सुभाष गर्ग के आरोपों से फिर सुर्खियों में आया पुराना विवाद
देश के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के एक पॉडकास्ट में किए गए दावों ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे के साथ उनके पुराने विवाद को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। गर्ग ने दुबे पर गंभीर आरोप लगाए—यहां तक कि ‘ब्लैकमेलिंग’ का भी दावा किया। जवाब में निशिकांत दुबे ने इन आरोपों को खारिज करते हुए सुभाष गर्ग के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराने की बात कही है।
राजनीति की गलियों में वार और पलटवार का दौर कभी थमता नहीं, लेकिन जब देश की नौकरशाही के शीर्ष पद पर रहे प्रशासनिक अधिकारी और सत्तारूढ़ दल के प्रभावशाली सांसद के बीच जुबानी जंग छिड़ जाए, तो मामला बेहद दिलचस्प हो जाता है. कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और भारतीय जनता पार्टी के सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के बीच छिड़ी जुबानी जंग के चलते दिखने को मिल रहा है।
2018 से शुरू हुई थी सुभाष गर्ग और निशिकांत दुबे की कहानी
दरअसल कहानी शुरू होती है 2018 से…उस वक्त सुभाष चंद्र गर्ग आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव थे। मार्च 2018 में निशिकांत दुबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर गर्ग की आर्थिक नीतियों और मैक्रोइकोनॉमिक फ्रेमवर्क पर सवाल उठाए थे। दुबे ने तब ज्यादा सार्वजनिक निवेश, लिक्विडिटी और निजी निवेश को बढ़ावा देने की जरूरत बताई थी और गर्ग के आर्थिक दृष्टिकोण की समीक्षा की मांग की थी।
सालों बाद यही पुराना विवाद फिर सामने आया। पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने एक पॉडकास्ट के दौरान अपने कार्यकाल के कई ऐसे पन्ने खोले हैं, जिन्होंने सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है। सुभाष गर्ग सीधा कहते हैं कि ‘निशिकांत दुबे ब्लैकमेलिंग किस्म के आदमी हैं’. फिर वे एक कहानी बताते हैं. उनके मुताबिक, यह कहानी तब की है जब वे वित्त मंत्रालय में कार्यरत थे।
LIC चेयरमैन के जरिए काम कराने का लगाया आरोप
उन्होंने बताया कि किस तरह सांसद निशिकांत दुबे एक बार उनके दफ्तर पहुंचे थे. गर्ग का दावा है कि दुबे ने उनसे LIC चेयरमैन के जरिए अपना एक काम करवाने की सिफारिश की थी. यह काम किसी के तबादले या कॉन्ट्रैक्ट से संबंधित था।
हालांकि, जब गर्ग ने यह कहकर इनकार कर दिया कि LIC उनके विभाग के अंतर्गत नहीं आती और वे इस तरह के काम नहीं करते, तो माहौल में कड़वाहट आ गई. गर्ग का कहना है कि उन्होंने बीजेपी सांसद की उस अनुचित मांग को सिरे से खारिज कर दिया था।
दरसल कहानी में नया मोड़ तब आया जब मार्च 2018 में निशिकांत दुबे ने तत्कालीन सरकार को एक पत्र लिखा, जिसमें गर्ग को लेकर कई तरह की शिकायतें की गई थीं. गर्ग के अनुसार, सरकार ने उस वक्त उस पत्र पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसे कचरे के डिब्बे में डाल दिया. इसके बाद गर्ग का तबादला जुलाई 2019 में हुआ, जो कि पत्र लिखे जाने के लगभग सवा साल बाद की बात थी. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दोनों के बीच का तनाव अंदर ही अंदर सुलगता रहा।
संसदीय समिति की बैठक में भी बढ़ा था विवाद
इस कड़वाहट का सबसे बड़ा और दिलचस्प नाटक संसद की एक स्थायी समिति की बैठक में देखने को मिला. उस समय 2018-19 का आम बजट पेश हुआ था और सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी ‘आयुष्मान भारत’ योजना का ऐलान किया था। चूंकि योजना पर फैसला अंतिम समय में हुआ था, इसलिए बजट में उसके लिए अलग से हेड यानी लाइन आइटम नहीं बनाया जा सका था।
स्थायी समिति की बैठक में जब सांसदों ने इस बारे में सवाल पूछा, तो वित्त सचिव के रूप में मौजूद गर्ग ने पूरी ईमानदारी से अपनी बात रखी. उन्होंने स्वीकार किया कि निर्णय में देरी के कारण अलग हेड नहीं बन सका, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के फंड से काम चलाया जा रहा है।
गर्ग को लगा कि उनका जवाब बेहद ईमानदार और तथ्यात्मक था, लेकिन जैसे ही वे दफ्तर लौटे, महज दस मिनट के भीतर प्रधानमंत्री कार्यालय से नृपेंद्र मिश्रा का फोन आ गया. मिश्रा ने उनसे पूछा कि उन्होंने संसदीय समिति में यह क्यों कहा कि सरकार समय पर फैसले नहीं लेती।
निशिकांत दुबे पर बयान को तोड़-मरोड़कर शिकायत करने का आरोप
गर्ग यह सुनकर हैरान रह गए. जब उन्होंने पूछा कि यह शिकायत किसने की, तो पता चला कि निशिकांत दुबे सीधे पीएमओ पहुंचकर उनके बयान को तोड़-मरोड़कर शिकायत दर्ज करा आए थे. गर्ग का आरोप है कि निशिकांत दुबे ने उनके इनकार का बदला लेने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए यह पूरा ताना-बाना बुना था।
यह पूरा घटनाक्रम अब दोबारा चर्चा में है क्योंकि सुभाष गर्ग ने अपने पॉडकास्ट में पुराने विवाद से जुड़े इन दावों को सामने रखा है। वहीं, निशिकांत दुबे ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की बात कही है।
निशिकांत दुबे ने आरोपों को खारिज कर क्या कहा?
अब सांसद निशिकांत दुबे ने सुभाष गर्ग के दावों को पूरी तरह से खारिज करते हुए उन पर तीखा हमला बोला. दुबे ने तंज कसते हुए कहा कि पूर्व वित्त सचिव पद से रातोंरात हटाए जाने के कारण ‘बोरा गए हैं’ यानी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञानता और अक्षमता के चलते ही सरकार ने उन्हें रातोंरात पद से हटा दिया था।
निशिकांत दुबे ने एक्स पर किये ट्विट में कहा है कि वह गर्ग के खिलाफ मुकदमा करेंगे. उन्होंने लिखा है- वह साल 2009 से सांसद हैं. अब तक किसी भी मंत्रालय में नहीं गए, क्योंकि प्रोटोकोल में सांसद मंत्रालय के सचिव से ऊपर होते हैं।
2018 के पत्र का हवाला देकर दुबे ने दिया जवाब
सांसद ने अपने 2018 के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने तत्कालीन वित्त सचिव के कामकाज और रवैये को लेकर बहुत पहले ही सरकार और प्रधानमंत्री को आगाह कर दिया था. दुबे का कहना है कि उनकी चिट्ठी कोई काल्पनिक बात नहीं थी, बल्कि उसमें अधिकारी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए गए थे।
दुबे ने दावा किया कि गर्ग अब अपनी नाकामी और पद से हटाए जाने की खीझ मिटाने के लिए उन पर अनर्गल आरोप लगा रहे हैं।
दोनों के आरोप-प्रत्यारोप से फिर गरमाया विवाद
तो इस तरह एक ओर जहां पूर्व वित्त सचिव इसे एक सांसद की ब्लैकमेलिंग और निजी खुन्नस बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे इसे एक बर्खास्त या हटाए गए अयोग्य अफसर का विलाप करार दे रहे हैं। दोनों ओर से जारी इस तीखी जंग ने एक बार फिर नौकरशाही और नेताओं के बीच के उस गुप्त और जटिल रिश्ते को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो अमूमन बंद कमरों तक ही सीमित रहता है।


