है। संजय सिंह पर छेड़खानी के आरोप लगाए जाने के बाद चिराग ने तत्काल बचाव की जगह जवाब और जांच की बात की। उनका कहना था कि अगर आरोप सही है तो यह गलत है और पार्टी उनसे जवाब मांगेगी। यानी उन्होंने आरोपों को न तो सच मान लिया और न ही उन्हें खारिज कर दिया। उनकी सार्वजनिक लाइन थी—जांच होनी चाहिए और दोषी होने पर कार्रवाई भी हो। हालांकि संजय सिंह ने आरोपों को खारिज कर दिया था।

चिराग की चुनौती यही है कि उन्हें एनडीए के साथ भी रहना है और अपनी पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान भी बनाए रखनी है। ऐसे में हर मुद्दे पर सरकार की आधिकारिक लाइन दोहराना उनके लिए राजनीतिक रूप से पर्याप्त नहीं हो सकता। उनके बयानों में यही संतुलन दिखता है—गठबंधन के खिलाफ सीधा मोर्चा नहीं, लेकिन हर मुद्दे पर चुप्पी भी नहीं।

क्या चिराग की राजनीति को प्रेशर पॉलिटिक्स कहा जा सकता है?

इसे सीधे प्रेशर पॉलिटिक्स कहना चिराग की मंशा पर निष्कर्ष होगा, लेकिन उनके बयानों को एक साथ रखें तो एक पैटर्न जरूर सामने आता है। शराबबंदी पर समीक्षा, लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल, अपनी पार्टी के मंत्री के मामले में जवाबदेही और अब चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण की मांग—अलग-अलग मुद्दों पर उनका जोर जवाबदेही और जनता के भरोसे पर रहा है। यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार पर उनका ताजा बयान एनडीए के भीतर उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ाता है। वह गठबंधन में हैं, लेकिन अपनी राजनीतिक आवाज को गठबंधन की सामूहिक आवाज में पूरी तरह मिलाते हुए नहीं दिखते।

NDA से बाहर नहीं, लेकिन स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस की कोशिश?

इस रणनीति का एक दूसरा पहलू भी है। चिराग पासवान की पार्टी अब सिर्फ बिहार तक अपनी राजनीतिक मौजूदगी सीमित नहीं रखना चाहती। सितंबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक LJP(R) उत्तर प्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों में NDA के साथ सीट शेयरिंग के जरिए उतरने की तैयारी कर रही है। यानी एक तरफ गठबंधन में बने रहना, दूसरी तरफ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करना और तीसरी तरफ सीट बंटवारे और भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए अपनी उपयोगिता दिखाना। यही वह जगह है जहां चिराग की सार्वजनिक बयानबाजी को सिर्फ बयानबाजी के बजाय bargaining politics के नजरिए से भी देखा जा सकता है।