Surrogate Advertising क्या है? जानिए शराब और तंबाकू जैसे प्रतिबंधित उत्पादों की ब्रांडिंग कैसे दूसरे प्रोडक्ट के जरिए होती है और अजय देवगन, शाहरुख खान व टाइगर श्रॉफ से जुड़ा विवाद क्या है।
सरोगेट विज्ञापन को लेकर अजय देवगन, शाहरुख और टाइगर पर सवाल
विज्ञापन पानी का… लेकिन ब्रांडिंग शराब की! चेहरा बॉलीवुड का… लेकिन इशारा शराब के ब्रांड की तरफ! और अब इसी तरह के विज्ञापनों को लेकर सवालों के घेरे में हैं बॉलीवुड के दिग्गज स्टार्स अजय देवगन, शाहरुख खान और टाइगर श्रॉफ। आखिर क्या होता है सरोगेट विज्ञापन? क्यों शराब और तंबाकू जैसे उत्पादों के विज्ञापन पर पाबंदी के बावजूद, उन्हीं ब्रांड्स की पहचान टीवी, डिजिटल और होर्डिंग्स पर नजर आती है? और कानून इस पूरे खेल को किस नजर से देखता है?
सरोगेट विज्ञापन क्या होता है?
दरअसल सरोगेट विज्ञापन एक ऐसी मार्केटिंग रणनीति है, जिसमें किसी प्रतिबंधित उत्पाद का प्रचार किसी वैध उत्पाद की आड़ में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर शराब, गुटखा, पान मसाला या तंबाकू उत्पादों का सीधा विज्ञापन कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होता है तो कंपनियां उसी ब्रांड, नाम, लोगो, रंग और स्लोगन के साथ इलायची, माउथ फ्रेशनर, सोडा, पैकेज्ड वॉटर या अन्य वैध उत्पादों का प्रचार करती हैं। असल में यह उत्पाद कानूनी तौर पर वैध होता है, लेकिन उसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के मन में उसी ब्रांड की पहचान बनाए रखना होता है, जिस पर असल में बैन लगा है या वो प्रतिबंधित है।
आपने टीवी पर ऐसा विज्ञापन जरूर देखा होगा, जिसमें नाम तो इलायची, पानी या म्यूजिक का लिया जाता है। लेकिन ब्रांड देखते ही लोगों को किसी दूसरे प्रोडक्ट की याद आ जाती है। यही है ‘सरोगेट विज्ञापन’। इसमें किसी ऐसे प्रोडक्ट या सर्विस का सीधे विज्ञापन नहीं किया जाता, जिस पर विज्ञापन की पाबंदी हो। इसके बजाय उसी ब्रांड का नाम, लोगो या पहचान से जुड़े किसी दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार किया जाता है।
विमल विज्ञापन को लेकर फिर चर्चा में आया सरोगेट एडवरटाइजिंग का मुद्दा
हाल ही में सरोगेट विज्ञापन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। महाराष्ट्र FDA ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को विमल से जुड़े विज्ञापनों को लेकर नोटिस जारी किया है। अथॉरिटी का आरोप है कि इलायची के नाम पर किए जा रहे प्रमोशन से प्रतिबंधित पान मसाला की ब्रांड पहचान को बढ़ावा मिल सकता है।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए। मान लीजिए किसी कंपनी का ऐसा प्रोडक्ट है, जिसका टीवी या दूसरे माध्यमों पर सीधे विज्ञापन करना प्रतिबंधित है। कंपनी उसी ब्रांड के नाम से कोई दूसरा प्रोडक्ट बाजार में पेश करती है, जैसे इलायची, माउथ फ्रेशनर, सोडा या मिनरल वॉटर। फिर विज्ञापन में इसी दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार किया जाता है। लेकिन विज्ञापन का अंदाज, पैकेजिंग, लोगो, रंग और ब्रांड नाम ऐसा होता है कि लोगों को तुरंत उस प्रतिबंधित प्रोडक्ट की याद आ जाती है।
शराब और तंबाकू के ब्रांड भी अपनाते हैं ऐसी रणनीति
दरअसल शराब के मामले में भी ऐसा तरीका देखने को मिलता है। किसी शराब ब्रांड के नाम से पानी या सोडा का प्रचार किया जा सकता है। इसी तरह तंबाकू और पान मसाला से जुड़े ब्रांड इलायची या माउथ फ्रेशनर जैसे प्रोडक्ट के नाम से विज्ञापन करते नजर आ सकते हैं। यानी सामने कुछ और दिख रहा है, लेकिन ब्रांड की पहचान किसी और प्रोडक्ट की याद दिला रही है। इसी वजह से इसे ‘सरोगेट’ यानी अप्रत्यक्ष विज्ञापन कहा जाता है।
विमल विज्ञापन में नजर आ चुके हैं अजय, शाहरुख और टाइगर
दरअसल विमल के विज्ञापनों में अजय देवगन लंबे समय से नजर आते रहे हैं। अप्रैल 2024 में टाइगर श्रॉफ भी शाहरुख खान और अजय देवगन के साथ विमल इलायची के विज्ञापन में दिखाई दिए थे।
यह विज्ञापन पान मसाला से जुड़े ब्रांड को लेकर होने वाली सरोगेट एडवरटाइजिंग की बहस का हिस्सा बना। इसके बाद मार्च 2025 में जयपुर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को विमल से जुड़े कथित भ्रामक विज्ञापन को लेकर नोटिस भी जारी किया था। अब अगस्त 2026 में महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई से यह मामला फिर सुर्खियों में है। FDA ने आरोप लगाया है कि विमल इलायची के विज्ञापन प्रतिबंधित पान मसाला की ब्रांड पहचान को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे सकते हैं। इनसे जुड़े प्रचार को लेकर कलाकारों से जवाब मांगा गया है।
कलाकारों को 15 दिन में देना होगा जवाब?
महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई के बाद तीनों कलाकारों को कई कानूनी और वित्तीय परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। इन्हें 15 दिन के भीतर जवाब देना होगा।
अभिनेताओं या उनकी कानूनी टीमों को 15 दिनों के भीतर यह बताना होगा कि उन्होंने इस विज्ञापन में हिस्सा क्यों लिया और सरोगेट विज्ञापन के आरोपों पर उनका पक्ष क्या है। इसके साथ ही उन्हें अपने सोशल मीडिया अकाउंट से विज्ञापन से जुड़ी सामग्री हटानी होगी।
कंपनियां सरोगेट विज्ञापन क्यों करती हैं?
अब सवाल उठता है कि आखिर कंपनियां ऐसा विज्ञापन क्यों करती हैं? इसका सबसे बड़ा कारण है ब्रांड को लोगों के दिमाग में बनाए रखना। अगर किसी प्रोडक्ट का सीधे विज्ञापन नहीं किया जा सकता, तो कंपनी उसी नाम से दूसरे प्रोडक्ट का प्रचार कर सकती है। इससे लोगों को ब्रांड का नाम, लोगो और उसकी पहचान बार-बार दिखाई देती रहती है। उदाहरण के लिए, अगर किसी शराब ब्रांड के नाम और लोगो वाला मिनरल वॉटर टीवी पर दिखता है, तो दर्शक पानी के साथ-साथ उस ब्रांड को शराब से भी जोड़ सकते हैं। यही सरोगेट विज्ञापन की मूल रणनीति मानी जाती है।
सरोगेट विज्ञापन पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर भी सवाल
यहीं से पूरी बहस शुरू होती है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विज्ञापन नियमों में मौजूद कमियों का फायदा उठाकर प्रतिबंधित प्रोडक्ट को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे सकते हैं। दूसरी चिंता सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर है। तंबाकू या शराब जैसे उत्पादों की ब्रांडिंग अगर किसी दूसरे प्रोडक्ट के जरिए लगातार लोगों के सामने आती रहे, तो ब्रांड की पहचान मजबूत हो सकती है और उससे जुड़े इस्तेमाल को सामान्य मानने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
युवा दर्शकों पर सेलिब्रिटी विज्ञापनों का असर
इस बहस का एक बड़ा पहलू है युवा दर्शक। आलोचकों का कहना है कि सेलिब्रिटी और ग्लैमरस विज्ञापन ब्रांड को ज्यादा आकर्षक बना सकते हैं। यानी भले स्क्रीन पर शराब की बोतल न हो… लेकिन ब्रांड की पहचान दर्शक तक पहुंच सकती है। और यही सरोगेट विज्ञापन पर सबसे बड़ा सवाल है।


