कभी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी माने गए RCP और मनीष वर्मा, फिर क्यों खत्म हुई सियासी कहानी?

  • September 24, 2026
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RCP सिंह और मनीष वर्मा के साथ नीतीश कुमार की राजनीतिक उत्तराधिकार की चर्चा

नीतीश के दो खास सिपहसालारों की बदली सियासी कहानी

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति में कभी दो IAS अधिकारियों का नाम बेहद खास माना गया—RCP सिंह और मनीष वर्मा। एक ने नीतीश के साथ प्रशासनिक गलियारों से राजनीति तक का सफर तय किया, पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना, केंद्र में मंत्री बना… लेकिन फिर रिश्ते ऐसे बिगड़े कि रास्ते अलग हो गए। दूसरे मनीष वर्मा हैं, जिन्हें कभी नीतीश के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर देखा गया। IAS की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए, JDU में शामिल हुए और संगठन में अहम जिम्मेदारी संभाली। लेकिन सवाल ये है कि आखिर दोनों की सियासत इतनी अलग दिशा में कैसे चली गई? और जिस कुर्सी के उत्तराधिकारी की चर्चा कभी इन दोनों के नाम से होती थी, अब उस कहानी में नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की एंट्री ने क्या बदल दिया?

हालाँकि आरसीपी सिंह बार-बार संकेत देते रहे हैं कि जेडीयू उनका घर है और वे वापस आना चाहते हैं. नीतीश को अभिभावक बताते हुए उन्होंने रिश्ते की मजबूती का दावा भी किया, पर, पार्टी के अंदर विरोध इतना मजबूत है कि उनकी वापसी लगभग असंभव लगती है. सियासी गलियारों में उनकी चर्चा अब सिर्फ अटकलों तक सीमित रह गई है. ठीक इसके उलट मनीष वर्मा ने चुप्पी साथ ली है. वे सार्वजनिक रूप से बयानबाजी से दूर रहते हैं।

नीतीश कुमार की राजनीति और उनके दो भरोसेमंद चेहरे

दरसल बिहार में 20 वर्षों तक सीएम रहे नीतीश कुमार में 2 करिश्माई गुण रहे हैं. वह बड़े मायावी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं. मायावी ऐसा कि किसी को आसानी से पटा लेना और बड़े त्याग के लिए तैयार करा लेना उनके बाएं हाथ का खेल रहा है. उनका दूसरा करिश्माई गुण यह कि उनके मन की बात समझ पाना किसी के लिए कभी आसान नहीं रहा. दिन-रात साथ रहने वाले भी उनके मन को भांप नहीं पाते.

इन 2 गुणों के अलावा भी उनमें कई और गुण भी रहे हैं. राजनीति के खेल में वे राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद जैसे धुरंधर को आसानी से चकमा चकमा देते रहे तो भाजपा को भी उन्होंने अपने लंबे मुख्यमंत्री काल में हमेशा दोयम दर्जे की औकात से कभी आगे बढ़ने नहीं दिया. अब तो वे थक चुके हैं. उम्र बढ़ती जा रही है और सेहत भी साथ नहीं दे रहा. फिर भी उनसे सहयोगी और विरोधी दोनों भय खाते हैं. बहरहाल, यहां हम बात करेंगे उनके 2 सिपहसालारों की, जिन्हें उन्होंने बड़े त्याग के लिए न सिर्फ पटाया, बल्कि उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनने का सपना भी दिखाया. पर दोनों इस वक़्त राजनीति के बियावान में भटक रहे हैं।

RCP सिंह और मनीष वर्मा की JDU में खास भूमिका

दरसल जनता दल यूनाइटेड में नीतीश कुमार के सबसे करीबी माने जाते रहे 2 पूर्व आईएएस अधिकारी आरसीपी सिंह और मनीष वर्मा की भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है. दोनों ने सिविल सेवा की नौकरी छोड़ कर राजनीति में कदम रखा, चूंकि दोनों को नीतीश कुमार ही राजनीति में लेकर आए, इसलिए वे उनके भरोसेमंद माने गए. पर, 2026 में सियासी समीकरण बदलने और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद इन दोनों की स्थिति बदल गई है. आरसीपी सिंह तो अब जेडीयू से बाहर ही हो चुके हैं, जबकि मनीष वर्मा संगठनात्मक भूमिका में तो है, लेकिन पार्टी के बड़े सियासी फैसलों से वे दूर ही नजर आते हैं.

पार्टी पर मजबूत पकड़ कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने बना रखी है. संजय झा की पकड़ का आलम यह है कि उन्होंने जेडीयू का नाम अब जनता दल नीतीश रखने का प्रस्ताव रख दिया है. मनीष वर्मा की कोई राय अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा और राज्य सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने संजय झा के प्रस्ताव की तस्दीक कर दी है।

RCP सिंह की नीतीश कुमार से नजदीकी कैसे बढ़ी?

दरसल कहानी शुरू होती है नीतीश कुमार और RCP सिंह की उस नजदीकी से, जो पहले सरकारी फाइलों और प्रशासनिक फैसलों के बीच बनी। RCP सिंह 1984 बैच के IAS अधिकारी थे। नीतीश जब केंद्र में रेल मंत्री थे, तब दोनों के बीच संपर्क हुआ। नीतीश के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद RCP सिंह भी बिहार आए और आगे चलकर उनके प्रधान सचिव बने। धीरे-धीरे RCP सिंह सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी नहीं रहे… बल्कि JDU के संगठन में भी उनकी भूमिका बढ़ती गई। 2010 में उन्होंने IAS से VRS लिया और JDU के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद पार्टी संगठन में उनकी पकड़ मजबूत होती गई।

2020 में RCP सिंह JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उस समय राजनीतिक हलकों में ये सवाल भी उठा कि क्या नीतीश कुमार ने अपने संभावित उत्तराधिकारी की तरफ इशारा कर दिया है? क्योंकि RCP सिंह और नीतीश के बीच कई समानताएं थीं—दोनों नालंदा से जुड़े, दोनों कुर्मी समुदाय से आते थे और RCP सिंह लंबे समय तक नीतीश के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में रहे।

केंद्र में मंत्री बनने के बाद RCP सिंह और नीतीश के रिश्तों में दरार

2021 में RCP सिंह केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बने। लेकिन उनके मंत्री बनने के तरीके और BJP से बढ़ती नजदीकी को लेकर JDU के भीतर सवाल उठने लगे। 2022 में JDU ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजने का फैसला नहीं किया। इसके बाद RCP सिंह और नीतीश के रिश्तों में दरार खुलकर सामने आई। RCP सिंह ने JDU छोड़ दिया। बाद में 2023 में उन्होंने BJP का दामन थामा। यानी जिस नेता को कभी नीतीश के सबसे करीबी लोगों में गिना जाता था, वही नेता कुछ साल बाद नीतीश की राजनीति पर सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाता नजर आया।

लेकिन RCP सिंह की राजनीतिक कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 2024 में उन्होंने अपनी पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ बनाई और 2025 में इसे प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में मिला दिया। दिलचस्प बात ये है कि कभी JDU के भीतर RCP सिंह और प्रशांत किशोर के बीच राजनीतिक खींचतान की चर्चा होती थी। वक्त बदला तो दोनों एक ही राजनीतिक मंच पर आ गए।

मनीष वर्मा को भी उत्तराधिकारी के तौर पर देखा गया

आरसीपी सिंह की तरह ही मनीष वर्मा को भी नीतीश कुमार ने समय से पहले इस्तीफा दिला कर जेडीयू से जोड़ा, वे भी नीतीश के स्वजातीय और नालंदा के रहने वाले है. वे 2000 बैच के ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी थे. उन्होंने बिहार में कई महत्वपूर्ण पद संभाले. बाद में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव सह अतिरिक्त सलाहकार बने.

नीतीश के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम सात निश्चय में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही. 2021 के आसपास VRS लेकर उन्होंने नीतीश कुमार के कहने पर जेडीयू ज्वाइन की. उन्हें नीतीश ने जेडीयू का राष्ट्रीय महासचिव बनाया, आरसीपी सिंह की तरह ही उनके बारे में भी यह चर्चा होने लगी कि नीतीश के वे ही उत्तराधिकारी होंगे, पार्टी में उनकी सक्रियता भी बढ़ी. उन्हें जिलों का दौरा कर जेडीयू को मजबूत करने का दायित्व नीतीश ने सौंपा. कई जिलों में वे गए भी गए भी. 2026 में वे मुजफ्फरपुर, सारण समेत कई जिलों में संपर्क अभियान चला रहे थे. प्रखंड स्तर पर कार्यकर्ताओं से मिल कर पार्टी को बूथ तक मजबूत करने का संदेश दे रहे थे.

अचानक फील्ड से वापस बुलाए गए मनीष वर्मा

फिर अचानक उन्हें दौरा रोक कर फील्ड से वापस बुला लिया गया, तब से उनकी कोई चर्चा नहीं होती. राज्यसभा चुनाव और एमएलसी चुनाव में उन्हें उतारने की कभी कभार चर्चा हुई भी, लेकिन उनकी जगह दूसरों को मौका मिल गया. अब तो राजनीतिक गलियारे में वे गुमनाम हो गए हैं। फिलहाल आरसीपी सिंह बार-बार संकेत देते रहे हैं कि जेडीयू उनका घर है और वे वापस आना चाहते हैं. नीतीश को अभिभावक बताते हुए उन्होंने रिश्ते की मजबूती का दावा भी किया. पर पार्टी के अंदर विरोध इतना मजबूत है कि उनकी वापसी लगभग असंभव लगती है. सियासी गलियारों में उनकी चर्चा अब सिर्फ अटकलों तक सीमित रह गई है.

ठीक इसके उलट मनीष वर्मा ने चुप्पी साध ली है. वे सार्वजनिक रूप से बयानबाजी से दूर रहते हैं. वे संगठन के काम में व्यस्त दिखते हैं, लेकिन नीतीश कुमार या निशांत कुमार के आसपास की बड़ी राजनीतिक चर्चाओं में उनकी भूमिक कम नजर आती है. मौन साध कर वे अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। नीतीश कुमार के चहेते रहे दोनो पूर्व आईएएस अधिकारी अब सियासी केंद्र से दूर हैं. आरसीपी सिंह पूरी तरह किनारे हो चुके हैं, जबकि मनीष वर्मा संगठनात्मक भूमिका में सक्रिय होने के बावजूद बड़े फैसलों से दूर है. जेडीयू अब निशांत कुमार और अन्य नेताओं के इर्द-गिर्द नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है.

JDU में नई पीढ़ी और निशांत कुमार की एंट्री

पुराने भरोसेमंद चेहरों की जरूरत अब उतनी नहीं रह गई है. जितनी कभी हुआ करती थी. यह बदलाव पार्टी के अंदर सत्ता और प्रभाव के नए समीकरण को दर्शाता है। अब सवाल RCP सिंह या मनीष वर्मा से ज्यादा उस बड़े बदलाव का है, जो JDU की अगली पीढ़ी को लेकर हो रहा है. कभी चर्चा थी—नीतीश के बाद कौन? आज उस सवाल में एक नया नाम मजबूती से जुड़ चुका है—निशांत कुमार. और यही बदलाव बताता है कि बिहार की राजनीति में उत्तराधिकार की कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है…बल्कि उसका अगला अध्याय लिखा जा रहा है।