2019 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का टिकट कटने के बाद साइडलाइन हुए विनोद तावड़े का बड़ा कमबैक हुआ है। अब बीजेपी ने उन्हें 2027 यूपी चुनाव की कमान सौंपी है।
2019 में टिकट कटा, अब 2027 यूपी चुनाव की कमान
छह साल पहले महाराष्ट्र की सियासत में टिकट कटने के बाद हाशिए पर पहुंचे विनोद तावड़े आज बीजेपी के उन नेताओं में हैं, जिन्हें पार्टी ने देश के सबसे अहम राजनीतिक राज्य उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी है। ABVP के कार्यकर्ता से शुरू हुआ सफर, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बनने तक पहुंचा। फिर 2019 में सियासी झटका लगा और उसके बाद दिल्ली में संगठन की ताकत बनकर तावड़े ने अपनी अलग पहचान बनाई।
बिहार में चुनावी रणनीति की सफलता के बाद अब तावड़े के सामने 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है। पार्टी ने उन्हें यूपी का प्रभारी बनाया है और अब उनके सामने संगठन को मजबूत करने के साथ आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार करने की बड़ी चुनौती है।
टिकट कटने के बाद खत्म माना जा रहा था राजनीतिक सफर
कहा जाता है कि भारतीय सियासत में धैर्य, निष्ठा और सांगठनिक क्षमता का कोई मुकाबला नहीं है। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का राजनीतिक सफर इसका उदाहरण माना जा सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में तावड़े एक प्रमुख चेहरा माने जाते थे। सूबे की फडणवीस सरकार में कद्दावर मंत्री रहे तावड़े का जब 2019 के विधानसभा चुनाव में अचानक टिकट काट दिया गया, तब सियासी गलियारों में उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे थे।
लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने के साथ ही उन्होंने जिस तरह से वापसी की, उसने उनकी सांगठनिक क्षमता को सामने रखा। हाशिए पर जाने के बावजूद तावड़े ने बीते कुछ वर्षों में संगठनात्मक जिम्मेदारियों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की। इसी का नतीजा है कि बिहार के बाद अब उन्हें देश के सबसे महत्वपूर्ण सियासी राज्य उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है।
बिहार के बाद अब यूपी की बड़ी जिम्मेदारी
तावड़े के कंधों पर अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी होगी। यूपी प्रभारी का पद पिछले दो सालों से खाली चल रहा था। इससे पहले तावड़े 2022 से बिहार का प्रभार संभाल रहे थे और उससे पहले हरियाणा की कमान भी उनके हाथों में रही थी।
अब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन की जिम्मेदारी मिलना बीजेपी में उनके बढ़ते कद का संकेत माना जा रहा है। महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति से बाहर होने के कुछ साल बाद राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका हासिल करना उनके राजनीतिक सफर का बड़ा मोड़ है।
ABVP से शुरू हुआ था विनोद तावड़े का राजनीतिक सफर
महाराष्ट्र की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाले विनोद तावड़े का जन्म 20 जुलाई 1963 को मुंबई के गिरगांव इलाके में एक मराठी परिवार में हुआ था। उन्होंने साठे कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। इसी दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP से की।
तावड़े बचपन से ही RSS से जुड़े रहे। ABVP के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए उन्होंने जमीनी स्तर पर युवाओं को जोड़ने की कला सीखी। बीजेपी के प्रमोद महाजन और नितिन गडकरी के मार्गदर्शन में उन्होंने राजनीति के दांव-पेच सीखे और गोपीनाथ मुंडे के साथ मिलकर पार्टी के जनाधार को विस्तार देने में भी भूमिका निभाई।
ABVP में राष्ट्रीय महासचिव बने, फिर महाराष्ट्र बीजेपी में बढ़ा कद
साल 1980 में तावड़े ने ABVP के लिए सक्रिय रूप से काम शुरू किया और 1988 में इसके राष्ट्रीय महासचिव बने। इस दौरान उन्होंने कई छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया और एक संघर्षशील युवा नेता के रूप में पहचान बनाई।
1990 के दशक में उन्हें महाराष्ट्र बीजेपी में सांगठनिक जिम्मेदारियां सौंपी गईं। 1995 में वे राज्य महासचिव नियुक्त किए गए। इसके बाद 1999 में उन्हें मुंबई बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया, जहां वे इस पद पर आसीन होने वाले सबसे कम उम्र के नेताओं में शामिल रहे। साल 2002 में पार्टी ने उन्हें महाराष्ट्र विधान परिषद का सदस्य बनाया। इसके बाद 2011 में वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बने और विपक्ष की भूमिका निभाई।
2014 में विधायक बने, फडणवीस सरकार में मंत्री
साल 2014 में बीजेपी ने तावड़े को बोरीवली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा। यहां से जीत दर्ज कर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे। महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद उन्हें स्कूली शिक्षा, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा और संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी गई। इस दौर में तावड़े महाराष्ट्र बीजेपी के प्रमुख नेताओं में गिने जाने लगे। लेकिन सत्ता के केंद्र में पहुंचने के कुछ ही वर्षों बाद उनके राजनीतिक सफर में बड़ा झटका आया।
2019 में टिकट कटा और सियासी करियर पर उठे सवाल
साल 2014 से 2019 तक सत्ता के केंद्र में रहने वाले विनोद तावड़े के लिए 2019 का विधानसभा चुनाव बड़ा झटका लेकर आया। बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया और इसके बाद राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। राजनीति के जानकारों ने इसे तावड़े के राजनीतिक अवसान के तौर पर भी देखा। लेकिन तावड़े ने सार्वजनिक आलोचना या बयानबाजी का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने संगठन के साथ बने रहने और पार्टी की जिम्मेदारियां निभाने पर जोर दिया।
यही रणनीति आगे उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
महाराष्ट्र से दिल्ली तक कैसे बदला तावड़े का राजनीतिक सफर?
2019 के बाद तावड़े की राजनीति का केंद्र महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति से हटकर संगठन बन गया। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालीं और धीरे-धीरे बीजेपी के शीर्ष संगठन में अपनी जगह मजबूत की। उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे नेता की बनी, जो चुनावी राजनीति से बाहर रहने के बावजूद संगठन के काम में सक्रिय रहा। यही सांगठनिक अनुभव आगे उन्हें अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी मिलने में मदद करता गया।
बिहार में चुनावी रणनीति से मिली बड़ी सफलता
साल 2025 में एक बार फिर तावड़े के नेतृत्व में बिहार में बीजेपी और जेडीयू की सरकार बनने और बीजेपी की सीटों में इजाफे का दावा किया गया। बिहार में एनडीए के प्रभारी के रूप में उन्होंने सहयोगियों के बीच सीट शेयरिंग और अंदरूनी खींचतान को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी कार्यशैली से प्रभावित होकर उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के पद पर बनाए रखा गया। इसके साथ ही महाराष्ट्र से राज्यसभा भेजकर उनके संसदीय करियर को भी नई दिशा दी गई। अब इसी राजनीतिक सफर के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है।
संगठन पर्व 2024 में भी मिली थी बड़ी जिम्मेदारी
विनोद तावड़े को संगठन पर्व 2024 के तहत बीजेपी के राष्ट्रीय सदस्यता अभियान का प्रभारी भी बनाया गया था। दिए गए कंटेंट के मुताबिक, इस अभियान के दौरान उन्होंने देशभर में 15 दिनों के भीतर 5 करोड़ नए सदस्य जोड़ने का दावा किया गया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली थी। ऐसे में यूपी संगठन के साथ उनका अनुभव पहले से रहा है।
2027 में यूपी चुनाव के सामने बड़ी चुनौती
साल 2019 में जिस तावड़े को महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति से बाहर कर दिया गया था, 2026 में वही तावड़े 2027 के यूपी चुनाव की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा घोषित सांगठनिक फेरबदल के तहत विनोद तावड़े को राष्ट्रीय महासचिव बनाए रखते हुए उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है।
अब उनके सामने 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी के साथ-साथ 2024 के झटकों के बाद पार्टी कैडर में ऊर्जा भरना, योगी सरकार और संगठन के बीच समन्वय स्थापित करना और गैर-यादव ओबीसी तथा पारंपरिक वोट बैंक को साधना जैसी अहम चुनौतियां होंगी।
तावड़े के लिए यूपी की जिम्मेदारी क्यों अहम है?
उत्तर प्रदेश बीजेपी के लिए सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मैदान है। ऐसे में यहां प्रभारी की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
तावड़े के पास महाराष्ट्र की राजनीति का अनुभव है, राष्ट्रीय संगठन में काम करने का अनुभव है और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में गठबंधन और चुनावी प्रबंधन का अनुभव भी है। अब देखना होगा कि इन अनुभवों को वे यूपी की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में किस तरह इस्तेमाल करते हैं। फिलहाल तस्वीर साफ है—2019 में टिकट कटने के बाद जिस विनोद तावड़े को राजनीतिक तौर पर हाशिए पर माना जा रहा था, वही नेता अब बीजेपी के सबसे अहम चुनावी राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। 2027 का चुनाव उनके राजनीतिक सफर की एक और बड़ी परीक्षा होगा।


