यूपी में तीन हत्याकांड, आरोपी सवर्ण क्यों? विपक्ष ने योगी सरकार को घेरा

  • September 14, 2026
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यूपी में तीन हत्याकांड के बाद योगी सरकार को घेरता विपक्ष

गोंडा-अयोध्या-प्रतापगढ़…यूपी में तीन हत्याकांड के बाद राज्य की सियासत गरमा गई है। गोंडा में विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद निषाद और मल्लाह समुदाय में भारी आक्रोश है। अयोध्या में रामलगन मौर्य की गोली मारकर हत्या का मामला भी राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। वहीं प्रतापगढ़ में 13 अगस्त को हुए सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड को लेकर भी पहले से सियासी घमासान जारी है। अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या तीन अलग-अलग जिलों में हुई ये वारदातें अब यूपी की सियासत को एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे की तरफ ले जा रही हैं?

गोंडा, अयोध्या और प्रतापगढ़ के हत्याकांड से गरमाई सियासत

दरसल उत्तर प्रदेश के गोंडा, अयोध्या और प्रतापगढ़ में घटित हत्या की घटनाओं ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राज्य के सियासी तापमान को भी बढ़ा दिया है. इन तीनों घटनाओं ने ‘ओबीसी बनाम सवर्ण‘ की राजनीति को भी हवा दे दी है. ये घटनाएं 2027 के चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के लिए राजनीतिक चुनौती बन रही हैं। गोंडा में विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद निषाद/मल्लाह समुदाय में भारी आक्रोश है. इसके अलावा अयोध्या में 25 अगस्त को रामलगन मौर्य की गोली मारकर हत्या की गई थी, तो प्रतापगढ़ जिले में 13 अगस्त को हुए सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड के मामले को लेकर पहले से ही सियासत गर्म है।

अयोध्या में मौर्य और गोंडा में साहनी समाज से जुड़े व्यक्तियों की हत्या में आरोपी ठाकुर समुदाय से हैं, तो प्रतापगढ़ में विश्वकर्मा समुदाय के व्यक्ति की हत्या में आरोपी ब्राह्मण समाज से हैं. ऐसे में हत्याकांड के मामलों ने अब पूरी तरह से जातीय और सियासी रंग ले लिया है. सपा सहित तमाम विपक्षी पार्टियां बीजेपी को ‘ओबीसी विरोधी’ कठघरे में खड़ा करने में जुट गई हैं।

गोंडा में विनोद साहनी की हत्या पर क्यों मचा बवाल?

दरसल यूपी के गोंडा में व्यापारी विनोद कुमार साहनी की हत्या को लेकर सियासी माहौल गर्म है, क्योंकि आरोपी शुभम सिंह गोलू, आकाश सिंह और सुभाष सिंह हैं. लखनऊ में केजीएमयू के बाहर कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद, वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी और सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजपाल कश्यप धरने पर बैठे। इधर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने विनोद साहनी के परिवार से फोन पर बात की, तो यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय पीड़ित परिवार से मिलने गोंडा निकल पड़े थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें रास्ते में ही रोक लिया.

इसके अलावा AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष भी अपने काफिले के साथ पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे, जिन्हें पुलिस-प्रशासन ने जाने नहीं दिया. बता दे की इस मामले का मुख्य आरोपी राजमणि सिंह उर्फ राज सिंह उर्फ भोलू है। वही अयोध्या जिले के पूराकलंदर थाना क्षेत्र के कन्दैला गांव में 25 अगस्त को पुराने जमीन और रास्ते के विवाद को लेकर रामलगन मौर्य और उनकी मां पार्वती देवी पर गोली और बम से हमला किया गया था. हमले में रामलगन मौर्य की मौत हो गई, जबकि उनकी मां पार्वती देवी गंभीर रूप से घायल हुई थीं. इस मामले को लेकर सपा सहित कई विपक्षी पार्टियों ने बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया है।

प्रतापगढ़ में सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड भी बना सियासी मुद्दा

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में कंप्यूटर ऑपरेटर सौरभ विश्वकर्मा हत्याकांड में मुख्य आरोपियों के रूप में दरोगा तिवारी, विपिन तिवारी, अवधेश तिवारी, सौरभ तिवारी, मिंटू उपाध्याय और अनुज तिवारी के नाम सामने आए हैं. सपा नेता इस घटना को लेकर धरने पर बैठे और पुलिस के साथ उनकी बहस भी हुई।

दरसल गोंडा, अयोध्या और प्रतापगढ़ की इन तीनों घटनाओं में मृतक ओबीसी/पिछड़ा वर्ग से हैं, जबकि आरोपी सवर्ण जाति से हैं . गोंडा में मल्लाह जाति से आने वाले विनोद साहनी की हत्या हुई, जबकि आरोपी ठाकुर जाति से हैं. इसी तरह अयोध्या में भी मृतक ओबीसी हैं, तो आरोपी ठाकुर हैं, वहीं प्रतापगढ़ में मृतक लोहार/विश्वकर्मा जाति से हैं, तो आरोपी ब्राह्मण समाज से हैं.

गौरतलब है की मल्लाह/साहनी, मौर्य और विश्वकर्मा समुदाय बीजेपी की गैर-यादव ओबीसी राजनीति के नजरिए से काफी अहम माने जाते हैं. अब इस तीनों हत्याकांड के बाद समाजवादी पार्टी ने जिस तरह जातीय रंग को तूल दिया है, उसके चलते पूर्वांचल और मध्य यूपी में मल्लाह से लेकर मौर्य और विश्वकर्मा समुदाय में नाराजगी भी दिख रही है।

अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले की बढ़ी भूमिका

सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने ‘पीडीए’ फॉर्मूले के सहारे इन घटनाओं के जरिए जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. सपा नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि कानून-व्यवस्था का दावा करने वाली सरकार में इन वर्गों की सुरक्षा की क्या स्थिति है, जबकि बीजेपी का कहना है कि तीनों ही घटनाओं के आरोपियों को फौरन गिरफ्तार किया गया है. सपा सिर्फ राजनीति कर रही है। कानून व्यवस्था का हाल अखिलेश सरकार में क्या था, ये जगजाहिर है.

हालांकि, घटना के तुरंत बाद संबंधित जातियों के स्थानीय संगठन और प्रतिनिधि सक्रिय हो गए हैं, जिससे ये मामले साधारण अपराध के बजाय जातीय अस्मिता का मुद्दा बनते जा रहे हैं. सपा ने इसे लेकर आक्रामक तेवर अपना रखे हैं. सपा के प्रवक्ता मनोज कुमार काका ने कहा कि PDA समाज के साथ बीजेपी सरकार लगातार नाइंसाफी कर रही है. हत्या विश्वकर्मा समाज के बेटे की हुई, फिर न्याय की आवाज उठाने वाले विश्वकर्मा समाज के बेटे पर ही फर्जी मुकदमा क्यों?

इसी तरह विनोद साहनी हत्याकांड पर भी सपा ने बीजेपी की ओबीसी राजनीति पर सवाल खड़े किए. सपा प्रमुख अखिलेश यादव और विपक्षी दल लगातार यह नैरेटिव बनाने में जुटे हैं कि सरकार में पिछड़ों और दलितों के बजाय केवल खास जाति वर्ग का वर्चस्व है।

बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग के लिए क्यों अहम हैं ये मामले?

दरअसल बीजेपी का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल गैर-यादव ओबीसी समाज के मजबूत समर्थन पर टिका रहा है. इन समुदायों में असुरक्षा की भावना पैदा होना पार्टी के रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय है. 2024 के चुनाव में बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग बिखरने के चलते ही सीटें गंवानी पड़ी थीं और सपा को इसका लाभ मिला था.

यूपी में बीजेपी की सहयोगी निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी (सुभासपा) जैसी पार्टियां अपने-अपने समाज के प्रति जवाबदेही से घिरी हैं. संजय निषाद जैसे नेताओं का अपनी ही सरकार के तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोलना बीजेपी के अंदरूनी असंतोष और तालमेल की कमी को उजागर करता है. ऐसे मामलों में सहयोगी दलों पर भी अपनी ही सरकार के खिलाफ या दबाव में बयान देने का जोखिम रहता है।

2027 चुनाव से पहले क्या हो सकता है असर?

फिलहाल विपक्ष के इस नैरेटिव को काटने के लिए सरकार को न केवल कठोर कानूनी कार्रवाई करनी होगी, बल्कि यह संदेश भी देना होगा कि न्याय बिना किसी जातीय भेदभाव के हो रहा है. जमीनी स्तर पर असंतोष को दबाने के लिए बीजेपी को अपने ओबीसी नेताओं को आगे कर पीड़ितों तक त्वरित राहत और संवाद स्थापित करना होगा. यदि इन घटनाओं के सहारे सपा-बसपा ओबीसी समुदाय को अपने पाले में एकजुट करने में सफल रहते हैं, तो आगामी चुनावी समीकरणों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।