रूसी तेल पर ब्रेक लगाएगा भारत? नवंबर की खरीद पर नजर, अमेरिका के 100% टैरिफ का असर

  • September 23, 2026
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रूस से तेल खरीद पर भारत की नई रणनीति

नवंबर में खरीद घटाने पर विचार

भारत के लिए रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की शक्ति देने वाला नया कानून लागू होने के बाद भारतीय तेल रिफाइनरियां नवंबर में मिलने वाले कच्चे तेल की खरीद घटाने पर विचार कर रही हैं। रूसी तेल की खरीद में कितनी कटौती होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक भारत निकट अवधि में रूस से होने वाले कच्चे तेल के आयात को कुल आयात के करीब 20 से 30 फीसदी तक सीमित कर सकता है। हालांकि यह अभी संभावित रणनीति है और अंतिम फैसला सरकार तथा तेल कंपनियों के बीच होने वाली बातचीत और आगे की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

भारत के लिए रूस से आने वाले तेल की मात्रा काफी बड़ी रही है। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार सितंबर में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात औसतन करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। यह भारत के कुल तेल आयात का 35 फीसदी से अधिक है। अप्रैल के बाद यह सबसे निचला स्तर रहने की संभावना बताई गई है। ऐसे में अचानक बड़ी मात्रा में आपूर्ति को दूसरे स्रोतों से पूरा करना आसान नहीं होगा।

दूसरे देशों से तेल खरीदने के विकल्प तलाश रहीं रिफाइनरियां

ब्लूमबर्ग के मुताबिक भारत की प्रमुख रिफाइनिंग कंपनियां पिछले कुछ दिनों में रूस के बजाय दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प तलाशने लगी हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि रूस से तेल खरीद में कितनी कटौती होगी। भारत इस बात का भी अध्ययन कर रहा है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर लगाए जा सकने वाले अमेरिकी टैरिफ के ब्यौरे को किस तरह लागू किया जा सकता है।

भारत हाल के महीनों में अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा रूस से खरीदता रहा है। इसका एक प्रमुख कारण रूस से मिलने वाला अपेक्षाकृत सस्ता तेल और पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति में बनी रुकावटें हैं। लेकिन अगर रूसी तेल की खरीद घटाई जाती है तो भारत के सामने वैकल्पिक आपूर्ति का इंतजाम करना बड़ी चुनौती होगी। रूस से भारत का आयात पहले ही कुछ कम हुआ है। केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात औसतन करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। यह कुल तेल आयात का 35 फीसदी से अधिक है और अप्रैल के बाद सबसे निचले स्तर पर होगा।

अमेरिका के टैरिफ और चीन पर नजर

भारत अमेरिका के साथ भी बातचीत जारी रखेगा। भारत यह देख रहा है कि अमेरिका रूस के दूसरे बड़े तेल खरीदारों, खासकर चीन, पर इन नए प्रावधानों को किस तरह लागू करता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापक प्रतिबंध और टैरिफ वाला विधेयक पारित किया है।

ऐसे माहौल में भारत के लिए रूस से आने वाले तेल की मात्रा कम करना सिर्फ खरीद का सवाल नहीं है, बल्कि वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित करने से भी जुड़ा है। रूस से आने वाले तेल की मात्रा काफी बड़ी है और अचानक इसे दूसरे स्रोतों से पूरा करना आसान नहीं होगा। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सप्ताह भारत पहुंचने वाले रूसी यूराल्स क्रूड की कीमत करीब 133 डॉलर प्रति बैरल बताई गई, जबकि मिडिल ईस्ट के ग्रेड इससे कई डॉलर महंगे थे। भारतीय तेल कंपनियां लागत और उपलब्धता दोनों को देखते हुए आगे की खरीद रणनीति पर विचार कर रही हैं।

भारत के सामने वैकल्पिक सप्लाई की चुनौती

अगर रूसी तेल की खरीद कम होती है तो भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती वैकल्पिक आपूर्ति की होगी। भारत को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करना पड़ता है। रूस से मिलने वाले तेल की मात्रा अचानक कम होने पर दूसरे स्रोतों से उसी मात्रा में कच्चा तेल हासिल करना आसान नहीं होगा।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची हैं। ऐसे में वैकल्पिक स्रोतों से अधिक मात्रा में तेल खरीदने पर भारतीय रिफाइनरियों की लागत बढ़ सकती है। भारत अमेरिका के साथ बातचीत के अलावा चीन समेत दूसरे बड़े खरीदारों पर नए अमेरिकी प्रावधानों के असर का भी अध्ययन कर रहा है। इस समय भारत की ओर से रूस से तेल खरीद में अंतिम कटौती का फैसला नहीं हुआ है। नवंबर की खरीद पर नजर बनी हुई है और आगे की बातचीत, अमेरिकी प्रावधानों के अमल तथा बाजार की परिस्थितियों के आधार पर रणनीति तय होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।