मॉनसून सत्र के आखिरी दिन लोकसभा में पहली बार पूरा वंदे मातरम् गाया गया। इसके बाद BJP और समाजवादी पार्टी के सांसदों के बयानों से राष्ट्रगीत के पूरे स्वरूप और गायन को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
संसद में पूरे वंदे मातरम् पर क्यों छिड़ी सियासत?
मॉनसून सत्र के आखिरी दिन संसद में देशभक्ति के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक… वंदे मातरम्… पर एक बार फिर सियासत तेज हो गई है। दरअसल मॉनसून सत्र के आखिरी दिन गुरुवार को लोकसभा में पहली बार पूरा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ गाया गया। इस दौरान सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी समेत सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी सांसद मौजूद रहे। राष्ट्रगीत के छह स्टैंजा बजाए जाने के बाद लोकसभा की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी गई। लेकिन राष्ट्रगीत के गायन को लेकर विवाद भी हो गया है।
मनोज तिवारी ने पूरे वंदे मातरम् का किया समर्थन
दरअसल, बीजेपी और समाजवादी पार्टी के सांसदों के बयानों से सदन में पूरे राष्ट्रगीत के गायन को लेकर विवाद पैदा हुआ है। बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने पूरे वंदे मातरम् के गायन को लेकर सरकार का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि देश के हर व्यक्ति के मोबाइल तक संसद में गाए गए पूरे राष्ट्रगीत की तस्वीर और दृश्य पहुंचना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि एक दौर में वंदे मातरम् को केवल इसके पहले स्टैंजा तक सीमित कर दिया गया था। मनोज तिवारी ने इसके लिए कांग्रेस के शासनकाल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से अब पूरा राष्ट्रगीत गाया जा रहा है। मनोज तिवारी ने कहा कि जब ‘तुम विद्या, तुम धर्म’ और ‘सुष्मित भूषित कमलाम अमलाम’ जैसे शब्दों के साथ सभी लोग एक साथ खड़े होकर वंदे मातरम् गाते हैं तो यह बेहद गौरवपूर्ण दृश्य होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत कई नेता पूरे राष्ट्रगीत को साथ गा रहे थे।
राहुल गांधी को लेकर भी मनोज तिवारी ने दिया बयान
इसके साथ ही मनोज तिवारी ने राहुल गांधी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी राष्ट्रगीत गा नहीं रहे थे, लेकिन खड़े थे और यह भी अच्छी बात है। उन्होंने संभावना जताते हुए कहा कि शायद राहुल गांधी को पूरा वंदे मातरम् याद न हो, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी याद हो जाएगा।
राम गोपाल यादव ने पूरे राष्ट्रगीत पर उठाए सवाल
उधर, समाजवादी पार्टी के सांसद राम गोपाल यादव ने पूरे वंदे मातरम् के गायन को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने इसके संबंध में कानून बनाया है, उन्हें भी पूरा राष्ट्रगीत याद नहीं है। उनके मुताबिक, पहले जितना वंदे मातरम् गाया जाता था, वह सभी को याद रहता था, लेकिन अब पूरा गीत याद रखना मुश्किल है। राम गोपाल यादव ने कहा कि दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रगान लगभग एक मिनट के आसपास होते हैं, जबकि वंदे मातरम् के विस्तारित रूप को गाने में समय लगता है।
राष्ट्रगीत के दौरान सभी को ‘अटेंशन’ की मुद्रा में खड़ा रहना पड़ता है और लंबे समय तक इस स्थिति में खड़े रहने में कई लोगों को दिक्कत हो सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को सभी सांसदों और लोगों के बीच वंदे मातरम् की प्रतियां वितरित करनी चाहिए, ताकि लोग पूरा गीत याद कर सकें।
हंगामे के बीच सीधे कराया गया वंदे मातरम् का गायन
आपको बता दें कि सदन की शुरुआत सामान्य तरीके से नहीं हुई। सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही विपक्ष की ओर से नारेबाजी और हंगामा शुरू हो गया था। ऐसे माहौल को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने अपना पारंपरिक संबोधन नहीं दिया। सूत्रों के मुताबिक, माहौल अध्यक्ष के संबोधन के अनुकूल नहीं था। लिहाजा सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सीधे वंदे मातरम् का गायन कराया गया और उसके बाद सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया।
वंदे मातरम् को लेकर कानूनी प्रावधान भी चर्चा में
गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधान लागू किए गए हैं। इसके तहत राष्ट्रगीत के गायन में जानबूझकर बाधा डालना या उसे रोकना दंडनीय बनाया गया है और इसे राष्ट्रगान के समान कानूनी दर्जा दिया गया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को जारी एक आदेश में आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के छह स्टैंजा के गायन से जुड़े निर्देश दिए थे। राष्ट्रपति के आगमन, तिरंगा फहराने और राज्यपालों के संबोधन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर इसके निर्धारित प्रारूप में गायन की व्यवस्था की गई है।
वंदे मातरम् पर संसद के बाहर भी जारी रहेगी बहस
तो वंदे मातरम् पर संसद से शुरू हुई यह बहस अब संसद के बाहर भी जारी रहने वाली है। एक तरफ राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक विरासत को सामने लाने की मांग है…तो दूसरी तरफ उसके प्रचलित स्वरूप और परंपरा को बनाए रखने की दलील। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है…या फिर राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर कोई व्यापक सहमति भी बनती है।
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